- 7 राज्यों में कांग्रेस के पास सिर्फ सिंगल डिजिट में वोट शेयर
- केवल केरल में कांग्रेस अकेले 20 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने में सक्षम है, अन्य राज्यों में मदद आवश्यक है
- पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कुल 99 सीटें मिलीं, जिनमें से लगभग 37 क्षेत्रीय पार्टियों के कारण मिलीं
एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते, ना तो क्षेत्रीय दल और ना ही कांग्रेस. यदि क्षेत्रीय दल कमजोर होंगे तो कांग्रेस यह नहीं कह सकती कि उसे कोई फायदा होगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि भारत के मैप को देखेंगे तो बिहार, तमिलनाडु, यूपी, दिल्ली, ओडिशा, आंध्र प्रदेश समेत 7 राज्यों में कांग्रेस के पास सिर्फ सिंगल डिजिट में वोट शेयर है. कांग्रेस की हालत यह है कि वह केरल के अलावा किसी भी राज्य में 20 से ज्यादा सीटें नहीं जीत सकती है. ऐसे में वह कैसे सत्ता की ओर बढ़ पाएगी? पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई की मानें तो सहयोगी दलों की मदद के बिना कांग्रेस के लिए किसी भी राज्य में डबल डिजिट सीटें जीतना मुश्किल है.
क्षेत्रीय पार्टियों के खड़ी नहीं रह सकती कांग्रेस
अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में हार का सामना करना पड़ा. तमिलनाडु में स्टालिन की कुर्सी भी चली गई. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का किला भी ढह गया. हालांकि, एक समय ऐसा माना जा रहा था कि केजरीवाल, स्टालिन और ममता को कोई हिला नहीं पाएगा. ममता बनर्जी को भी ऐसा लगता था, इसलिए उन्होंने कांग्रेस का हाथ भी झटक दिया था. लेकिन जब बंगाल में टीएमसी का किला ढहा, तो कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को लगा कि इसका कहीं न कहीं कांग्रेस को फायदा मिलेगा. न्यूज एजेंसी ANI के पॉडकास्ट में रशीद किदवई ने कहा कि किसी भी राज्य में कांग्रेस, क्षेत्रीय पार्टियों के बिना खड़ी नहीं रह सकती है.
7 राज्यों में सिर्फ सिंगल डिजिट में कांग्रेस का वोट शेयर
कांग्रेस की कमजोर नस का जिक्र करते हुए रशीद किदवई ने कहा, 'बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और दिल्ली, इन सात राज्यों में लगीाग 247 लोकसभा सीटें हैं. आपको जानकार हैरानी होगी कि यहां कांग्रेस का वोट शेयर सिंगल डिजिट में हैं. 4, 6, 7, परसेंट, ऐसे में कांग्रेस के नेता कैसे कल्पना कर सकते हैं कि वो बिना क्षेत्रीय पार्टियों के चुनाव लड़ सत्ता हासिल कर सकते हैं. इन 247 सीटों के लिए कांग्रेस को किसी न किसी क्षेत्रीय पार्टी का हाथ थामना ही पड़ेगा.'
...तो पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 50 से 60 सीटों तक सिमट जाती
रशीद किदवई ने बताया, 'सिर्फ केरल ही ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस अपने दाम पर 20 लोकसभा सीटें जीतने का दम रखती है. इसके अलावा हर राज्य में कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों की मदद की जरूरत होगी ही होगी. इसकी एक वजह यह भी है कि कांग्रेस के पास ज्यादातर राज्यों में अपना ग्राउंड लेवल पर वो कैडर नहीं है, जो क्षेत्रीय पार्टियों के पास है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटें मिली, जिनमें से लगभग 37 सीटें उन्हें क्षेत्रीय पार्टियों की वजह से मिली थीं. अगर क्षेत्रीय पार्टियों का साथ नहीं मिलता, तो कांग्रेस सिर्फ 50 से 60 सीटों के बीच में सिमट कर रह जातीं.'
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ऐसे में बंगाल में अगर टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके की हार हुई है, तो इससे कांग्रेस को खुश होने की जरूरत नहीं है. हां, इतना जरूर है कि टीएमसी के तेवर कुछ ढीले हुए हैं. ये पिछले दिनों हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक में भी देखने को मिला. कांग्रेस भी इस बात को अच्छे से समझती है कि क्षेत्रीय पार्टियों की मदद के बिना उसका गुजारा नहीं चलने वाला है. इसलिए इंडिया ब्लॉक की बैठक में सोनिया गांधी ने खुले दिल से ममता बनर्जी को गले से लगाया.
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