- सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को कोलकाता मेट्रो परियोजना में देरी के लिए कड़ी फटकार लगाई है.
- अदालत ने ममता सरकार की याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के ट्रैफिक ब्लॉक आदेश को सही माना है.
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परियोजना को जानबूझकर रोका जाना संवैधानिक कर्तव्य की उपेक्षा है.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल सरकार को कोलकाता मेट्रो परियोजना में देरी को लेकर फटकार लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल की सरकार से कहा कि सब कुछ राजनीतिक मत बनाइए. यह विकास का मामला है. साथ ही अदालत ने ममता सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ अधिकारियों के अड़ियल रवैये को दिखाता है, जिसके तहत वे कोलकाता शहर में मेट्रो रेल प्रोजेक्ट में देरी करना और उसे रोकना चाहते हैं. साथ ही अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश में कोई कमी नहीं थी. हमें पूरा भरोसा है कि यह प्रोजेक्ट तय समय सीमा के भीतर ही पूरा किया जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को कोलकाता मेट्रो लाइन के एक अहम सेक्शन में देरी के मामले में कड़ी फटकार लगाई है. साथ ही अदालत ने राज्य सरकार की ओर से हाई कोर्ट के ट्रैफिक ब्लॉक आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है.
बंगाल सरकार ने मांगा था मई तक का समय
सुनवाई के दौरान आज पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा कि हमें मई तक का समय दें. अभी चुनाव चल रहे हैं, इसलिए देरी हो रही है. इस पर CJI सूर्य कांत ने कहा कि सब कुछ राजनीतिक मत बनाइए, यह विकास का मामला है.
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा आपके लिए विकास से ज्यादा त्योहार जरूरी है. ऐसा नहीं है कि आप अपनी मर्जी से कर रहे हैं, आप अपने कर्तव्य से बंधे हैं. उन्होंने कहा कि आपने हाई कोर्ट से कहा था कि आपको त्योहारों का इंतजाम करना है. परिवहन के लिए एक अहम सड़क बनाने से ज्यादा जरूरी त्योहार हैं. हम लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार से यह उम्मीद नहीं है कि सरकार यह कहे कि इस काम को फिलहाल नजरअंदाज कर दिया जाए.
कोर्ट ने कहा अगर चुनाव आयोग को चुनाव कराने में कोई दिक्कत नहीं है तो यह प्रोजेक्ट तो आचार संहिता लागू होने से पहले का है. ऐसे में हम राज्य सरकार को यह बहाना बनाकर विकास के काम को फिर से रोकने की इजाजत नहीं देंगे.
परियोजना को जानबूझकर रोकने का प्रयास: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य की रवैया संपूर्ण संवैधानिक कर्तव्य की उपेक्षा और परियोजना को जानबूझकर रोकने का प्रयास है. अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश में कोई कमी नहीं पाई और कहा कि मेट्रो परियोजना समयबद्ध तरीके से पूरी होनी चाहिए.
CJI सूर्य कांत ने कहा कि हाई कोर्ट ने बहुत नरमी बरती है. यह एक ऐसा मामला था, जहां आपके मुख्य सचिव और डीजीपी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जानी चाहिए थी. यह अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह से लापरवाही दिखाता है. यह सिर्फ एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश है, जहां असल में कोई मुद्दा ही नहीं है.
अदालत ने राज्य की ओर से केस वापसी की पेशकश को अस्वीकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी.
दरअसल, कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन के एक अहम हिस्से को पूरा करने में हो रही अनिश्चित देरी को लेकर याचिका दाखिल की गई थी. इस याचिका में देरी का कारण पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जरूरी मंजूरी नहीं दिए जाने को बताया गया था.
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