सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में दर्ज 20 रुपये की कथित रिश्वत के मामले में गुजरात सरकार के एक कर्मचारी और उसके अधीन काम करने वाले चपरासी की दोषसिद्धि रद्द कर दी है. जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने दोनों को बरी करते हुए कहा कि रिश्वत की मांग साबित हुए बिना केवल 20 रुपये की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती है.
मामला फरवरी 1996 का है
एक छात्र ने शैक्षणिक रियायतों का लाभ लेने के लिए आय प्रमाणपत्र बनवाने के लिए बेचरी ग्राम पंचायत कार्यालय का रुख किया था. अभियोजन के मुताबिक, राजस्व अधिकारी ने प्रमाणपत्र जारी करने के बदले 120 रुपये की मांग की थी, जिसमें 100 रुपये उसके लिए और 20 रुपये चपरासी के लिए बताए गए थे.
इसके बाद छात्र ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से शिकायत की. ACB ने जाल बिछाया और छात्र को 120 रुपये के चिह्नित नोट लेकर कार्यालय भेजा.
प्रमाणपत्र मिलने के बाद छात्र ने चपरासी को 20 रुपये दिए. छापेमारी टीम ने चपरासी के पास से वही चिह्नित नोट बरामद कर लिया. हालांकि, राजस्व अधिकारी के पास से कथित 100 रुपये बरामद नहीं हुए.
मांग साबित करने में अभियोजन विफल
सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के बयान में कई विसंगतियां पाईं. अदालत ने कहा कि छात्र ने एक अलग मामले में कथित मांग के संबंध में अलग बयान दिया था. वहां उसने कहा था कि शुरुआत में 200 रुपये मांगे गए थे और बाद में 120 रुपये पर समझौता हुआ.
लेकिन ट्रायल कोर्ट में उसकी गवाही में इस तथ्य का जिक्र नहीं था. अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि ACB ने छात्र को निर्देश दिया था कि मांग होने पर वह पूरे 120 रुपये दे. इसके बावजूद उसने चपरासी को केवल 20 रुपये दिए.
चपरासी उस समय राजस्व अधिकारी के पास ही खड़ा था और उसने यह नहीं पूछा कि बाकी रकम क्यों नहीं दी गई. इसके अलावा, जिरह के दौरान छात्र ने खुद स्वीकार किया था कि चपरासी ने उससे कोई रकम नहीं मांगी थी
पीठ ने यह भी कहा कि 20 रुपये उस समय दिए गए जब आय प्रमाणपत्र पहले ही तैयार होकर छात्र को सौंपा जा चुका था. इन परिस्थितियों ने अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा किया.
केवल बरामदगी से दोष सिद्ध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत कानूनी अनुमान के सवाल पर कहा कि जब प्रारंभिक मांग ही साबित नहीं हुई, तो केवल चपरासी के पास से 20 रुपये की बरामदगी अभियोजन के मामले को दोबारा मजबूत नहीं कर सकती.
अदालत ने चपरासी के इस बचाव को भी संभावित माना कि छात्र ने 20 रुपये इसलिए दिए थे क्योंकि अगले दिन ईद का त्योहार था.
अभियोजन की मंजूरी भी अवैध
अदालत ने राजस्व अधिकारी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दी गई. अभियोजन स्वीकृति को भी अमान्य पाया. यह स्वीकृति ऐसे अधिकारी ने दी थी जो इसे देने के लिए सक्षम नहीं था.
इन सभी आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और दोनों आरोपियों को बरी कर दिया. इस तरह 1996 में शुरू हुआ 20 रुपये की कथित रिश्वत का यह मुकदमा करीब तीन दशक बाद आरोपियों के पक्ष में खत्म हुआ.
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