सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का कहना है कि कॉलेजियम की ओर से जजों की नियुक्ति के लिए सिफारिश की जाती है. लेकिन इन प्रस्तावों में यह नहीं बताया जाता कि संबंधित जज की नियुक्ति का आधार क्या है. यह पारदर्शिता के अभाव वाली स्थिति है और इससे जजों को नुकसान होता है. इसके अलावा यह स्थिति जनहित के भी विपरीत है. उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के प्रस्तावों में इस तरह से स्पष्टता का अभाव अयोग्य लोगों को भी न्यायपालिका में एंट्री दिलाता है. ऐसे ही लोग फिर असंवैधानिक टिप्पणियां करते हैं. जस्टिस भुइयां ने इस दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस शेखर यादव की स्पीच का जिक्र किया.
इसमें उन्होंने वीएचपी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था और मुस्लिमों को लेकर कुछ बातें की थीं, जिस पर लोगों ने आपत्ति जताई थी. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस भुइयां ने कहा, 'कॉलेजियम की ओर से सिफारिश की वजह न बताए जाने से ऐसे जजों को भी नुकसान होता है, जो वास्तव में योग्य होते हैं. यही नहीं पारदर्शिता के अभाव के कारण कुछ अयोग्य लोग भी व्यवस्था में घुस जाते हैं.' इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि हमें मांग करनी चाहिए कि जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता रहे.
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एक पैनल डिस्कशन के दौरान जस्टिस ने कहा कि जजों के प्रमोशन या फिर स्थानांतरण को लेकर होने वाली चर्चाओं को गोपनीय रखा जाता है. यही नहीं यदि किसी के लिए की गई सिफारिश रिजेक्टर होती है या फैसला स्थगित किया जाता है तो उसके कारणों के बारे में भी नहीं बताया जाता. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेजियम की व्यवस्था सही है. उन्होंने इसमें पारदर्शिता लाए जाने की वकालत की और कहा कि इससे आम लोगों को फायदा होगा. जस्टिस ने कहा कि नागरिकों को यह अधिकार है कि वे जानें कि उनके देश की अदालतों में क्या हो रहा है. उन्हें यह पता होना चाहिए कि अदालतों में नियुक्ति पाने वाले जज कौन हैं.
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