- कोलकाता के भवानीपुर में सुवेंदु अधिकारी ने चुनावी जीत के बाद हिंदू वोटों को लेकर खुलकर बात कही
- सुवेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया कि वे अब केवल अपने हिंदू समर्थकों की आवाज बनेंगे और धर्मनिरपेक्षता से हटेंगे
- उन्होंने योगी आदित्यनाथ के समक्ष साष्टांग प्रणाम कर बंगाल में 'योगी मॉडल' को अपनाने का संकेत दिया
West Bengal Bengal Election 2026: कोलकाता के भवानीपुर में सोमवार यानि 4 मई को चुनावी जीत का सर्टिफिकेट हाथ में लेते ही सुवेंदु अधिकारी ने जो बयान दिया उसने कई लोगों का ध्यान खींचा. उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे अपनी बात रखी— "मुझे वार्ड नंबर 77, 78 और 80 के मुसलमानों ने वोट नहीं दिया है, मेरी जीत वार्ड नंबर 71 और 74 के हिंदुओं की बदौलत हुई है." दरअसल सुवेंदु का यह बयान सिर्फ एक चुनावी जीत का आंकड़ा भर नहीं था, बल्कि बंगाल के भविष्य की सियासत में बदलाव का गंभीर संकेत था. यह इस बात को साफ-साफ बता रहा था कि सुवेंदु अब किसी छद्म धर्मनिरपेक्षता के लबादे को ओढ़ने के बजाय सीधे तौर पर हिंदुत्व की उसी पिच पर बैटिंग करेंगे, जिसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और असम में हिमंता बिस्वा सरमा ने स्थापित किया है. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि 4 मई को ही सुवेंदु ने ऐसा संकेत दिया है...वो इस पूरे चुनाव प्रचार के दौरान या यूं कह लीजिए बीते कई महीनों से अपनी राह गढ़ रहे हैं. इस रिपोर्ट में जानते हैं क्या हैं वो संकेत?
सुवेंदु के भवानीपुर वाले बयान के मायने
सुवेंदु अधिकारी ने अपनी जीत के बाद जिस तरह से आंकड़ों का पोस्टमार्टम किया, उसने बंगाल की पारंपरिक राजनीति को बदल सा दिया है. उन्होंने सार्वजनिक मंच से वार्डों का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम बहुल इलाकों ने उन्हें पूरी तरह नकारा, जबकि हिंदू इलाकों ने उन पर भरोसा जताया. यह संभवत: पहली बार था जब बंगाल का कोई बड़ा नेता 'सबका साथ' जैसी औपचारिकताओं को किनारे रखकर खुलकर उस 'वोट बैंक' की बात कर रहा था, जो उनके साथ खड़ा था. सुवेंदु ने साफ कर दिया कि वे अब केवल उन्हीं की आवाज बनेंगे जिन्होंने उन्हें चुना है.
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योगी को 'साष्टांग प्रणाम' और 70-30 का गणित
वैसे सुवेंदु के इस बदलते राजनीतिक चरित्र की बड़ी झलक तब भी दिखी थी जब करीब तीन हफ्ते पहले एक चुनावी मंच पर उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने साष्टांग दंडवत होकर उनके पैर छुए.
उनका तर्क साफ है—अगर 70 प्रतिशत हिंदू एकजुट हो जाएं, तो बंगाल से 'तुष्टिकरण' की राजनीति का हमेशा के लिए अंत हो जाएगा. यह नैरेटिव बिल्कुल योगी के '80 बनाम 20' वाले फॉर्मूले की कार्बन कॉपी नजर आता है.
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'सबका साथ' से किनारा: जब सुवेंदु ने बदला बीजेपी का 'मंत्र
सुवेंदु अधिकारी ने 17 जुलाई 2024 को ही कोलकाता के साइंस सिटी ऑडिटोरियम में आयोजित बीजेपी राज्य कार्यकारिणी की बैठक में अपनी नई राजनीतिक लाइन खींच दी थी. उन्होंने मंच से दो टूक कहा, "मैंने अब 'सबका साथ-सबका विकास' कहना बंद कर दिया है. अब मेरा मंत्र है— 'जो हमारे साथ, हम उनके साथ' (Jo Amader Sathe, Amra Tader Sathe)." सुवेंदु ने साफ किया कि जब अल्पसंख्यकों ने पार्टी को वोट नहीं दिया, तो अब बीजेपी को भी सिर्फ अपने समर्थक हिंदू मतदाताओं के हितों की बात करनी चाहिए.
हिमंता बिस्वा सरमा वाला 'कड़ा तेवर'
सुवेंदु की रणनीति में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा वाली आक्रामकता भी साफ झलकती है. जिस तरह हिमंता ने असम में घुसपैठ और सांस्कृतिक पहचान को मुद्दा बनाकर अल्पसंख्यक वोट बैंक की अहमियत को चुनौती दी, सुवेंदु भी बंगाल में वही कर रहे हैं. वे अब ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ में घेरने के लिए 'सनातन' और 'हिंदू गौरव' को ढाल बना रहे हैं. विधानसभा के भीतर और बाहर सुवेंदु का हर प्रहार अब इसी लक्ष्य की ओर इशारा करता है कि वे खुद को बंगाल में 'हिंदू हृदय सम्राट' के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.
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