- सुप्रीम कोर्ट में चुनावी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की संवैधानिक वैधता पर याचिकाओं की सुनवाई हुई
- चुनाव आयोग ने अमेरिकी न्यायिक प्रक्रिया और डोनाल्ड ट्रंप के उदाहरण देकर याचिकाकर्ताओं के दावों पर सवाल उठाए
- आयोग ने कहा कि आरपी एक्ट की धारा 21(3) के तहत SIR का आदेश देना और प्रक्रिया तय करना उनका अधिकार है
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को चुनावी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन SIR की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई. इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी न्यायिक प्रक्रिया का मुद्दा खूब गूंजा. जिसके बाद चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं द्वारा अमेरिकी अदालतों के फैसलों पर भरोसा किए जाने पर सवाल उठाए और इसके लिए अमेरिका की हालिया घटनाओं का हवाला दिया.
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SIR पर सुनवाई में अमेरिका का जिक्र
चुनाव आयोग की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि जब अमेरिका में ही ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ का पालन नहीं हो रहा है, तो वहां के न्यायिक फैसलों को भारत में लागू करने की बात नहीं की जा सकती. उन्होंने कहा कि अमेरिकी अदालतों के फैसलों का हवाला दिया जा रहा है. लेकिन अमेरिका में खुद ड्यू प्रोसेस कहां है?
वकील ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को ट्रायल के लिए उठा सकते हैं और अब ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की बात कर रहे हैं. और यहां याचिकाकर्ता उसी प्रणाली को भारत में आयात करना चाहते हैं.
SIR पर चुनाव आयोग की दलील
ECI ने कहा कि जब वह आरपी एक्ट की धारा 21(3) के तहत SIR का आदेश देता है, तो उसकी प्रक्रिया तय करने का अधिकार भी उसी के पास होता है. वकील ने कहा कि “धारा 21(3) के तहत यह अनिवार्य नहीं है कि हर SIR एक जैसी प्रक्रिया से हो. पिछले 20 वर्षों से SIR नहीं हुआ था और अब जरूरत के चलते किया जा रहा है.
इस पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर आपकी 21(3) वाली दलील मान ली जाए, तो मामला यहीं खत्म हो जाता है. फिर कैसे और किस तरह, सब कुछ आप ही तय करेंगे.
पारदर्शिता और तकनीकी प्रक्रिया का दावा
अदालत में चुनाव आयोग ने दावा किया कि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है. आयोग ने कहा कि हमने 5 करोड़ से अधिक SMS भेजे हैं. प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया गया है. उन्होंने यह भी दलील दी कि जिन लोगों पर SIR का वास्तविक असर पड़ा है, वे अदालत नहीं आए हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि अदालत के समक्ष राजनीतिक दलों से जुड़े लोग हैं. व्यक्तिगत अधिकारों की बात ऐसे की जा रही है जैसे प्रभावित व्यक्ति खुद यहां मौजूद हों.
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