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तमिलनाडु में विजय को समर्थन...क्या कांग्रेस फिर से कर रही वो गलती, जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी

तमिलनाडु में 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी टीवीके को सरकार बनाने के लिए सहयोग की जरूरत है, ऐसे में कांग्रेस ने विजय की सरकार के लिए समर्थन की हामी भर दी. इससे दिल्ली 2013 की राजनीति की याद ताजा हो गई है, जब कांग्रेस के समर्थन से बनी केजरीवाल सरकार के बाद पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था, जिससे अब उसकी रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं.

तमिलनाडु में विजय को समर्थन...क्या कांग्रेस फिर से कर रही वो गलती, जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी
  • तमिलनाडु में थलपाति विजय की पार्टी टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन बहुमत से दस सीटें कम हैं
  • कांग्रेस ने भाजपा और उसके सहयोगियों को सत्ता से दूर रखने के लिए टीवीके को समर्थन देने का निर्णय लिया है
  • दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के समर्थन से बनी AAP की सरकार ने कांग्रेस के वोट बैंक को नुकसान पहुंचाया
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तमिलनाडु की राजनीति में थलपाति विजय की पार्टी ने दिग्गज पार्टियों को पछाड़कर जो करिश्मा कर दिखाया, अब तक तो उसका हर कोई मुरीद हो चुका है. लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों के सहारे की दरकरार है. ऐसे में इस वक्त टीवीके की सरकार गठन को लेकर सियासी गठजोड़ भी चल रहा है. तमिलनाडु में तेज होती राजनीतिक हलचल के बीच अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ सरकार गठन का नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का भी है अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके 108 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, मगर वो बहुमत के आंकड़े से अभी भी 10 सीट दूर है. ऐसे में कांग्रेस ने “जनादेश का सम्मान” और “सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखने” का हवाला देते हुए विजय को समर्थन दे दिया. बस यहीं से दिल्ली की पुरानी राजनीति फिर चर्चा में आ गई है. नतीजतन सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस तमिलनाडु में वही गलती दोहराने जा रही है, जो उसने कभी दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को समर्थन देकर की थी?

कांग्रेस की दिल्ली वाली गलती, आखिर क्या हुआ था?

अन्ना हजारे के आंदोलन से लोगों के दिल में जगह बनाने वाली आम आदमी पार्टी ने साल 2013 में चुनाव लड़ा था. साल 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था. उस वक्त कांग्रेस ने यह कहते हुए आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया था कि वह “जनादेश का सम्मान” करना चाहती है और भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखना जरूरी है. नतीजतन कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में पहली बार केजरीवाल की सरकार बनी, लेकिन वह सिर्फ 49 दिनों तक चली. इसके बाद दोबारा चुनाव हुए और आम आदमी पार्टी 67 सीटें जीतकर भारी बहुमत में आ गई. दोबारा हुए चुनाव में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगा क्योंकि जिस पार्टी ने समर्थन देकर केजरीवाल को सत्ता तक पहुंचाया था, वही धीरे-धीरे दिल्ली की राजनीति से लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई और 2015 के चुनाव में शून्य पर सिमट गई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस के वोट बैंक में आप ने सेंध लगा दी और इसका नुकसान कांंग्रेस को दिल्ली विधानसभा चुनावों में हर बार उठाना पड़ा.

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अब तमिलनाडु में वही लाइन?

तमिलनाडु में भी कांग्रेस लगभग वही राजनीतिक तर्क दे रही है. जहां पार्टी का कहना है कि राज्य का जनादेश “धर्मनिरपेक्ष सरकार” के पक्ष में है और भाजपा या उसके सहयोगियों को सत्ता से दूर रखना जरूरी है. सूत्रों के मुताबिक विजय ने कांग्रेस नेतृत्व को पत्र लिखकर समर्थन मांगा था. इसके बाद मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल के बीच इस मुद्दे पर गहन चर्चा हुई. पहले पार्टी इस बात पर विचार हुआ कि टीवीके सरकार को बाहर से समर्थन दिया जाए या सरकार में शामिल हुआ जाए. हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स में खबरें ये भी थी कि टीवीके के समर्थन के लिए तमिलनाडु कांग्रेस में पहले ही एक राय नहीं थी, मगर अब कांग्रेस ने टीवीके के समर्थन की हामी भर दी है. कांग्रेस फिलहाल DMK गठबंधन का हिस्सा है. ऐसे में टीवीके को समर्थन देने की खबरों से डीएमके बेहद नाराज है. डीएमके प्रवक्ता सर्वानन अन्नादुरई ने इसे “पीठ में छुरा घोंपने” जैसा बताया. उनका कहना है कि कांग्रेस ने जनता और अपने पुराने सहयोगी दोनों के भरोसे को तोड़ा है. डीएमके का ये बयान कांग्रेस की सिरदर्दी बढ़ाने वाला है क्योंकि वो उनका पुराना सहयोगी दल है. जिस दल के सहारे साउथ में अपने पैर पसारने की कोशिश में थी अगर वो ही खफा हो गया तो कांग्रेस को इसका नुकसान होना तय ही है.

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थलापति विजय का गणित क्या है?

234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए, ऐसे में टीवीके के पास 108 विधायक हैं. कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन से ये आंकड़ा 113 तक पहुंचेगा. इसके बाद CPI, CPM और VCK जैसी छोटी पार्टियों का समर्थन मिलते ही विजय बहुमत पार कर सकते हैं. दूसरी ओर AIADMK के भीतर भी टीवीके को समर्थन देने को लेकर खींचतान चल रही है. पार्टी का एक धड़ा विजय के साथ जाने के पक्ष में है, जबकि दूसरा इसे पार्टी को खतरे के तौर पर देख रहा है.

कांग्रेस के सामने सबसे क्या खतरा

है जो कि दिल्ली में कांग्रेस के साथ हुआ है. सबसे बड़ा खतरा यही है कि कहीं वह फिर किसी उभरते क्षेत्रीय चेहरे को इतना मजबूत न कर दे कि भविष्य में वही पार्टी उसकी राजनीतिक जमीन ही हथिया ले, जैसा कि कांग्रेस के साथ दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने किया. दिल्ली में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए केजरीवाल को समर्थन दिया था, लेकिन बाद में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का पूरा वोटबैंक अपने साथ खींच लिया. यकीनन तमिलनाडु में भी विजय युवा, लोकप्रिय और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट चेहरे के तौर पर उभरे हैं. अगर उनकी सरकार बनती है और वह सफल रहते हैं, तो कांग्रेस का पारंपरिक वोट धीरे-धीरे टीवीके की ओर जा सकता है. यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ विजय की सरकार का नहीं, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य का भी बन गया है. क्या तमिलनाडु में कांग्रेस फिर दिल्ली जैसी गलती दोहराने जा रही है? कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी इसलिए भी हो सकती है कि क्योंकि गुजरात में आप के एंट्री मारने के बाद से वहां भी कांग्रेस को घाटा ही हुआ है. जिसका नुकसान कांग्रेस को पिछले गुजरात चुनाव में भी उठाना पड़ा है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि टीवीके के साथ जाने से तमिलनाडु में कांग्रेस का जनाधार खत्म होने की कगार पर ना पहुंच जाए.

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