सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर दिए एक अहम फैसले पर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीने के अधिकार के तहत सुनिश्चित त्वरित सुनवाई का अधिकार अपराध की प्रकृति के कारण खत्म नहीं हो सकता. यदि विचाराधीन कैदियों को लंबे समय तक हिरासत में रखा जाए और ट्रायल की शुरुआत या सार्थक प्रगति न हो तो ऐसी हिरासत व्यावहारिक रूप से सजा का रूप ले लेती है. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने ये फैसला दिया है.
अमटेक ऑटो के पूर्व प्रमोटर अरविंद धाम को दी जमानत
पीठ ने अमटेक ऑटो के पूर्व प्रमोटर अरविंद धाम को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत दे दी. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जमानत से इनकार करने के आदेश को रद्द करते हुए धाम की रिहाई का निर्देश दिया. धाम 9 जुलाई 2024 से न्यायिक हिरासत में हैं.
अदालत ने कहा कि अभियोजन शिकायतें दाखिल हो चुकी हैं लेकिन अभी तक संज्ञान नहीं लिया गया है. मामला केवल दस्तावेजों की जांच के स्तर पर ही लंबित है. साथ ही 210 गवाहों की सूची को देखते हुए निकट भविष्य में मुकदमे के शुरू होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं दिखाई दी.
यदि राज्य या जांच एजेंसियां किसी आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार की रक्षा करने में असमर्थ हैं तो केवल अपराध की गंभीरता का आधार लेकर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता. अदालत ने कई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबी विचाराधीन कैद जमानत के पक्ष में निर्णायक कारक है.
विशेषकर तब जब साक्ष्य मुख्य रूप से दस्तावेजी हों और पहले से अभियोजन के कब्जे में हों. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि मामले में देरी का बड़ा कारण प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई कार्यवाही रही, जिसके चलते सुनवाई लंबे समय तक स्थगित रही.
अदालत ने धाम के खिलाफ गवाहों को प्रभावित करने या संपत्तियों के निस्तारण के आरोपों को भी खारिज किया. अदालत ने कहा कि आर्थिक अपराध समान प्रकृति के नहीं होते और केवल गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार उचित नहीं है. अदालत ने धाम को पासपोर्ट जमा करने और बिना ट्रायल कोर्ट की अनुमति से विदेश जाने पर रोक लगाई है.
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