- तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन भारत का सबसे पुराना चालू कमर्शियल न्यूक्लियर रिएक्टर है.
- इस स्टेशन की स्थापना 1960 के दशक में अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक और बेचटेल कंपनियों के सहयोग से हुई थी.
- स्टेशन ने दशकों में सुरक्षा सुधार, तकनीकी आधुनिकीकरण और स्वदेशी उपकरणों के विकास के जरिए अपनी क्षमता बढ़ाई है.
अरब सागर के किनारे बसा भारत का यह परमाणु पावर प्लांट 57 साल का हो चुका है, लेकिन आज भी पूरी मजबूती से चल रहा है. इसके इतना पुराने होने के बाद भी इसमें कोई कमियां नहीं दिखती हैं. तारापुर एटॉमिक पावर स्टेशन के यूनिट 1 और 2 के कंट्रोल रूम में कदम रखने के बाद ऐसा लगता है जैसे आप भारत के वैज्ञानिक इतिहास को आंखों के सामने घटना-दर-घटना गुजरते देख रहे हों. टिमटिमाते पैनल, गूंजती मशीनें और चौकस ऑपरेटर सिर्फ एक बिजलीघर नहीं चला रहे हैं, बल्कि वे उस नींव को जिंदा रखे हुए हैं जिसने लगभग छह दशक पहले भारत के कर्मिशियल न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम की शुरुआत की थी.
हाल ही में नया रूप दिया गया यह कंट्रोल रूम बिल्कुल चमचमाता हुआ दिखता है, मानो अभी-अभी इसका रंग-रोगन हुआ हो.
बिजली बनाना शुरू करने के 57 साल बाद भी तारापुर एटॉमिक पावर स्टेशन की पहली यूनिट दुनिया के सबसे पुराने चालू कमर्शियल न्यूक्लियर रिएक्टर के तौर पर काम कर रही है. भारत के लिए यह सिर्फ इंजीनियरिंग का एक अजूबा नहीं है, बल्कि यह वह जगह है जहां से देश की परमाणु ऊर्जा की दुनिया में शून्य से शिखर तक पहुंचने की सफर शुरू हुआ था.
कंट्रोल रूम के भीतर, दशकों के तकनीकी विकास के बीच खड़े होकर तारापुर एटॉमिक पावर स्टेशन 1 और 2 के स्टेशन डायरेक्टर विनय थत्ते अपनी उस यात्रा को याद करते हैं जिसने उनकी जिंदगी को संवारा है.

विनय थट्टे, तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन 1 और 2 के स्टेशन निदेशक
Photo Credit: Pallava Bagla/NDTV
इस स्टेशन पर 37 साल से ज्यादा वक्त बिता चुके मैकेनिकल इंजीनियर थत्ते इस रिएक्टर के बारे में बड़े प्यार और अपनापन से बात करते हैं. वह कहते हैं, "यह मेरा परिवार है, मेरा बच्चा है और मेरे लिए एक बहुत ही पाक जगह है."
उनका यह जुड़ाव होना स्वाभाविक भी है. बीते दशकों में उन्होंने तारापुर को विदेशी सप्लायरों पर टिकी एक आयातित तकनीक से बदलकर भारतीय इंजीनियरिंग और देसी हुनर से चलने वाली एक पूरी तरह आत्मनिर्भर जगह में बदलते देखा है.
उस दौर में तारापुर एक पिछड़ा हुआ इलाका हुआ करता था. न तो सड़कें अच्छी थीं और न ही दूसरी बुनियादी सुविधाएं. लेकिन इसके बावजूद यह प्रोजेक्ट बहुत तेजी से आगे बढ़ा और सिर्फ पांच सालों के भीतर दोनों यूनिटों से बिजली का प्रोडक्शन शुरू हो गया.
इस तरह भारत का पहला बड़ा कमर्शियल न्यूक्लियर पावर स्टेशन तैयार हुआ, जो आने वाली पीढ़ियों के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए सीखने की सबसे बड़ी जगह बना.
आज भी यह स्टेशन बहुत ही सस्ती दरों पर बिजली पैदा कर रहा है. थत्ते के मुताबिक, फिलहाल यह प्लांट लगभग 3.31 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली बेचता है, जो भारत में बिजली के सबसे सस्ते जरिया में से एक है.
इसकी एक दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी भी है. जब यह स्टेशन पहली बार चालू हुआ था, तब यहां से मिलने वाली बिजली की कीमत सिर्फ छह पैसे प्रति यूनिट थी. लगभग छह दशक बीत जाने के बाद भी, तमाम महंगाई, नई तकनीक के बदलावों और सुरक्षा के बड़े इंतजाम के बावजूद, यह प्लांट आज भी देश के सबसे किफायती बिजलीघरों में शुमार है.
इसके साथ ही, प्रोडक्शन के दौरान इससे कार्बन-डाइऑक्साइड का कोई उत्सर्जन भी नहीं होता. लेकिन इतनी लंबी उम्र यूं ही हासिल नहीं हो जाती.
1960 के दशक में बने रिएक्टर को 2020 के दौर में भी सुरक्षित तरीके से चलाते रहने के लिए लगातार चौकसी, नई तकनीक के इस्तेमाल और दुनियाभर के तजुर्बों से सीखने का जज्बा बेहद जरूरी होता है.
साल 1979 में अमेरिका के थ्री माइल आइलैंड हादसे के बाद यहां ऑपरेटरों की ट्रेनिंग पर खासा ध्यान दिया गया. इंसानी भूल की वजह से रिएक्टर के काम में कोई गड़बड़ न हो, इसके लिए नए सिस्टम लाए गए.
इसके बाद 1986 के चेरनोबिल हादसे के बाद रिएक्टर की हिफाजत और इसके सही ढंग से काम करने की व्यवस्था को और ज्यादा मजबूत बनाया गया.
फिर 2000 के दशक की शुरुआत में पूरे डिजाइन की नए सिरे से जांच की गई और आधुनिकीकरण की एक नई लहर सी आ गई. दोनों रिएक्टरों के लिए अलग-अलग सिस्टम बनाए गए, अतिरिक्त इमरजेंसी डीजल जनरेटर लगाए गए और सुरक्षा से जुड़े तमाम उपकरणों को और पुख्ता तरीके से लगाया गया.
इसके बाद फुकुशिमा का हादसा हुआ.
साल 2011 में जापान के इस हादसे ने दुनिया भर में न्यूक्लियर सुरक्षा की सोच को बदल कर रख दिया. तारापुर भी इससे अलग नहीं था.
थत्ते के अनुसार, फुकुशिमा के बाद सबसे बड़ा सुधार यह हुआ कि प्राइमरी कंटेनमेंट के अंदर 'नाइट्रोजन इनर्टिंग सिस्टम' लगाया गया. इसका मकसद बेहद सीधा लेकिन असरदार था कि कंटेनमेंट के अंदर से ऑक्सीजन को खत्म करके हाइड्रोजन धमाके की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म कर देना.
इसके अलावा सुनामी के पानी से बचाने वाले खास गेट और अतिरिक्त जनरेटर भी लगाए गए.
प्लांट में 'कंटेनमेंट फिल्टर्ड वेंट सिस्टम' भी लगाए गए, ताकि किसी भी बेहद आपातकालीन स्थिति में ऑपरेटर अंदर के दबाव को सुरक्षित तरीके से बाहर निकाल सकें.
लेकिन तारापुर के हालिया इतिहास का सबसे शानदार अध्याय वो मरम्मत और कायाकल्प का काम है, जिसने इस रिएक्टर को एक तरह से नई जिंदगी दे दी है.
इंजीनियर इसे इस प्लांट में किया गया अब तक का सबसे मुश्किल तकनीकी काम बताते हैं. थत्ते तो इसे चलते हुए न्यूक्लियर रिएक्टर पर 'ओपन हार्ट सर्जरी' करने जैसा कहते हैं. यह तुलना बिल्कुल सही भी है.

तारापुर एटॉमिक पावर स्टेशन 1 और 2 यूनिट्स न्यूक्लियर आइलैंड का एंट्री पॉइंट हैं.
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इस पूरे काम का सबसे अहम हिस्सा था रिएक्टर के रि-सर्कुलेशन पाइपों को बदलना. यह पाइपलाइन रिएक्टर के अंदर पानी घुमाने और उसकी कोर से गर्मी बाहर निकालने का बेहद जरूरी काम करती है.
नियमित जांच के दौरान कुछ वेल्डिंग ज्वाइंट में कुछ निशान दिखाई दिए थे. हालांकि ये कोई दरारें या लीक नहीं थे, फिर भी इंजीनियरों ने एहतियात के तौर पर पूरे सिस्टम को ही बदलकर बेहतर क्वालिटी के मटेरियल से नया बनाने का फैसला लिया.
इस नई पाइपलाइन के लिए 'लो कार्बन नाइट्रोजन स्टील' का इस्तेमाल किया गया, जो अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए जाना जाता है.
लेकिन इस काम को अंजाम देना बेहद चुनौतीपूर्ण था. ये पाइप ऐसे हिस्सों में थे जहां रेडिएशन का असर बहुत ज्यादा था. वहां तक पहुंचने के लिए पहले डक्ट, ढांचों के सहारे, केबल ट्रे और कई दूसरी चीजों को हटाना पड़ा. इन सब रुकावटों को साफ करने के बाद ही इंजीनियर असली पाइपों तक पहुंच सके.
क्या थी इस सफलता की चाबी?
इंजीनियरों ने सबसे पहले रिएक्टर के बाहर इस पूरे सिस्टम का एक हूबहू ढांचा तैयार किया. एक-एक चीज को मिलीमीटर के हिसाब से बिल्कुल वैसा ही बनाया गया. असली काम शुरू करने से पहले टीमों ने बार-बार इसकी प्रैक्टिस की, खास औजार बनाए और अपनी पूरी वर्क सिस्टम को निखारा गया.
इस काम में इंसानी हुनर के साथ-साथ रोबोटिक सिस्टम का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया.
रेडिएशन वाले इलाकों को तुरंत अलग करने के लिए सीसे (Lead) के ब्लॉक बनाए गए. स्वचालित कटिंग और वेल्डिंग की मशीनें देश में ही तैयार की गईं. मुश्किल कामों को दूर से ही अंजाम देने के लिए रिमोट हैंडलिंग सिस्टम बनाए गए.
यह पूरी कोशिश भारतीय इंजीनियरिंग के हुनर का एक शानदार नजारा थी. स्टेशन डायरेक्टर विनय थत्ते बताते हैं, "इसके लिए बहुत ज्यादा प्लानिंग और ढेर सारे मॉक-अप की जरूरत पड़ी."
नतीजा यह है कि आज यह रिएक्टर एक नए अवतार में दशकों तक चलने के लिए पूरी तरह तैयार है.
तारापुर की इस लंबी उम्र की एक सबसे बड़ी वजह यह भी है कि भारत ने विदेशी तकनीकों की जगह अपने देसी विकल्प तैयार कर लिए हैं.
इसके बाद 1980 के दशक के बाद से भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (मुंबई), इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (कल्पक्कम) और देश की स्थानीय इंडस्ट्रीज ने मिलकर काम करना शुरू किया और इसके जरूरी हिस्सों को देश में ही बनाना शुरू कर दिया.
आज स्टेशन डायरेक्टर थत्ते गर्व से बताते हैं कि इसके ज्यादातर सिस्टम पूरी तरह से स्वदेशी हो चुके हैं. यही कहानी इसके ईंधन के साथ भी दोहराई गई.
एक दौर ऐसा भी आया जब अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों की वजह से ईंधन मिलना मुश्किल हो गया था. 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने तारापुर को ईंधन देना बंद कर दिया था. इस चुनौती से निपटने के लिए भारत ने न्यूक्लियर फ्यूल कॉम्प्लेक्स के जरिए देश में ही ईंधन बनाने की क्षमता हासिल कर ली.
थत्ते अब पूरे भरोसे के साथ कहते हैं कि अब ईंधन की कोई कमी नहीं है. इस्तेमाल किए जा चुके ईंधन (स्पेंट फ्यूल) के रखरखाव का तरीका भी समय के साथ काफी बेहतर हुआ है.
इस्तेमाल किए गए ईंधन को पहले रिएक्टर बिल्डिंग के अंदर बने खास पूलों में रखा जाता है, और बाद में दूर बने बड़े स्टोरेज सेंटरों में ट्रांसफर कर दिया जाता है. ये सेंटर कड़े सुरक्षा मानकों के साथ लंबे समय तक ईंधन को सुरक्षित रखते हैं. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों और नियमों की वजह से भारत तारापुर 1 और 2 के इस्तेमाल किए जा चुके ईंधन को री-प्रोसेस नहीं कर सकता है.

तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन 1 और 2 का उद्घाटन 1960 के दशक में हुआ था.
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भविष्य की तरफ देखें तो तारापुर के बारे में सबसे अद्भुत बात यह है कि इंजीनियरों का मानना है कि इसकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है.
इसके ढांचों, सिस्टमों और उपकरणों की मौजूदा हालात को लेकर किए गए जांच के आधार पर स्टेशन डायरेक्टर थत्ते का मानना है कि यह रिएक्टर अभी कम से कम 20 साल और आराम से चल सकता है.
फिलहाल स्टेशन ने 5 साल की लाइफ एक्सटेंशन मांगी है, जिसे रेगुलेटर की सुरक्षा समीक्षा के बाद 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है.
अगर ऐसा होता है तो दुनिया का यह सबसे पुराना चालू रिएक्टर अपनी सेवा के छह दशक से भी आगे निकल जाएगा, जो कि दुनिया भर के न्यूक्लियर प्लांटों में बेहद दुर्लभ बात है.
इससे भी अहम बात यह है कि यह भारत के तेजी से बढ़ते परमाणु ऊर्जा के सपनों को पूरा करने में अपना योगदान देता रहेगा.
और इस विरासत का बहुत बड़ा हिस्सा तारापुर में ही जन्मा है. यही वजह है कि भारत के वैज्ञानिक इतिहास में इस स्टेशन की जगह बहुत खास है.
यह सिर्फ एक न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं है. यह भारत के कमर्शियल न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम का जन्मस्थान है, हज़ारों इंजीनियरों की सबक लेने की जगह है और वह जमीन है जहां भारत ने यह सीखा कि जटिल न्यूक्लियर तकनीक को कैसे बनाया जाता है, कैसे संवारा जाता है और कैसे उस पर महारत हासिल की जाती है.
जैसे-जैसे ऑपरेटर कंट्रोल रूम में बैठकर सिस्टमों पर नजर रखते हैं और पुराने तजुर्बेकार इंजीनियर नई पीढ़ी को तराशते हैं, तारापुर अपने नए भारत की कहानी लिखता रहता है.
1960 के दशक में शुरू हुए इस सफर का भविष्य आज भी बेहद रोशन नजर आता है.दुनिया का सबसे पुराना चालू कमर्शियल न्यूक्लियर रिएक्टर अभी रिटायर होने की कोई जल्दबाजी में नहीं है. ऐसा लग रहा है ये अब भी भारत की सफलता में मीलों साथ चलना चाहता है.
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