पाकिस्तान के झांसे में कैसे आ गया था बलूचिस्तान, एक आजाद रियासत ने मार ली अपने पैरों पर कुल्हाड़ी?
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बलूचिस्तान चार प्रमुख रियासतों कलात, खारान, लसबेला और मकरान में बंटा हुआ था. अंग्रेजों ने 1876 की ऐतिहासिक संधि के तहत कलात की स्वतंत्र और संप्रभु स्थिति को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया था.
15 अगस्त 1947 का सूरज जब भारतीय उपमहाद्वीप के क्षितिज पर उदय हो रहा था, तब भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे की आग और नए मुल्कों की सुगबुगाहट के बीच बलूचिस्तान की कहानी एकदम अलग थी. बलूचिस्तान तब किसी का गुलाम नहीं बल्कि एक संप्रभु और स्वतंत्र प्रांत था. कलात की रियासत उस वक्त समूचे बलूचिस्तान का प्रतिनिधित्व कर रहा था.
इस रियासत ने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के बजाय अपनी ऐतिहासिक संप्रभुता को बरकरार रखते हुए एक आजाद प्रांत रहने का ऐलान किया था. लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज यह आजादी महज साढ़े सात महीनों की मेहमान साबित हुई.
11 अगस्त को बलूचिस्तान ने अपनी आजादी का दिन बताया है. लंबे वक्त से बलूचों का कहना है कि पाकिस्तान की सेना उनके साथ जुल्मों-सितम करती है और सौतेला व्यवहार करती है.
इसी सौतेले रवैये की वजह से दशकों से बलूचिस्तान में पाकिस्तान फौज और सरकार के खिलाफ क्रांति की आग उबल रही है. अब बलूचिस्तान की आवाम ने अपने आजादी की घोषणा कर दी है. हालांकि अब तक किसी देश ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र नहीं माना है.
इस आर्टिकल में हम जानेंगें कि कैसे एक स्वतंत्र प्रांत पाकिस्तान के चंगुल में फंस गया?
भारत और पाकिस्तान की आजादी के कुछ महीनों के भीतर ही मोहम्मद अली जिन्ना की मीठी बातों, राजनीतिक षड्यंत्रों और फिर पाकिस्तानी सेना के साये में एक पूरे प्रांत की तकदीर को हमेशा के लिए बदल दिया गया. बलूचिस्तान के शासक खान ऑफ कलात ने जिस भरोसे के साथ विलय पत्र पर दस्तखत किए थे, वह समय के साथ बलूच कौम के लिए अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा खौफनाक फैसला साबित हुआ.

कलात के खान और उनके बेटे
Photo Credit: Archives of Pakistan
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बलूचिस्तान चार प्रमुख रियासतों कलात, खारान, लसबेला और मकरान में बंटा हुआ था. इसमें सबसे बड़ी और प्रभावशाली रियासत कलात थी. अंग्रेजों ने 1876 की ऐतिहासिक संधि के तहत कलात की स्वतंत्र और संप्रभु स्थिति को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया था.
11 अगस्त 1947 को क्या हुआ था?
नेशनल आर्काइव्स और लॉर्ड माउंटबेटन पेपर्स में संरक्षित दस्तावेजों के मुताबिक, आजादी से ठीक चार दिन पहले, 11 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में लॉर्ड माउंटबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना और खान ऑफ कलात मीर अहमद यार खान के बीच एक बेहद अहम बैठक हुई.
इस बैठक में एक त्रिपक्षीय समझौते (स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट) पर दस्तखत हुए. इसमें स्पष्ट तौर से माना गया कि कलात एक संप्रभु प्रांत है.
विडंबना यह थी कि खान ऑफ कलात ने अपनी आजादी के इस कानूनी केस को लड़ने के लिए जिन्ना को ही अपना वकील बनाया था और जिन्ना ने इसके बदले भारी फीस भी ली थी. समझौते के अगले ही दिन, 12 अगस्त 1947 को कलात ने अपनी आजादी का परचम लहराया, दो सदनों वाली संसद का गठन किया और एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर सांस लेने लगा.
लेकिन, जिन्ना की नीयत जल्द ही खराब होने लगी. ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान का रणनीतिक और भौगोलिक महत्व बेहद संवेदनशील था. जिन्ना अच्छी तरह जानते थे कि एक स्वतंत्र बलूचिस्तान के रहते पाकिस्तान को कभी अरब सागर तक सुरक्षित पहुंच और अपनी पश्चिमी सीमाओं पर मजबूती नहीं मिल सकती.

लेखक अहमद रशीद की किताब 'पाकिस्तान ऑन द ब्रिंक'
Photo Credit: Penguin
जिन्ना ने चली अपनी चाल
लेखक अहमद रशीद ने अपनी किताब 'पाकिस्तान ऑन द ब्रिंक' में लिखा हैं कि कुछ ही हफ्तों के भीतर जिन्ना ने अपने सुर बदल दिए और खान ऑफ कलात पर पाकिस्तान में विलय का दबाव बनाना शुरू कर दिया. इसके बाद कलात के खान पर पाकिस्तान हावी होने लगा. जिन्ना ने हर तरीके की कोशिश कर कलात को घुटने पर लाने की साजिश रची.
लेखक ताज मोहम्मद ब्रीसेग की पुस्तक 'द बलूच नेशनलिज्म: इट्स ओरिजिन एंड डेवलपमेंट' के अनुसार, जब दिसंबर 1947 और जनवरी 1948 में कलात की चुनी हुई संसद (दीवान-ए-आम) में इस विलय प्रस्ताव पर चर्चा हुई, तो बलूच नेताओं ने एक स्वर में इसका कड़ा विरोध किया.
बलूच संसद ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया कि वे पाकिस्तान का हिस्सा कभी नहीं बनेंगे, बल्कि एक मित्र पड़ोसी की तरह व्यापारिक रिश्ते रखेंगे. संसद के इस कड़े रुख को देखकर पाकिस्तान ने कूटनीतिक चाल चली.
मार्च 1948 में पाकिस्तान ने कलात के अधीन आने वाली तीन छोटी रियासतों खारान, लसबेला और मकरान के शासकों को डरा-धमकाकर और लालच देकर उनका पाकिस्तान में अलग से विलय करा लिया. इस चाल से कलात पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया और उसका समंदर से संपर्क हमेशा के लिए कट गया.
जब कूटनीति नाकाम हो गई, तो पाकिस्तान ने अपने असली रंग दिखाए. मार्च 1948 के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तानी सेना ने कलात को चारों तरफ से घेर लिया और आर्थिक नाकाबंदी कर दी.
गनपॉइंट और सैन्य कार्रवाई के सीधे खतरे के बीच, 27 मार्च 1948 को लाचार खान ऑफ कलात ने भारी मन से विलय पत्र पर अपने हस्ताक्षर कर दिए.
जाने-माने लेखक मार्टिन एस्केंस की बहुचर्चित किताब 'बैक टू द फ्यूचर: द खानेत ऑफ कलात एंड द जेनेसिस ऑफ बलोच नेशनलिज्म' में इस पूरी घटना का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि कैसे बंदूक की नोक पर कलात के शासक से जबरन विलय पत्र पर दस्तखत करवाए गए थे.

मार्टिन एस्केंस की बहुचर्चित किताब 'बैक टू द फ्यूचर: द खानेत ऑफ कलात एंड द जेनेसिस ऑफ बलोच नेशनलिज्म'
Photo Credit: Oxford Press
खान ऑफ कलात को लगा था कि शायद इस समझौते से बलूच लोगों के अधिकार और स्वायत्तता सुरक्षित रहेगी, लेकिन यह महज उनका एक भ्रम साबित हुआ. बलूच जनता ने इस विलय को पहले दिन से ही धोखे से किया गया कब्जा माना और बंदूक की नोक पर थोपी गई इस गुलामी को कभी दिल से स्वीकार नहीं किया.
सौतेला व्यवहार किया, संसाधन की लूट हुई...
पाकिस्तान का हिस्सा बनते ही बलूचिस्तान के संसाधनों की बेरहमी से लूट शुरू हो गई. क्षेत्रफल के हिसाब से पाकिस्तान का 44 प्रतिशत हिस्सा घेरने वाला यह क्षेत्र कुदरती खजानों से लबरेज था.
जाने माने पत्रकार सिलिग हैरिसन अपनी किताब 'इन अफगानिस्तान्स शैडो: बलूच नेशनलिज्म एंड सोवियत टेम्पटेशन' में विस्तार से बताते हैं कि कैसे बलूचिस्तान का सोना, तांबा और कोयला सब इस्लामाबाद और पंजाब के खजाने में जाता रहा और स्थानीय आबादी को पूरी तरह बदहाल छोड़ दिया गया.
हद तो तब हो गई जब 1955 में पाकिस्तान ने 'वन यूनिट' प्रणाली लागू करके बलूचिस्तान की बची-कुची पहचान को भी मिटा दिया और उसे पश्चिम पाकिस्तान का एक साधारण हिस्सा बना दिया. जब प्रदर्शन और विरोध से बात नहीं बनी तो बलूचों ने बंदूक का रास्ता अख्तियार कर लिया.

पत्रकार सिलिग हैरिसन की किताब 'इन अफगानिस्तान्स शैडो: बलूच नेशनलिज्म एंड सोवियत टेम्पटेशन'
Photo Credit: Carnegie Endowment for Intl Peace
- 1948 में खान ऑफ कलात के भाई शहजादा करीम के पहले विद्रोह से लेकर अब तक बलूचिस्तान पांच बड़े सशस्त्र आंदोलनों का गवाह बन चुका है.
- 1958 में नौरोज खान के विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने पवित्र कुरान की कसम खाकर बातचीत के लिए बुलाया और बाद में धोखे से उनके बेटों को फांसी पर लटका दिया.
- 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो ने बलूचिस्तान की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त किया, तो पूरे क्षेत्र में भीषण युद्ध छिड़ गया. तब पाक फौज ने बलूच गांवों पर हेलीकॉप्टरों से बमबारी की.
- अगस्त 2006 में जनरल परवेज मुशर्रफ के आदेश पर 79 साल वरिष्ठ बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या कर दी गई.
इन घटनाओं ने बलूच युवाओं के भीतर क्रांति की एक ऐसी ज्वाला भड़का दी जो आज तक शांत नहीं हुई है. आज बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे संगठन पाकिस्तान के खिलाफ बगावत की जंग लड़ रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और ग्वादर पोर्ट के नाम पर बलूच जमीनों और संसाधनों की नीलामी बदस्तूर जारी है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट्स में ये बात सामने आई है कि आज बलूचिस्तान 'किल एंड डंप' नीति और 'मिसिंग पर्सन्स' का खौफनाक मंजर झेल रहा है. बलूचिस्तान को कभी पाकिस्तान ने अपना नहीं माना.
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