प्रिय डायरी,
आज सुबह चाय पीते-पीते मैंने एक खबर पढ़ी, जिसने दिल और दिमाग दोनों को झकझोर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाक के मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पति भी घर के काम में हाथ बंटाए. मामला कर्नाटक का है, जहां एक पति ने सिर्फ इसलिए तलाक मांगा क्योंकि उसकी पत्नी खाना नहीं बनाती. सुनकर अजीब लगा. शादी को 8 साल हो चुके हैं, उनका एक बेटा भी है, और सबसे दिलचस्प बात पत्नी आर्थिक रूप से पति से ज्यादा मजबूत है, इसलिए उसने गुजारा भत्ता नहीं मांगा.
मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन इस खबर ने मुझे अपनी ही जिंदगी के कई पन्ने याद दिला दिए. मुझे याद है, जब मेरी शादी हुई थी, तब हर किसी ने मुझे एक ही सलाह दी थी, घर को संभालना तुम्हारी जिम्मेदारी है. उस वक्त मुझे लगा था कि शायद यही सही है, यही परंपरा है. लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि घर दोनों का है, जिम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए.
शादी के शुरुआती दिनों में मैं भी हर काम खुद करने की कोशिश करती थी, सुबह जल्दी उठना, नाश्ता बनाना, घर साफ करना, ऑफिस जाना और फिर वापस आकर खाना बनाना. धीरे-धीरे थकान बढ़ने लगी, लेकिन मैंने कभी शिकायत नहीं की. शायद इसलिए क्योंकि मुझे सिखाया गया था कि अच्छी पत्नी वही होती है जो सब कुछ चुपचाप संभाल ले.
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लेकिन क्या सच में यही सही है?
आज जब मैं इस खबर को पढ़ रही थी, तो लगा कि समाज धीरे-धीरे बदल रहा है. सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि पति भी घर के काम में हाथ बंटाए, सिर्फ एक लाइन नहीं है, यह एक सोच है, एक बदलाव है.
कई बार हम औरतें खुद भी अपनी जिम्मेदारियों का दायरा इतना बड़ा कर लेती हैं कि उसमें किसी और के लिए जगह ही नहीं बचती. हम खुद को यह मानने लगती हैं कि घर के काम सिर्फ हमारे हैं, जबकि सच यह है कि घर दोनों का है तो काम भी दोनों का होना चाहिए.
मैं अपनी एक दोस्त की बात याद कर रही हूं. उसने एक दिन कहा था, अगर मैं ऑफिस में बराबरी से काम कर सकती हूं, तो घर में भी बराबरी क्यों नहीं मिलनी चाहिए? उस वक्त मैंने सिर्फ मुस्कुरा दिया था, लेकिन आज उसकी बात की गहराई समझ आ रही है.
इस केस में पति का यह कहना कि पत्नी खाना नहीं बनाती, मुझे थोड़ा अधूरा सा लगा. क्या सिर्फ खाना बनाना ही एक रिश्ते की नींव है? क्या प्यार, समझदारी और साथ का कोई महत्व नहीं?
और अगर पत्नी कामकाजी है, आर्थिक रूप से मजबूत है, तो क्या यह गलत है कि वह हर रोज खाना न बनाए? क्या पति खुद खाना नहीं बना सकता? या कम से कम उसमें हाथ नहीं बंटा सकता?
सच कहूं तो, आज के समय में रिश्ते रोल पर नहीं, समझ पर टिके होते हैं. अगर दोनों पार्टनर एक-दूसरे को समझें, एक-दूसरे का सम्मान करें, तो छोटे-छोटे मुद्दे कभी बड़े नहीं बनते.
मैं यह नहीं कह रही कि हर घर में एक जैसा होना चाहिए. हर रिश्ते की अपनी कहानी होती है, अपने नियम होते हैं. लेकिन एक बात तो तय है, बराबरी और सहयोग हर रिश्ते की नींव होनी चाहिए.
कभी-कभी मैं सोचती हूं, अगर हमें यह सिखाया जाए कि घर के काम सिर्फ मां के नहीं होते, पापा के भी होते हैं, तो शायद आने वाली पीढ़ी में ऐसे झगड़े ही न हों. आज मैं अपने पति के बारे में भी सोच रही हूं. वह भी कभी-कभी मेरी मदद करते हैं, चाय बना देते हैं, बर्तन धो देते हैं या बाहर से खाना ले आते हैं. पहले मुझे लगता था कि वह मदद कर रहे हैं, लेकिन अब समझ आता है कि वह अपना हिस्सा निभा रहे हैं.
शायद हमें अपने शब्द भी बदलने होंगे मदद नहीं, जिम्मेदारी
इस खबर ने मुझे एक और बात सिखाई है, रिश्ते किसी एक इंसान के बलिदान पर नहीं चलते. अगर एक ही इंसान हर बार झुकता रहेगा, तो वह रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगा.
मैं चाहती हूं कि हर लड़की यह समझे कि उसे सब कुछ अकेले करने की जरूरत नहीं है और हर लड़का यह समझे कि घर के काम करना उसकी जिम्मेदारी भी है, सिर्फ एहसान नहीं.
आज का दिन मेरे लिए एक छोटी सी सीख लेकर आया है, बराबरी सिर्फ शब्द नहीं, एक एहसास है. और जब यह एहसास रिश्ते में आ जाता है, तब ही वह रिश्ता सच्चे मायनों में मजबूत बनता है.
चलो डायरी, आज इतना ही. लेकिन दिल में एक उम्मीद जरूर है, कि आने वाले समय में घर सच में दोनों का होगा, और काम भी दोनों का.
तुम्हारी,
रीमा
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