- SC ने बिहार में SIR की संवैधानिक वैधता पर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान नागरिकता जांच अधिकार पर सवाल उठाए
- EC के पास SIR के तहत स्पष्ट वैधानिक अधिकार नहीं है कि वह नागरिकता की जांच कर सके.
- कोर्ट ने कहा कि अंतर-राज्यीय प्रवासन भारत में संवैधानिक अधिकार है, इसलिए इसे अवैध प्रवासन नहीं माना जा सकता
बिहार में विशेष गहन पुनीरक्षण (SIR) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई. इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि SIR के दौरान नागरिकता सत्यापित करने का अधिकार भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के पास है या नहीं. SIR के नियमों और प्रावधानों में नागरिकता की जांच का अधिकार स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं है, बल्कि इनमें मुख्य रूप से आंतरिक प्रवासन (internal migration) का उल्लेख है, न कि अंतरराष्ट्रीय या अवैध प्रवासन का.पीठ ने यह टिप्पणी की कि ECI ने केवल यह कहा है कि मतदान का अधिकार केवल भारतीय नागरिक को है, लेकिन SIR के तहत नागरिकता जांच के लिए स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं दिखता.
इस सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि क्या SIR में नागरिकता जांच का उल्लेख केवल एक भूमिका (prefatory statement) है? क्या नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के संदर्भ में नागरिकता की जांच SIR का ट्रिगर बनी? क्या ECI अवैध प्रवासन (illegal migration) की भी जांच कर रहा है? जस्टिस बागची ने कहा कि SIR के प्रावधान यह स्पष्ट नहीं करते कि यह ट्रांस-बॉर्डर या अवैध प्रवासन से जुड़ा अभ्यास है.
कोर्ट ने माना कि पिछले 20 वर्षों में तेज़ शहरीकरण और आंतरिक प्रवासन के कारण मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया हुई है, जिससे डुप्लीकेट एंट्री की संभावना बढ़ी है.हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाने और नागरिकता की जांच करने के अधिकार दो अलग-अलग प्रश्न हैं, और ECI को यह बताना होगा कि वह नागरिकता सत्यापन के दायरे में कैसे और क्यों जा रहा है . ECI की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि “माइग्रेशन” शब्द में अंतर-राज्यीय और राज्य के भीतर दोनों प्रकार का प्रवासन शामिल है.
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि भारत में हर नागरिक को अंतर-राज्यीय प्रवासन का संवैधानिक अधिकार है, और ऐसे प्रवासन को अवैध नहीं कहा जा सकता. ECI की ओर से यह भी कहा गया कि निर्वाचन आयोग पर हमले करना एक ‘फैशन' बन गया है, खासकर EVM के ज़रिये चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने के प्रयास किए जा रहे हैं.सीनियर एडवोकेट द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि EVM पर हमले देश की लोकतांत्रिक प्रगति को कमजोर करने का प्रयास हैं.
ऐसे प्रयासों को “निप इन द बड” किया जाना चाहिए
ECI ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह NGO और राजनीतिक दलों द्वारा दायर याचिकाओं के आधार पर, जो अप्रमाणित मीडिया रिपोर्ट्स पर निर्भर हैं, किसी प्रकार की “चलती-फिरती इन्क्वायरी” न करें.ECI ने कहा कि 2003 में नागरिकता अधिनियम (CAA) में संशोधन हुआ था, तब कोई विरोध नहीं हुआ और इसे दोनों पक्षों का समर्थन मिला था. इस पर SC ने सवाल किया कि क्या इस संशोधन के बाद नागरिकता की जांच की आवश्यकता ही एसआईआर में नागरिकता जांच की वजह बनी? कोर्ट ने ECI से पूछा कि आपका एसआईआर यह स्पष्ट नहीं करता कि SIR में क्या सिर्फ सीमा पर से होने वाले अवैध घुसपैठ को मद्देनजर रख कर कार्रवाई हो रही है?
ECI के वकील ने कहा कि SIR के आदेश में लिखे माइग्रेशन शब्द को समझाते हुए कहा कि इसमें अंतरराज्यीय और राज्य के भीतर के भीतर होने वाला प्रवासन भी शामिल है. इस पर कोर्ट ने कहा माइग्रेशन का अर्थ वैध प्रवासन होता है, अंतर-राज्य प्रवासन अवैध नहीं हो सकता.
भारत में हर व्यक्ति को अंतर-राज्य प्रवासन का अधिकार है
ECI ने कहा कि चुनाव आयोग का उद्देश्य अनुच्छेद 326 के तहत नागरिकता की जांच करना था.ECI के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अमेरिकी अदालतों के फैसलों का हवाला दिया है, लेकिन अमेरिका खुद कहां ड्यू प्रोसेस का पालन कर रहा है? उन्होंने कहा कि अब राष्ट्रपति ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाकर ट्रायल के लिए ले जाने की बात करते हैं और अब ग्रीनलैंड चाहते हैं, इसमें ड्यू प्रोसेस कहां है? सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने चुनाव आयोग पर तय नियमों के तहत काम न करने का याचिकाकर्ताओं द्वारा आरोप लगाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को हटाने का हवाला दिया है. SIR की वैधता को ‘ड्यू प्रोसेस' के आधार पर चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं द्वारा अमेरिकी फैसलों का संदर्भ दिए जाने पर ECI ने सुप्रीम कोर्ट में पलटवार किया. ECI ने सवाल पूछा कि अमेरिका कहां ड्यू प्रोसेस का पालन कर रहा है? इस मामले में अगली सुनवाई बुधवार 28 जनवरी को होगी.
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