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4 लाख तो मैं अपने कुत्तों पर खर्च करता हूं...जस्टिस दत्ता ने सुनाया पूर्व CJI का एक रोचक किस्सा

जस्टिस दत्ता ने बताया कि पूर्व चीफ जस्टिस ने एक बार एक वकील को जज बनने का ऑफर दिया था पर सैलरी पर आकर बात अटक गई. सामने वाला 2.25 लाख पर तैयार नहीं हुआ क्योंकि उसका कुत्ते पर खर्च ही 4 लाख से ऊपर था.

4 लाख तो मैं अपने कुत्तों पर खर्च करता हूं...जस्टिस दत्ता ने सुनाया पूर्व CJI का एक रोचक किस्सा
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  • सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की कॉन्फ्रेंस में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने पूर्व CJI से जुड़ा रोचक किस्सा सुनाया
  • वरिष्ठ अधिवक्ता को जज बनने का ऑफर मिला लेकिन सैलरी 2.25 लाख रुपये पर नहीं माना क्योंकि कुत्ते पर खर्च अधिक था
  • अधिवक्ता ने कहा कि पालतू जानवरों पर चार लाख रुपये खर्च करते हैं, इसलिए जज बनने पर चोरी करनी पड़ेगी
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की कॉन्फ्रेंस में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एक रोचक किस्सा सुनाया. यह किस्सा एक पूर्व सीजेआई से जुड़ा था. जस्टिस दत्ता ने बताया कि पूर्व चीफ जस्टिस ने एक बार एक वकील को जज बनने का ऑफर दिया था पर सैलरी पर आकर बात अटक गई. सामने वाला 2.25 लाख पर तैयार नहीं हुआ क्योंकि उसका कुत्ते पर खर्च ही 4 लाख से ऊपर था. 

सैलरी से ज्यादा कुत्ते का खर्च 

कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चार छोटी-छोटी कहानियां सुनाईं जिनमें एक ये भी थी. जस्टिस दत्ता ने रोचक किस्सा सुनाते हुए बताया कि एक घटना केक पर चेरी जैसी है. यह मैंने अपने पूर्व मुख्य न्यायाधीश से सुना था. उन्होंने एक वरिष्ठ अधिवक्ता को बुलाया. वह आए. पूर्व चीफ जस्टिस ने पूछा कि हां बताइए, क्या चाहते हैं? पूर्व सीजेआई ने उन्हें जज बनने का ऑफर दिया. अधिवक्ता तैयार हो गए. उन्होंने पू्र्व चीफ जस्टिस से पूछा-वेतन क्या होगा? जवाब मिला- 2.25 लाख रुपये + भत्ते. इसपर अधिवक्ता का जवाब सुनने लायक था. कहा कि सर, मेरे घर में चार पालतू जानवर हैं, और मैं उन पर 4 लाख रुपये खर्च करता हूं.अगर मुझे जज बनना पड़े, तो तो मुझे चोरी करनी पड़ेगी. 

हर कोई संन्यासी नहीं होता...

जस्टिस दत्ता ने आगे कहा कि आपके पास सबसे प्रतिभाशाली लोग न्यायपालिका में आने के लिए तैयार नहीं होते. उन्हें प्रोत्साहन (incentive) देना होगा ताकि वे इस सेवा में आएं. हर कोई संन्यासी नहीं होता, हर कोई ऐसा नहीं है कि अपनी निजी जिंदगी की परवाह किए बिना जज बनने को तैयार हो जाए. अगर आपके पास उच्च गुणवत्ता वाले लोग बेंच पर नहीं होंगे, तो आप मामलों के तेज निपटारे की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

जस्टिस दत्ता ने एक और कहानी सुनाते हुए कहा कि एक अधिवक्ता की सिफारिश तब की गई जब उनकी उम्र 45 वर्ष से कम थी, लेकिन जब यह सिफारिश सुप्रीम कोर्ट पहुंची, तब उनकी उम्र 45 से अधिक हो चुकी थी. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की इस सिफारिश को यह कहते हुए वापस कर दिया कि उम्मीदवार की उम्र सिफारिश के समय 45 से कम थी. जब बाद में उनका नाम दोबारा हाई कोर्ट कॉलेजियम के सामने आया, तो वह हाथ जोड़े आए और बोले कि सर, दो साल बहुत होते हैं.मेरी प्रैक्टिस बहुत कमजोर हो चुकी है. कृपया मुझे शर्मिंदा न करें और वह बाहर चले गए.

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