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Tata Trusts ने एन चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल को खारिज किया, बोर्ड के प्रस्ताव को 'कानूनी रूप से बताया अमान्य'

नोएल टाटा ने कहा है कि टाटा संस के चेयरमैन द्वारा 12 अगस्त को दी गई जानकारी को स्वीकार कर लिया गया है. यह मामला अब अंतिम रूप ले चुका है और शेयरधारक उसे स्वीकार कर चुके हैं. अब आगे बढ़ने का समय है.

Tata Trusts ने एन चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल को खारिज किया, बोर्ड के प्रस्ताव को 'कानूनी रूप से बताया अमान्य'
मुंबई:

टाटा समूह की प्रमुख कंपनी टाटा संस की एक बैठक गुरुवार को मुंबई में बांबे हाउस में हुई. इसमें टाटा संस के निदेशक मंडल ने एन चंद्रशेखरन को पांच साल के तीसरे कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला किया गया. यह जानकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई थी. चंद्रशेखरन ने निदेशक मंडल से कहा था कि वो अपना दूसरा कार्यकाल पूरा होने के बाद चेयरमैन पद पर आगे बने रहने के इच्छुक नहीं हैं. अब टाटा ट्रस्ट के प्रमुख नोएल एन टाटा ने एक बयान में कहा है कि चेयरमैन पद छोड़ने का फैसला चंद्रशेखरन का अपना फैसला था. लेकिन अब आगे बढ़ने का समय आ गया है और शेयरधारकों ने चेयरमैन के फैसले को स्वीकार कर लिया है. टाटा संस में टाटा ट्रस्ट की 66 फीसदी हिस्सेदारी है. 

नोएल टाटा ने क्या कहा है

टाटा ट्रस्ट की ओर से जारी नोएल के बयान में कहा गया है कि 12 अगस्त 2026 को चेयरमैन ने बोर्ड को पत्र लिखकर बताया था कि उनका मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होने के बाद वह अगले कार्यकाल के लिए अपना नाम आगे नहीं बढ़ाएंगे. यह उनका अपना फैसला था. उन्होंने यह फैसला अपनी इच्छा से लिया था.उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से बताया था. बोर्ड ने उनसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा था और न ही इस बारे में बोर्ड में कोई प्रस्ताव पास हुआ था. यह किसी समीक्षा प्रक्रिया का नतीजा भी नहीं था.

बयान में कहा गया है कि इसके बाद यह पत्र सार्वजनिक कर दिया गया. इसे कंपनी के शेयरधारकों और खास तौर पर टाटा ट्रस्ट्स से पहले चर्चा किए बिना सार्वजनिक किया गया था. टाटा ट्रस्ट के पास कंपनी की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है. मैं इसे शिकायत के तौर पर नहीं कह रहा हूं. मेरा मानना है कि चेयरमैन को अपने इरादे के बारे में बताने का अधिकार है. लेकिन जब इस तरह की बात सार्वजनिक हो जाती है तो उसके असर को बाद में बोर्ड वापस नहीं बदल सकता. ग्रुप के कर्मचारियों, कर्ज देने वालों, कारोबारी साझेदारों और बाजार ने इस फैसले को ध्यान में रखकर आगे कदम उठाए हैं. बहुमत शेयरधारक ने भी ऐसा ही किया है. अब आगे बढ़ने का समय है. बहुमत शेयरधारकों ने फैसले को स्वीकार कर लिया है.

बयान के मुताबिक टाटा ट्रस्ट्स ने चेयरमैन के इस फैसले को स्वीकार कर लिया है. उन्होंने कंपनी से अपने कंपनी के नियमों के अनुसार नए चेयरमैन के चयन के लिए एक चयन समिति बनाने को कहा है. यह स्वीकृति और अनुरोध आधिकारिक रूप से दर्ज है और औपचारिक रूप से कंपनी को बताए गए हैं. ऐसे में अगर इस बैठक में चेयरमैन को फिर से नियुक्त करने का प्रस्ताव लाया जाता है, तो इसका मतलब होगा कि बोर्ड एक साथ तीन बातों को नजरअंदाज कर रहा है- चेयरमैन का खुद का पहले दिया गया फैसला, बहुमत शेयरधारक यानी टाटा ट्रस्ट्स द्वारा उस फैसले को स्वीकार करना और नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए टाटा ट्रस्ट्स का अनुरोध.

नोएल टाटा ने क्या सवाल उठाए हैं

इससे पहले एक अहम सवाल का जवाब मिलना बाकी है. इस कंपनी का चेयरमैन वही व्यक्ति हो सकता है जो कंपनी का निदेशक हो. अभी चेयरमैन का निदेशक पद भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. जिस आम बैठक में इस मुद्दे पर फैसला होना था, वह कोरम के अभाव में आगे नहीं बढ़ सकी. इसलिए जब तक निदेशक पद का सवाल हल नहीं होता, तब तक चेयरमैन पद पर फैसला करना जल्दबाजी होगी.

एक व्यावहारिक और कानूनी चिंता भी है. अगर अभी चेयरमैन पद पर फैसला लिया जाता है और बाद में यह पाया जाता है कि उस व्यक्ति का निदेशक पद ही पूरी तरह स्पष्ट या वैध नहीं था, तो कोई भी शेयरधारक इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है. कंपनी को खुद को इस तरह की कानूनी चुनौती के जोखिम में नहीं डालना चाहिए. खासकर ऐसे समय में, जब कंपनी के सामने नियामक संस्था से जुड़े और भी महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं. दोनों सवालों को अलग-अलग देखना चाहिए.

इस कंपनी के सामने लगभग एक ही समय में दो अलग-अलग सवाल आए हैं. पहला सवाल कंपनी की संरचना और नियामक संस्था के प्रति उसकी जिम्मेदारियों से जुड़ा है. दूसरा सवाल कंपनी के नेतृत्व और नए चेयरमैन के चयन से जुड़ा है. दोनों मामले एक साथ सामने आए हैं, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं और एक का जवाब दूसरे से नहीं मिलता.

पहला सवाल यह है कि कंपनी की संरचना क्या है और उसका मालिकाना ढांचा कैसा है. इसका फैसला रिजर्व बैंक को दी जाने वाली जानकारी, कंपनी द्वारा दिए जाने वाले कारणों और उसे मिले समय के आधार पर होगा. दूसरा सवाल यह है कि कंपनी का नेतृत्व कौन करेगा और उस व्यक्ति का चयन किस प्रक्रिया से होगा. इसका फैसला कंपनी के नियमों और उसमें तय प्रक्रिया के अनुसार होगा. दोनों सवालों पर विचार करने के आधार अलग-अलग हैं.

उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया

इसलिए मेरा अनुरोध है कि इन दोनों मामलों को एक-दूसरे के फैसले का आधार न बनाया जाए. नियामक संस्था से जुड़ा कोई घटनाक्रम चेयरमैन का उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया को प्रभावित न करे और उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया भी नियामक मामले में कंपनी के रुख को प्रभावित न करे. दोनों मामले अपने-अपने तरीके से महत्वपूर्ण और जटिल हैं. इसलिए दोनों पर उपलब्ध तथ्यों और संबंधित नियमों के आधार पर अलग-अलग फैसला होना चाहिए. मैं यह बात किसी व्यक्ति को ध्यान में रखकर नहीं कह रहा हूं और न ही दोनों मामलों के संभावित नतीजे पर कोई राय दे रहा हूं.

टाटा ट्रस्ट्स के नजरिए से 12 अगस्त 2026 को चेयरमैन द्वारा दी गई जानकारी को स्वीकार कर लिया गया है. यह मामला अब अंतिम रूप ले चुका है. चेयरमैन अपना फैसला बता चुके हैं और शेयरधारक उसे स्वीकार कर चुके हैं. अब आगे बढ़ने का समय है. इसलिए मैं अनुरोध करता हूं कि इस पूरे बयान को बोर्ड बैठक की कार्यवाही यानी मिनट्स में दर्ज किया जाए और इसकी एक कॉपी सभी निदेशकों को बैठक के ड्राफ्ट मिनट्स के साथ भेजी जाए.

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