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न्यूयॉर्क जज के सवाल से अदाणी ग्रुप के केस को खारिज करने पर कोई खतरा नहीं है: अमेरिकी वकील

अमेरिकी फेडरल क्रिमिनल प्रैक्टिस की जानकारी रखने वाले एक सीनियर अमेरिकी वकील के अनुसार, अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी के खिलाफ आपराधिक आरोप हटाने की मंजूरी देने से पहले प्रॉसिक्यूटर से और ज्यादा जानकारी मांगने का अमेरिकी फेडरल जज का फैसला एक प्रक्रियात्मक जरूरत है.

न्यूयॉर्क जज के सवाल से अदाणी ग्रुप के केस को खारिज करने पर कोई खतरा नहीं है: अमेरिकी वकील
अमेरिकी वकील क्रिस मैन ने अदाणी ग्रुप के केस पर खुलकर बात की.
  • अमेरिकी फेडरल जज ने गौतम अदाणी के खिलाफ आपराधिक आरोप हटाने से पहले प्रॉसिक्यूटर्स से विस्तृत जानकारी मांगी है
  • जज का आदेश केवल प्रक्रिया संबंधी है और इसका मतलब यह नहीं कि मामला खारिज नहीं होगा या आगे बढ़ेगा
  • अदाणी के खिलाफ आरोप खारिज करने की मांग पर न्यायालय ने 13 जुलाई तक विस्तृत स्पष्टीकरण देने को कहा है

अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी के खिलाफ आपराधिक आरोप हटाने की मंजूरी देने से पहले प्रॉसिक्यूटर्स से पूरी जानकारी मांगने का अमेरिकी फेडरल जज का फैसला एक प्रक्रियात्मक जरूरत है. फेडरल आपराधिक मामलों की जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ अमेरिकी वकील के अनुसार, इसका मतलब यह नहीं है कि केस आगे बढ़ेगा. वकील क्रिस मैन ने कहा, "जज का आदेश प्रक्रिया से जुड़ा है."

अमेरिकी वकील ने दिया ये तर्क

वरिष्ठ अमेरिकी वकील क्रिस मैन ने बताया कि नियम 48(a) के तहत, डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस (DoJ) को आरोप-पत्र को खारिज करने के लिए अदालत से मंजूरी लेनी होती है, और जज फैसला सुनाने से पहले सवाल पूछ सकते हैं या अतिरिक्त जानकारी मांग सकते हैं. उन्होंने कहा कि यह अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है. वकील ने आगे कहा कि ऐसा कोई उदाहरण शायद ही मिलता है कि डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने तय कर लिया हो कि मामला खारिज कर दिया जाना चाहिए और किसी फेडरल कोर्ट ने प्रॉसिक्यूटर को आपराधिक मामले की कार्यवाही जारी रखने के लिए मजबूर किया हो. उन्होंने कहा कि जजों के पास "बहुत कम अधिकार" होते हैं. उन्होंने कहा, "असल में ऐसा कोई आधुनिक उदाहरण नहीं है, जिसमें किसी जज ने जस्टिस डिपार्टमेंट को ऐसे मामले में मुकदमा चलाने के लिए मजबूर किया हो, जिसे एग्जीक्यूटिव ब्रांच ने छोड़ने का फैसला किया हो."वरिष्ठ अमेरिकी वकील मैन ने बताया कि कानूनी तौर पर आपराधिक मुकदमों को आगे बढ़ाना एग्जीक्यूटिव का काम है, और अदालतों ने हमेशा से ही मुकदमा शुरू करने या उसे खत्म करने के फैसलों में अभियोजन पक्ष की राय को काफी अहमियत दी है.

यह टिप्पणी तब आई जब अदाणी मामले की सुनवाई कर रहे जज ने जस्टिस डिपार्टमेंट को निर्देश दिया कि वे आरोप पत्र को खारिज करने की अपनी मांग के लिए और अधिक विस्तृत स्पष्टीकरण दें.

ब्रुकलिन स्थित अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज निकोलस गारौफिस ने कहा था कि संघीय अभियोजकों (federal prosecutors) की 18 मई की घोषणा (जिसमें कहा गया था कि वे अब उस मामले को आगे नहीं बढ़ाएंगे जिसमें अदाणी पर कथित रिश्वत योजना से जुड़े सिक्योरिटीज फ्रॉड और वायर फ्रॉड के आरोप थे) उनके फैसले के लिए पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं देती है.

'कुछ हफ्तों में खारिज हो जाएगा केस'

मैन ने कहा कि जज की इस मांग को इस संकेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए कि मामला खारिज ना होने का खतरा है. उन्होंने बताया कि अदाणी मामले में, DoJ ने अदाणी और अन्य लोगों के खिलाफ लगे आरोपों को खारिज करने की मांग करते हुए एक संक्षिप्त दलील पेश की थी. इसीलिए, जज ने DoJ को विस्तृत स्पष्टीकरण देने के लिए 13 जुलाई तक का समय दिया है. उन्होंने कहा, "संभावना है कि DoJ उस डेडलाइन से पहले ऐसा करेगा, और मेरी राय में, यह केस महीनों के बजाय कुछ हफ्तों में ही खारिज हो सकता है. जज बिना सुनवाई के भी ऐसा कर सकते हैं." कोर्ट यह पक्का करने के लिए रिकॉर्ड तैयार कर रहा है कि यह अनुरोध नेक नीयत से किया गया है और नियम 48(a) के मुताबिक है. और जानकारी मांगना उसी प्रक्रिया का हिस्सा है. न्यायाधीश गारौफिस का हालिया आदेश संघीय आपराधिक नियमों के तहत अदालत द्वारा अभियोग खारिज करने के अभियोजक के आवेदन पर विचार करने के दायित्वों के निर्वहन का एक सामान्य हिस्सा है.

अदाणी ने अदालत को लिखे अपने हालिया पत्र में सरकार के मामले की कई गंभीर कमियों को उजागर किया था. सरकार के वकील द्वारा कई प्रस्तुतियों में इन कमियों को दूर किया गया, जिसके परिणामस्वरूप न्याय विभाग ने अभियोग खारिज करने का अनुरोध किया.

क्रिस मैन ने न्यूयॉर्क शहर के मेयर का दिया उदाहरण

वकील क्रिस मैन ने उदाहरण के तौर पर न्यूयॉर्क शहर के मेयर एरिक एडम्स से जुड़े हालिया भ्रष्टाचार के मामले का जिक्र किया. उस मामले में, जस्टिस डिपार्टमेंट ने आरोप-पत्र (indictment) को खारिज करने की मांग की थी, जिसके बाद पीठासीन जज ने सरकार की अर्जी को मंजूरी देने से पहले अतिरिक्त स्पष्टीकरण मांगे और सुनवाई की. मामले को खारिज करने के कारणों की विस्तार से जांच करने के बावजूद, अदालत ने अभियोजकों को केस आगे बढ़ाने के लिए मजबूर नहीं किया. 

कानूनी जानकारों का कहना है कि एडम्स केस ने यह बात साफ कर दी है कि भले ही जज गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार के तर्क की जांच कर सकते हैं, लेकिन किसी मुकदमे को आगे न बढ़ाने के एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) के फैसले को पलटने का न्यायपालिका का अधिकार बहुत सीमित है.

अदाणी की ओर से 24 जून, 2026 को कोर्ट को भेजे गए पत्र के अनुसार, यह मामला अमेरिकी कानून के दायरे से बाहर था. ये लेन-देन पूरी तरह से अमेरिका से बाहर के जारीकर्ताओं और कर्ज देने वालों के बीच हुए थे. सभी ऑफरिंग डॉक्यूमेंट्स अमेरिका से बाहर तैयार, रिव्यू और मंजूर किए गए थे, और दोनों बॉन्ड ऑफरिंग इंग्लिश कानून के तहत थे - जिससे मॉरिसन बनाम नेशनल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार यह मामला अमेरिकी सिक्योरिटीज कानून के दायरे से बाहर हो गया.

रिश्वत के आरोप साबित नहीं हो सके

भारत के एक पूर्व सीनियर रेगुलेटरी अधिकारी के एक्सपर्ट साक्ष्य से पता चला कि जिन पेमेंट को गैर-कानूनी बताया जा रहा था, वे असल में कीमतों में की गई उन कानूनी और पारदर्शी कटौती से जुड़ी थीं, जो अदाणी ग्रीन ने भारतीय सरकारी बिजली कंपनियों को सोलर एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट साइन करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से दी थीं - ये आम कमर्शियल रियायतें थीं, न कि रिश्वत. DOJ का यह फैसला एक गहन और विस्तृत समीक्षा के बाद आया. अदाणी ने फरवरी और अप्रैल 2026 के बीच DOJ को लगभग 500 पेज के तथ्य, कानूनी जानकारी, एक्सपर्ट की गवाही और तर्क सौंपे थे. इनमें हार्वर्ड लॉ स्कूल के सिक्योरिटीज लॉ के प्रोफेसर और SEC के पूर्व कमिश्नर समेत कई लोगों की एक्सपर्ट रिपोर्ट के साथ 118 पेज का एक पत्र भी शामिल था. उन्होंने यह भी बताया कि किसी भी निवेशक का कोई पैसा नहीं डूबा है. आरोप-पत्र में इन चार लेन-देन में से किसी से भी निवेशकों को हुए नुकसान का जिक्र नहीं है. 2021 के बॉन्ड की अवधि पूरी हो चुकी है और सारा ब्याज चुका दिया गया है; 2024 के बॉन्ड का कोई भी पेमेंट नहीं रुका है; 2021 का लोन पूरी तरह चुका दिया गया है; और 2023 का लोन डिफॉल्ट नहीं हुआ है.

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(Disclaimer: New Delhi Television is a subsidiary of AMG Media Networks Limited, an Adani Group Company.)

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