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क्या अखिलेश यादव के 'PDA कार्ड' का जवाब है CM योगी का मंत्रिमंडल विस्तार? समझिए

उत्तर प्रदेश में रविवार को कैबिनेट विस्तार हो गया. 8 मंत्रियों ने शपथ ली. कैबिनेट में 6 नए चेहरों को जगह दी गई. इस विस्तार के जरिए बीजेपी ने चुनाव से पहले जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश की है.

क्या अखिलेश यादव के 'PDA कार्ड' का जवाब है CM योगी का मंत्रिमंडल विस्तार? समझिए
सीएम योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव. (फाइल फोटो)
  • उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ ने कैबिनेट का विस्तार कर छह नए मंत्रियों को शामिल किया है
  • इसका मकसद नाराज जातियों को संतुष्ट करना और दलबदलुओं को पार्टी में शामिल कर चुनावी रणनीति मजबूत करना है
  • नए मंत्रियों में दलित, पिछड़ा और महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाकर अखिलेश की PDA राजनीति का मुकाबला किया जा रहा है

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं. इससे पहले रविवार को योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट का विस्तार किया गया. कैबिनेट में 6 नए चेहरों को शामिल किया गया है. साथ ही दो मंत्रियों का प्रमोशन हुआ है. योगी सरकार का कैबिनेट विस्तार लंबे समय से टाला जा रहा था. अब चुनाव से कुछ महीने पहले कैबिनेट विस्तार को बीजेपी की चुनावी तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है.

कैबिनेट विस्तार अभी क्यों किया गया? इसके तीन बड़े कारण हैं. पहला- नाराज जातियों को खुश करने के लिए क्षेत्रीय संतुलन बैठाना. दूसरा- दलबदलुओं को जगह देकर दूसरी पार्टियों के नेताओं को लुभाने की कोशिश करना. और तीसरा- पश्चिम बंगाल की जीत के बाद महिलाओं और अति पिछड़ों की लामबंदी के हिट फॉर्मूले को यूपी में भी लागू करना.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या बीजेपी ने जिन कारणों से कैबिनेट विस्तार किया है, वो तीनों मकसद पूरे होते हैं या नहीं?

  1. नाराज जातियों को खुश करना: यूजीसी गाइडलाइंस जैसे मुद्दों को लेकर ब्राह्मण नाराज थे. इन्हें खुश करने के लिए ब्राह्मण समाज से मनोज पांडेय को मंत्री बनाकर बीजेपी ने उन्हें लुभाने की कोशिश की है.
  2. दूसरी पार्टियों को लुभाने की कोशिश: मनोज पांडे 2022 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे. वह सपा के चीफ व्हिप भी रह चुके हैं. मई 2024 में वह बीजेपी में आ गए थे.
  3. महिलाओं और अति पिछड़ों का फॉर्मूला: चार बार से विधायक कृष्णा पासवान को कैबिनेट में शामिल किया गया है. महिला होने के साथ-साथ दलित चेहरा हैं. उनके अलावा पिछड़ा वर्ग से आने वाले हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बना गया था. अति पिछड़ा वर्ग के अजीत पाल का प्रमोशन किया गया है.

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अखिलेश के PDA को काट पाएंगे?

पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव 'PDA' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों की राजनीति करते हैं. 

अपनी 'PDA पॉलिटिक्स' के जरिए अखिलेश ने अपने साथ-साथ पिछड़े और अति पिछड़े समाज को तो जोड़ा ही. मायावती के कमजोर होने से दलितों का वोट भी अखिलेश के पास चला गया. अल्पसंख्यक भी अखिलेश के ही ज्यादा करीब हैं. 

2024 के लोकसभा चुनाव में पिछड़ा-अति पिछड़ा और दलित समुदाय के वोट बीजेपी के छिटक गए थे, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा था. खासकर मायावती का दलित वोट अखिलेश की पार्टी को चला गया था. 

अब कैबिनेट विस्तार के जरिए बीजेपी दिखाना चाहती है कि पिछड़ा-अति पिछड़ा वर्ग और दलितों को तरजीह देने के मामले में वह दूसरी पार्टियों से कम नहीं है. 

योगी कैबिनेट में कृष्णा पासवान और सुरेंद्र दिलेर को शामिल किया गया है. दोनों को राज्य मंत्री बनाया गया है. दोनों दलित समुदाय से आते हैं. कृष्णा पासवान के जरिए जहां दलितों के साथ-साथ महिलाओं को भी साधने की कोशिश की गई है. तो वहीं सुरेंद्र दिलेर दलित युवा चेहरा हैं. सुरेंद्र दिलेर ताकतवर सियासी परिवार से आते हैं. दादा किशन सिंह दिलेर 6 बार के विधायक रहे हैं. पिता राजवीर दिलेर भी सांसद रह चुके हैं.

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अखिलेश के 'PDA' को कैसे दिया जवाब?

जिन आठ मंत्रियों ने आज शपथ ली है, उनमें एक ब्राह्मण को छोड़ सभी ओबीसी या एससी समाज से आते हैं. यानी बीजेपी इस विस्तार से जातियों को साधने की कोशिश करती हुई दिखाई दे रही है. माना जा रहा है कि ये समाजवादी पार्टी के पीडीए कार्ड का जवाब है.

जिन आठ मंत्रियों ने आज शपथ ली है, उनमें भूपेंद्र चौधरी जाट, मनोज पांडे ब्राह्मण, हंसराज विश्वकर्मा लोहार, कैलाश राजपूत लोधी, कृष्णा पासवान पासी और सुरेंद्र दिलेर वाल्मीकि हैं. जिन दो मंत्रियों का प्रमोशन हुआ है, उनमें सोमेंद्र तोमर गुर्जर और अजीत पाल गड़ेरिया समाज से आते हैं.

जातियों की बात करें तो मनोज पांडेय सवर्ण हैं. वो ब्राह्मण बिरादरी से आते हैं. इनके अलावा भूपेंद्र चौधरी जाट (ओबीसी), हंसराज विश्वकर्मा लोहार (ओबीसी), कैलाश राजपूत लोधी (ओबीसी), कृष्णा पासवान पासी (एससी) और सुरेंद्र दिलेर वाल्मीकि (एससी) बिरादरी से आते हैं. वहीं सोमेंद्र तोमर गुर्जर और अजीत पाल एससी समाज से आते हैं.

बड़ा सवाल ये है कि अब ये सारी जातीय संतुलन आखिर हो किस लिए रही है? दरअसल पीडीए का नारा देकर यूपी के पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़ने की कोशिश में जुटी समाजवादी पार्टी को कड़ी टक्कर देने के लिए बीजेपी एक तरफ़ कमंडल और दूसरी तरफ़ मंडल की राजनीति में अपनी गोटियां सेट करने की कोशिश कर रही है. समाजवादी पार्टी ने बीते लोकसभा चुनाव में जिस तरह से पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को साधा था, बीजेपी को डर है कि कहीं विधानसभा चुनाव में ये दोहराव ना हो. अगर हुआ तो डगर मुश्किल हो सकती है. 

यूपी में जातियों की बात करें तो सवर्णों में ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य, बनिया तो वहीं ओबीसी में कुर्मी, लोधी, यादव, शाक्य, सैनी, निषाद, राजभर, जाट, गुर्जर और अनुसूचित जाति वर्ग में जाटव, पासी, सोनकर, वाल्मीकि जैसी जातियों का राजनैतिक वजूद ज़्यादा दिखाई देता है. इनके अलावा भी कई जातियां हैं, जो नाराज़ हो जायें, तो कई विधानसभा सीटों के नतीजे पलट जाते हैं. इसी वजह से जो भी प्रभावशाली जातियां हैं, उनका प्रतिनिधित्व मंत्रिमंडल में रहे, इसकी कोशिश की जाती है.  

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नाराजगी दूर करने की भी कोशिश

चुनाव से पहले बीजेपी किसी को नाराज नहीं करना चाहती, इसलिए किसी मौजूदा मंत्री को न तो हटाया गया और न ही उनका कद घटाया गया. इसके अलावा, बीजेपी ने अपने नाराज वोटरों को भी साधने की कोशिश की है. 

हाल के कुछ महीनों में ब्राह्मणों की नाराजगी की एक के बाद एक कई खबरें सामने आयीं. यूजीसी गाइडलाइन, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद, घूसखोर पंडित विवाद जैसे कई विवाद पैसे हुए या किए गए. इन विवादों की वजह से ब्राह्मणों ने खुलकर अपनी बात रखनी शुरू कर दी. नतीजा ये हुए कि डिप्टी सीएम को अपने घर बटुकों को बुलाकर उनका सम्मान करना पड़ा तो वहीं घूसखोर पंडित जैसी फ़िल्म का नाम बदलने का सरकार को आदेश जारी करना पड़ा. यूजीसी की गाइडलाइन भी कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फ़िलहाल ठंडे बस्ते में है. 

बीजेपी को ये बात पता है कि बीएसपी आंकड़ों में भले कमज़ोर हो लेकिन दलित वोटों का एक हिस्सा मज़बूती से उसके साथ खड़ा रहा है. इसमें से कुछ वोट बीजेपी अपने साथ जोड़ने में सफल हुई थी लेकिन लोकसभा चुनाव में संविधान बदलने के विपक्ष के दावों की वजह से वो वोट बीजेपी से छिटककर इंडिया अलायन्स की तरफ़ चला गया. अलग अलग सरकारी योजनाओं और दलित जातियों को हिस्सेदारी देकर बीजेपी ना सिर्फ़ अपने छिटके हुए वोटों को जोड़ने की कवायद कर रही है बल्कि बीएसपी के साथ खड़े दलितों को भी साथ लाने की लगी दिखाई दे रही है. 

ऐसे में फ़िलहाल इस विस्तार के बाद यूपी में अगले साल के विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है. क्या सत्ता पक्ष, क्या विपक्ष, सब अपने अपने तीर तरकश में भरकर तैयारी में जुट गए हैं. फिलहाल ये कह सकते हैं कि मुख्य लड़ाई बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच ही है. इस लड़ाई में कौन जीतेगा, कौन हारेगा, ये अगले साल चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा लेकिन जिस तरह से गोटियां फिट की जा रही हैं, उसे देखकर ये ज़रूर लगता है कि लड़ाई बहुत जोरदार होगी.

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