- तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से छह सीटें कम हैं
- राज्यपाल ने विजय के बहुमत दावे को संतुष्ट नहीं माना, जिसके कारण शपथ ग्रहण में देरी हुई है
- बीजेपी कांग्रेस के साथ गठबंधन न करने का संदेश टीवीके को दे रही है, जिससे राजनीतिक गतिरोध बढ़ा है
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे जारी होने के बाद अब राज्य में सरकार बनाने रस्साकशी चल रही है. सबसे बड़ी पार्टी टीवीके ने राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया. लेकिन राज्यपाल ने कहा कि उनके पास सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं है. इसके बाद राज्य में सियासी घमासान मचा हुआ है. इन चुनावों में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ा दल बनकर उभरा है. टीवीके ने 108 सीटें जीती हैं. लेकिन अभी भी पार्टी बहुमत के आंकड़े (118) से दूर है. ऐसे में सरकार गठन की राह में अड़चनें आ रही हैं. हालांकि, कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है, लेकिन फिर भी विजय बहुमत से 5 सीटें दूर हैं. उधर, दूसरी तरफ ऐसी खबरें हैं कि DMK-AIADMK मिलकर सरकार बनाने के बारे में विचार कर रहे हैं. कुल मिलाकर तमिलनाडु में रिजल्ट के बाद दिलचस्प राजनीतिक उठापटक देखने को मिल रहा है.
'बीजेपी नहीं चाह रही कांग्रेस से हो गठबंधन'
TVK के सूत्रों का कहना है कि इसके जरिए BJP उन्हें यह बता रही है कि अगर वे कांग्रेस के साथ गठबंधन करते हैं, तो बीजेपी उनके आगे का रास्ता आसान नहीं होने देगी. विजय के पास अभी तक पूर्ण बहुमत नहीं है. हालांकि ऐसे कई उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं और यह राज्यपाल का दायित्व होता है कि यदि किसी अन्य गठबंधन या पार्टी ने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया है, तो वे सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए आमंत्रित करें.
TVK के पास 108 विधायक हैं. चूंकि विजय दो सीटों पर जीते हैं ऐसे में अगर एक सीट कम कर दें तो भी उनकी प्रभावी संख्या 107 हो जाती है. कांग्रेस ने लिखित रूप में अपने 5 विधायकों का समर्थन देने की पेशकश की है. इस तरह, 118 के पूर्ण बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए TVK को अभी भी 6 विधायकों की कमी पड़ रही है.
ये छह विधायक कहां से आएंगे, इसी पर TVK को काम करना है, लेकिन उसे ऐसा करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए. वामपंथी दल और VCK उन्हें 4 और विधायकों का समर्थन दे सकते हैं, जबकि IUML और PMK भी अन्य संभावित विकल्प हो सकते हैं.
ऐसा प्रतीत होता है कि DMK अपने सहयोगी दलों पर उसके साथ ही बने रहने का दबाव डाल रही है. यह विजय के लिए मुश्किलें खड़ी करने का एक 'निष्क्रिय-आक्रामक' तरीका है, क्योंकि हर कोई अपने हितों को साधने के लिए मोलभाव करने में जुटा हुआ है.
AIADMK के विधायक भी गठबंधन की कर रहे वकालत
इधर AIADMK का एक धड़ा TVK के साथ गठबंधन करने की वकालत कर रहा है. हालांकि, सूत्रों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री और AIADMK प्रमुख एडप्पादी पलानीस्वामी इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर रहे हैं. उनका कहना है कि विधायकों की एक बड़ी संख्या 47 में से 30 तक गठबंधन के पक्ष में है और वे जोर-शोर से इस बात को कह रहे हैं कि AIADMK को TVK के साथ गठबंधन करना चाहिए. वे यह भी कह रहे हैं कि TVK प्रमुख की ओर से समर्थन मांगने वाला कोई औपचारिक पत्र नहीं भेजा गया है, जैसा कि VCK को भेजा गया था. हालांकि ऐसा तभी होगा जब पर्दे के पीछे की बातचीत से यह साफ हो जाए कि EPS साथ आने को तैयार हैं.
अब समय आ गया है कि EPS और AIADMK अपनी जिद छोड़ें और टीवीके के पीछे रहकर काम करें. विजय के आंकड़ों ने इस मुद्दे को सुलझा दिया है. EPS और विजय ने चुनावों से पहले गठबंधन इसलिए नहीं किया था, क्योंकि दोनों में से कोई भी अपनी-अपनी पार्टियों का मुख्यमंत्री चेहरा होने का दावा छोड़ने को तैयार नहीं था. इन चुनावों में EPS को करारी हार मिली है और अब उन्हें भविष्य के बारे में सोचने की जरूरत है. ये दोनों पार्टियां स्वाभाविक सहयोगी हैं. विजय के आदर्शों में से एक MGR हैं, जो AIADMK के संस्थापक थे. उनका विरोध DMK के भ्रष्टाचार और परिवारवाद से है, न कि द्रविड़ विचारधारा से. AIADMK को यह स्वीकार करना होगा कि वह राज्य में DMK को प्रभावी ढंग से चुनौती देने की क्षमता खो चुकी है और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए उसे टीवीके की ऊर्जा की जरूरत है. विजय को भी यह स्वीकार करना होगा कि उनके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है और भविष्य के लिए गठबंधन बनाने हेतु एक मजबूत सहयोगी का होना जरूरी है.
चेन्नई में अगले दो दिन अभूतपूर्व राजनीतिक हलचल वाले होंगे. राज्य ने संख्याबल के लिए ऐसी जोर-आजमाइश पहले कभी नहीं देखी है. एकमात्र दूसरा 'त्रिशंकु जनादेश'2006 में आया था, लेकिन असल भावना के लिहाज से वह त्रिशंकु जनादेश नहीं था, क्योंकि उस समय DMK गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत था. भले ही DMK खुद बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे रह गई थी.
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विजय अभी भी BJP और DMK के बीच फंसे
हर लिहाज से यह राज्य की राजनीति का एक बेहद दिलचस्प दौर है. विजय की फिल्म 'जना नायकन' को रिलीज होने की इजाज़ नहीं मिली थी, लेकिन 'विजय सरकार' की रिलीज को रोकने की कोई भी कोशिश खतरनाक नतीजे लाएगी और उस राज्य के लिए एक बुरा उदाहरण बनेगी, जिसने अपनी लोकतांत्रिक और विद्रोही परंपराओं को हमेशा संजोकर रखा है.
आखिरकार, विजय और उनकी TVK अभी भी BJP और DMK के बीच फंसे हुए नजर आ रहे हैं. वह इस स्थिति से कैसे निपटते हैं, यही उनकी पहली बड़ी परीक्षा होगी.
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