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शिक्षकों की नई चुनौती- 'AI गुरु' के जमाने में 'बागी' जेन जी को क्या क्या सिखाएं?

आज देश भर में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है. इस अवसर पर आइए जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में शिक्षक और छात्र का संबंध किस तरह से बदल रहा है.

नई दिल्ली:

आज शिक्षक दिवस है.हर साल 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है. इस दिन को टीचर्स डे की तरह मनाने का किस्सा बहुत रोचक है. वर्ष 1962 में देश के दूसरे राष्ट्रपति और महान दार्शनिक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर उनके कुछ छात्र और मित्र उनका जन्मदिन मनाना चाहते थे. इस पर डॉ सर्वपल्ली ने कहा था कि जन्मदिन अलग से मनाने के स्थान पर 5 सितंबर को आप देश भर के शिक्षकों के समर्पण और योगदान को सम्मानित करने के लिए 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाएंगे तब मुझे खुशी होगी. बस उसी समय से इस परंपरा की शुरूआत हुई. अपने व्यक्तिगत जीवन को जनमानस के महत्व से जोड़ देने के कारण इस दिन का विशेष महत्व बन गया. शिक्षक से ऐसी ही उम्मीद होती है कि वह स्वंय से पहले समाज के बारे में चिंता करे.

समाज का लाइट हाउस है शिक्षक

शिक्षक को समाज का प्रकाश स्तंभ यानी लाइट हाउस भी कहा जाता है. दरअसल अंधेरे से उजाले की राह दिखाने का काम सदियों से गुरु का रहा है. अज्ञान से ज्ञान की राह दिखाने की जिम्मेदारी भी शिक्षक के कंधों पर ही डाल दी गई थी. यह तब की बात है जब समाज अल्प शिक्षित अथवा बड़ी संख्या में अशिक्षित था. आज स्थिति बदल गई है. आज के माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता से इतर छात्रों की जानकारी का संसार समृद्ध होता जा रहा है. बालक और युवा गूगल से आगे बढ़कर आर्टिफिशल इंटेलीजेंस के समय में पहुंच गए हैं. आज पलक झपकते ही उन्हें जानकारियों का ज़खीरा उपलब्ध हो जाता है. यह कितना सटीक है, इस पर चर्चा बाद में करते हैं, मगर जानकारी प्राप्त करने का साधन बदल जाने की स्थिती में गुरु शिष्य संबंधों पर असर होना लाजमी है. 

जिस दौर में विद्यार्थी ज्ञान के लिए, मार्गदर्शन के लिए और सुझाव के लिए सिर्फ शिक्षक पर निर्भर थे, उस समय गुरु-शिष्य संबंध एक सीमित दायरे में रहते हुए अधिक सम्मानपूर्ण थे. आज हर बात के लिए युवा सिर्फ शिक्षक से मिलने वाली जानकारी पर निर्भर नहीं है बल्कि वे जानकारी के लिए पुस्तकों और शिक्षक से अधिक गूगल और एआई पर भरोसा करने लगे हैं. सच्चाई यह है कि इसके बावजूद शिक्षक की अहमियत अथवा जरूरत आज और अधिक बढ़ी है.बालक आज भी विश्वसनीय जानकारी के लिए अपने शिक्षकों पर भरोसा कर रहे हैं. वह आज भी अपने शिक्षकों द्वारा अलग से पहचाने जाने का प्रयास करते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के कुछ विद्यार्थियों से इस बाबत मेरी बात हुई. यह वही युवा हैं जो कुछ समय पहले जंतर-मंतर पर एकत्र हुए थे. इनके अनुसार यदि शिक्षक कड़वी बात भी बोलते हैं लेकिन वह सम्मानपूर्ण तरीके से कही जा रही है, तब उसका स्वागत है.

एआई के दौर में जानकारियों के स्रोत

यह युवा अपने घरों से दूर रहकर शिक्षा प्राप्त करने और अपना बेहतर भविष्य बनाने का सपना देखने के लिए आए हैं. एआई के दौर में इनके पास जानकारियों का आभाव नहीं है बल्कि इनके चारों ओर जानकारियां फैली हुई हैं. तकनीक के युग में सिर्फ जानकारी तो यह अपने गांव-कस्बे में भी प्राप्त कर सकते हैं लेकिन किस छात्र के लिए क्या सही और बेहतर है, यह जानने के लिए आज शिक्षक की अधिक आवश्यकता है. जेएनयू के एक युवा का कहना है,"मेरे जीवन में वही शिक्षक महत्वपूर्ण है जो मुझे समझता है."

बात दरअसल यह है कि आज के युवा होते हुए छात्र-छात्राएं किसी भी तरह नासमझ नहीं हैं. वह अपना भला-बुरा समझते हैं लेकिन वह अपने से ज्यादा जानकारी रखने वाले और उनका भला चाहने वालों के आसपास बने रहना चाहते हैं. इसीलिए कॉलेज में शिक्षक आज भी विद्यार्थियों से घिरे रहते हैं. नस्कूली जीवन में बाध्यता और अनुशासन अधिक है. वहां के और कॉलेज के माहौल में दिन-रात का अंतर होता है. कॉलेज के युवा अपने जीवन में शिक्षक के महत्व को किस तरह आंकते हैं, हम इस पर विचार कर रहे हैं. इसी क्रम में मैंने महसूस किया कि जंतर-मंतर पर पहुंचने वाले कुछ युवाओं के विचार क्रांतिकारी थे. जैसा हर युग में होता आया है, वह स्वंय को बदलाव का सूचक मानते हैं. आमतौर पर युवाओं का मानना होता है कि वह अपने समय को बेहतर बनाने और भविष्य के लिए सुंदर तस्वीर बनाने के लिए प्रयासरत हैं. इस पीढ़ी को दोस्ताना व्यवहार की दरकार है. दिल्ली विश्वविद्यालय के एक युवा ने शिक्षक दिवस पर मेरे सवाल का जवाब देते हुए कहा, "हमारे लिए हर वो व्यक्ति शिक्षक हो सकता है, जो हमें कुछ सिखाता है. पर शर्त यही है कि वो हमें सिखाए. ज्ञान देने की चीज है, थोपने की नहीं."

इससे अलग कुछ शिक्षक, प्रोफेसर्स आदि से भी मेरी बात हुई. प्रोफेसर प्रीति सागर कहती हैं, " मैं जेन-जी के साथ बहुत घुल-मिल नहीं सकती. लेकिन दोस्ताना रवैया अपनाती हूं. मित्रवत व्यवहार के साथ उन्हें कुछ समझाया जाए तब वह हर बात समझते हैं." एक सच्चाई यह है कि आज के जेन-जी, हर दौर के युवा की तरह जोश से भरे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि उनके पास देश से लेकर दुनियाभर की जानकारियों का अंबार है. यही बात उन्हें अलग खड़ा करती है. वे जोखिम उठाने से डरते नहीं, वे पलटकर सवाल पूछने में झिझक महसूस नहीं करते. वे अधूरी या गलत जानकारी देने पर शिक्षक को कटघरे में खड़ा करने से भी नहीं चूकते. यदि उन्हें सही शिक्षक मिलता है तो वह इज्जत देना, सम्मान देना जानते हैं परन्तु वे भेड़चाल नहीं चलेंगे, यह पक्की बात है. इसी बात को दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने इस तरह कहा,''युवाओं में जोश है. जेन-जी इससे इतर नहीं है. वे सम्मान देना जानते हैं. उन्हें मालूम है कि उनके जीवन में शिक्षक की भूमिका तब तक रहेगी जब तक वह चाहेंगे. शिक्षक से चलने वाला रिश्ता जीवन भर का हो भी सकता और नहीं भी. यह बालकों पर निर्भर करता है. रही बात हमारी तो हम एक निश्चित सीमा तक बालकों से मित्रता रखते हैं, उसके बाद दोनों की निजता का दायरा आ जाता है."

आज के युवाओं के लिए कितना जरूरी है मोबाइल

प्रोफेसर दर्शन पांडेय ने जेन-जी की मानसिकता पर मेरे सवाल का जवाब देते हुए कहा, "परिवर्तन बहुत हुआ है.नई पीढ़ी में बहुत बदलाव हुआ है. जेन-जी के बनने में उनके घर का माहौल, स्कूलिंग, पेरेंटिंग का असर महत्वपूर्ण है. आज बच्चों के साथ परिवार और मां-बाप का संवाद घटा है. बच्चे परिवार के स्थान पर मोबाइल के साथ अधिक समय बिता रहे हैं. इससे उनकी सोच, व्यवहार और भाषा-शैली पर असर हो रहा है. कॉलेज में भी बच्चे लाइब्रेरी के स्थान पर एआई पर निर्भर हो रहे हैं. इससे धीरज और लगन में कमी आ रही है."

मुझे लगता है कि हर युग का युवा क्रान्तिकारी होता है. विश्व की महानतम क्रांतियों में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसमें फ्रांस की क्रांति (1968), चेकोस्लोवाकिया की मखमली क्रांति (1989) और दक्षिण कोरिया (जून डेमोक्रेटिक स्ट्रगल, 1987) हमारे सामने उदाहरण के रूप में मौजूद हैं. इसी श्रृंखला में 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलन ने इस राष्ट्र की तस्वीर ही बदल दी. जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के साथ लगभग समूचे भारत में उठी बदलाव की आवाज बताती है कि युवा जब-जब चाहते हैं, बदलाव ला सकते हैं. ऐसे में सवाल वही है कि पहले के युवा और आज के जानकारियों से समृद्ध युवाओं के व्यवहार में बहुत परिवर्तन आए हैं. आज के विद्यार्थी साधन के बेहतर प्रयोग करने, बहुत बार शिक्षकों को नई तकनीक समझाते हुए उनके शिक्षक की भूमिका भी निभाते हैं. यदि दोनों ओर से सम्मानपूर्ण रिश्ता बना रहे, एक-दूसरे की निजता के दायरे का सम्मान रहे तब आज का शिक्षक दिवस अधिक प्रासंगिक होगा. यह सिर्फ किताबी ज्ञान और व्यवहारिक समझ साझा करने आगे बढ़कर वैश्विक मुद्दों को समझने, अपने देश के माहौल के अनुसार साधन, विज्ञान और संसाधनों के प्रयोग में भी सहायक होगा.

(डिस्क्लेमर: लेखिका साहित्यकार, मोटिवेशनल स्पीकर और समाजसेवी हैं. उनके अब तक तीन उपन्यास समेत 25 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. लेखन और साहित्य में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया, मराठी, हरियाणवी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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