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क्या अखिलेश यादव के PDA के दबाव में हुआ योगी आदित्यनाथ कैबिनेट का विस्तार, क्या कमाल कर पाएगी 'टीम 60'

उत्तर प्रदेश में रविवार को हुए योगी आदित्यनाथ कैबिनेट के विस्तार के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं अजित कुमार झा.

क्या अखिलेश यादव के PDA के दबाव में हुआ योगी आदित्यनाथ कैबिनेट का विस्तार, क्या कमाल कर पाएगी 'टीम 60'
नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश में राजनीति की दिशा कम बल्कि उसकी चाल ज्यादा बदलती है, वह भी बिना कोई संकेत दिए हुए.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने वही किया है जो दबाव में आईं सरकारें अक्सर करती हैं, मंत्रिमंडल का विस्तार. योगी कैबिनेट में छह नए मंत्री शामिल किए गए और दो मंत्रियों को प्रमोशन दिया गया. बीजेपी ने इसे सामान्य प्रशासनिक फैसला बताकर पेश किया, लेकिन यूपी की राजनीति में 'सामान्य' अक्सर वही कहलाता है, जब असली राजनीतिक फैसला पहले ही लिया जा चुका होता है.

अब इसे 'टीम 60' कहा जा रहा है, जैसे कोई राज्य सरकार न हो बल्कि खेल की टीम हो. मानो लखनऊ ड्रेसिंग रूम हो और 2027 का विधानसभा चुनाव कोई चैंपियनशिप, जिसे केवल नेताओं की लोकप्रियता से नहीं बल्कि सही सामाजिक समीकरण बनाकर जीता जाना हो. पहले योगी सरकार में 54 मंत्री थे. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब नौ महीने पहले मंत्रिमंडल का यह विस्तार साफ दिखाता है कि सरकार दबाव महसूस कर रही है. यह कदम विपक्ष के हमले से ज्यादा, योगी सरकार की छवि को लेकर बन रही कहानी का जवाब लगता है.

अखिलेश यादव का पीडीए बना चुनौती

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने केवल योगी सरकार के कामकाज को चुनौती ही नहीं दी है, बल्कि जाति आधारित राजनीति के पूरे समीकरण को भी नई तरह से पेश किया है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटें जीत ली थीं. उनकी रणनीति का आधार था 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) था. यह सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि ऐसा संदेश था जिसमें इन वर्गों के लोग खुद को संभावित सत्ता का हिस्सा महसूस कर सकें. इसका असर साफ दिखा. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटें 2019 की 62 सीटों से घटकर 2024 में 33 रह गईं. यानी PDA की राजनीति ने बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया.

ऐसे में योगी की 'टीम 60' एक सोची-समझी राजनीतिक चाल की तरह दिखाई देती है.अगर पीडीए अखिलेश यादव की तेज़ और सटीक यॉर्कर है, तो बीजेपी का यह मंत्रिमंडल विस्तार अगली गेंद से पहले अपनी रणनीति मजबूत करने की कोशिश लगता है. विपक्ष पूछ रहा है, 'अभी क्यों?' और बीजेपी उसका जवाब नए चेहरों के जरिए दे रही है.अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलित चेहरों पर जोर देकर योगी सरकार यह दिखाना चाहती है कि वह अखिलेश की पीडीए राजनीति का सीधा जवाब देने को तैयार है.

अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों का वोट साधने के लिए पीडीए फार्मूला दिया है.

अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों का वोट साधने के लिए पीडीए फार्मूला दिया है.

योगी मंत्रिमंडल का जातीय समीकरण

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चेहरे कभी सिर्फ चेहरे नहीं होते, वे एक राजनीतिक संदेश लिए हुए होते हैं. नए मंत्रिमंडल का जातीय गणित बहुत सोच-समझकर बनाया गया दिखता है. इसमें दो अनुसूचित जाति के नेता (जिनमें एक महिला भी शामिल हैं), चार ओबीसी नेता, एक जाट और एक ब्राह्मण चेहरे को शामिल किया गया है. ऊपर से देखने पर यह सिर्फ सामाजिक संतुलन लगता है, लेकिन असल में यह एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है. उदाहरण के लिए मनोज पांडेय को देखें. ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. वे फरवरी 2024 में समाजवादी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. ठीक उसी समय जब पीडीए की राजनीति जोर पकड़ रही थी. वे 2012 से 2017 तक अखिलेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.

उनकी वापसी एक बड़ा राजनीतिक संदेश देती है. वह यह कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था. अब बीजेपी उसकी नाराज़गी को दूर करने की कोशिश कर रही है. यह सिर्फ नए नेता को शामिल करना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना भी है कि कहीं न कहीं पार्टी से कुछ गलती हुई थी. मनोज पांडेय को शामिल करने को यूजीसी गाइडलाइन विवाद से भी जोड़कर देखा जा रहा है. ओबीसी छात्रों के आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद ऊंची जातियों के छात्रों में नाराज़गी बढ़ी थी और बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन भी हुए थे. ऐसे माहौल में बीजेपी ऊंची जातियों को फिर से भरोसे में लेने की कोशिश करती दिख रही है. यूपी की राजनीतिक गलियों में अब मजाक भी चल रहा है, ''क्या अखिलेश के PDA में 'P' का मतलब पंडित भी है?''

सपा से बगावत कर बीजेपी में आए मनोज पांडेय को भी कैबिनेट में जगह मिली है.

सपा से बगावत कर बीजेपी में आए मनोज पांडेय को भी कैबिनेट में जगह मिली है.

मंडल और कमंडल का संतुलन

इसके बाद आते हैं कृष्णा पासवान और सुरेंद्र दिलेर जिन्हें अनुसूचित जाति वर्ग से मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है. यह सिर्फ सीट भरने का मामला नहीं है, बल्कि उन वोटरों को संदेश देने की कोशिश है जो सम्मान मिलने पर जुड़ते हैं और उपेक्षा महसूस होने पर दूर हो जाते हैं. इनमें से एक महिला नेता का शामिल होना भी महत्वपूर्ण है. इससे यह कदम सिर्फ राजनीतिक गणित नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश जैसा दिखाई देता है.

असली दिलचस्पी ओबीसी समीकरण में है. यहीं पर 'मंडल' और 'कमंडल' की राजनीति को जोड़ने की कोशिश दिखती है.'मंडल राजनीति' यानी पिछड़ी जातियों को राजनीतिक रूप से संगठित करने की राजनीति, जबकि 'कमंडल राजनीति' हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति को कहा जाता है,जो योगी आदित्यनाथ की मुख्य ताकत मानी जाती है. योगी कैबिनेट में  हंसराज विश्वकर्मा (विश्वकर्मा/बढ़ई समाज), कैलाश राजपूत (लोध राजपूत), सोमेंद्र तोमर (गुर्जर, जिन्हें प्रमोशन मिला) और अजित पाल (पाल समाज, प्रमोट किए गए) जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया है. इन नामों के पीछे बड़ी जातीय आबादी और वोट बैंक जुड़े हुए हैं. सरकार इन्हें योग्यता के आधार पर प्रमोशन बताती है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह उन समुदायों को भरोसा दिलाने का प्रयास भी है, जो खुद को प्रतिनिधित्व से वंचित महसूस कर रहे थे. संदेश साफ है,''हम आपकी नाराज़गी को समझ रहे हैं.'' इस तस्वीर को पूरा करते हैं भूपेंद्र चौधरी, जो जाट समुदाय से आते हैं. यूपी की राजनीति में जाटों की भागीदारी कभी मामूली नहीं मानी जाती. यह वह सामाजिक संतुलन है, जो राजनीतिक समीकरण को बिगड़ने से रोकता है.

अखिलेश का योगी आदित्यनाथ पर हमला 

बीजेपी के रणनीतिकार इसे एक बड़ी राजनीतिक चाल मान रहे हैं. लेकिन अखिलेश यादव इसे देर से छपा हुआ चुनावी पोस्टर बता रहे हैं. उनका आरोप है कि बीजेपी अब उन सामाजिक वर्गों को साधने की कोशिश कर रही है, जिन्हें वह पहले नजरअंदाज करती रही है. यानी सरकार अब चुनाव करीब आते ही समाज के अलग-अलग वर्गों को संदेश भेज रही है. अखिलेश का हमला सिर्फ राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि एक तरह का राजनीतिक प्रदर्शन भी रहा है. उनका कहना है,''नौ साल में कुछ नहीं किया, तो नौ महीने में क्या कर लेंगे?'' यानी उनका आरोप है कि सरकार ने लंबे समय तक समाज के कई वर्गों को नजरअंदाज किया और अब चुनाव नजदीक आते ही दिखावटी कदम उठाए जा रहे हैं. अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ को 'कूरियर मैसेंजर' बताया, यानि एक ऐसा मुख्यमंत्री, जो लखनऊ से सरकार चलाने के बजाय दिल्ली से आए निर्देशों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. इसके बाद उनका ट्वीट आया, ''चिट्ठी आ गई क्या?'' इस एक लाइन में उन्होंने पूरे मंत्रिमंडल विस्तार को ऐसे पेश करने की कोशिश की, मानो यह फैसला जनता की जरूरत नहीं बल्कि ऊपर से आया आदेश हो.यूपी में विपक्ष की राजनीति सिर्फ आंकड़ों से नहीं, माहौल और संदेश से भी चलती है. अखिलेश चाहते हैं कि 'टीम 60' लोगों को एक मजबूत रणनीति नहीं, बल्कि घबराहट में उठाया गया कदम लगे. ऐसा फैसला, जो बहुत देर से लिया गया हो.

नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक.

नए मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक.

मंत्रिमंडल विस्तार का समय महत्वपूर्ण क्यों है

इस मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसे मंत्री बनाया गया?, बल्कि यह है कि अभी क्यों बनाया गया? चुनाव से नौ महीने पहले का समय राजनीति में बड़ा दिलचस्प होता है. इतना कम कि कोई भी बड़ा बदलाव घबराहट जैसा लग सकता है, लेकिन इतना लंबा भी कि कई जिलों में राजनीतिक माहौल बदला जा सके.नए समुदायों तक पहुंच बनाई जा सके और नाराज़ नेताओं को फिर से जोड़ा जा सके. लेकिन क्या सिर्फ सामाजिक संतुलन बनाने से वोट भी मिल जाएंगे? यही सबसे बड़ा सवाल है.

बीजेपी नेता अब अपने नए सामाजिक समीकरण को बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे हैं. उनका दावा है कि सरकार में अब 25 ओबीसी मंत्री, 11 दलित मंत्री, 21 सवर्ण मंत्री, एक मुस्लिम, एक सिख और एक पंजाबी खत्री चेहरा शामिल है. यानी एक ऐसे इंद्रधनुष का निर्माण, जो 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' का संदेश देता है. बीजेपी की रणनीति यह दिखती है कि हिंदुत्व की राजनीति के साथ-साथ पिछड़े और दलित वर्गों की आकांक्षाओं को भी जोड़ा जाए.इसे कुछ लोग 'सबऑल्टर्न सैफ्रन फॉर्मूला' भी कह रहे हैं यानी भगवा राजनीति को सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ मिलाने की कोशिश.

अखिलेश यादव के मुताबिक, बीजेपी सिर्फ पीडीए की कहानी को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, जबकि सरकार की असली सोच और कामकाज वही पुराना है. वहीं बीजेपी का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी मजबूरी नहीं, बल्कि समय के साथ जरूरी सुधार है. पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि जातीय समीकरणों को सिर्फ चुनाव के वक्त याद नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें लगातार संभालना पड़ता है. मंत्रिमंडल विस्तार कई सालों की नीतियों को अचानक नहीं बदल सकता. यह आर्थिक परेशानियों को खत्म नहीं कर सकता और लोगों की नाराज़गी भी तुरंत दूर नहीं कर सकता. लेकिन यह एक काम जरूर कर सकता है, वह यह कि सरकार की छवि को नए तरीके से पेश करना. जब सरकार नए चेहरों को आगे लाती है, तो समाज के कुछ वर्गों को यह महसूस होता है कि अब उनकी तरफ भी ध्यान दिया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां प्रतीकों और संदेशों का असर कई बार कानूनों से भी ज्यादा तेज़ होता है,'टीम 60' शायद सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह बीजेपी की तरफ से अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति को समझने और उसका जवाब देने की कोशिश है. फर्क सिर्फ इतना है कि जवाब किसी बड़ी नई नीति से नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण बदलकर दिया जा रहा है.

माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह योगी कैबिनेट का अंतिम विस्तार है,

माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह योगी कैबिनेट का अंतिम विस्तार है,

क्या हिंदुत्व और सामाजिक न्याय की राजनीति मिल जाएगी

अब सवाल यह है कि यह 'सबऑल्टर्न सैफ्रन फॉर्मूला' कितना सफल होगा. यानी क्या बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति के साथ पिछड़े, दलित और दूसरे सामाजिक वर्गों को भी मजबूती से जोड़ पाएगी? यह फैसला प्रेस कॉन्फ्रेंस, ट्वीट या जातीय आंकड़ों से तय नहीं होगा. असली जवाब मतदान वाले दिन मिलेगा, मतदान केंद्रों पर, जहां प्रतीकवाद और रोजमर्रा की परेशानियां आमने-सामने आती हैं. जहां सम्मान की भावना और सरकारी कामकाज की हकीकत टकराती है. और आखिर में, जहां पहचान की राजनीति वोटों के गणित से मिलती है.
'टीम 60' तैयार हो चुकी है. लेकिन मैच का नतीजा आना अभी बाकी है.

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