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दो साल बाद जेल से बाहर आएंगे झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम, सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत

झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है. टेंडर घोटाले में गिरफ्तार आलम दो साल से जेल में थे. उनकी गिरफ्तारी उस समय सुर्खियों में थी. आलम के करीबी के ठिकानों से करोड़ों रुपए कैश मिले थे.

दो साल बाद जेल से बाहर आएंगे झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम, सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत
झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम.
  • झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रदान की है.
  • आलमगीर आलम दो साल से जेल में थे और हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया था.
  • पूर्व मंत्री के निजी सचिव संजीव लाल को भी सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है.
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नई दिल्ली:

Alamgir Alam Bail: झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार में आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है. आलमगीर आलम दो साल से जेल में थे. सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद अब उनके जल्द ही जेल से बाहर आने की उम्मीद है. मालूम हो कि विधानसभा चुनाव के दौरान आलमगीर आलम को मनी लॉन्ड्रिंग मामले मे गिरफ्तार किया गया था. तब वो जेल में ही थे. हाईकोर्ट ने आलमगीर आलम को जमानत देने से इन्कार कर दिया था. हाईकोर्ट के फैसले को आलमगीर आलम ने सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता आलमगीर आलम के साथ ही उनके पर्सनल सेक्रेटरी (PS) संजीव लाल को भी जमानत दी है. 

छापेमारी में मंत्री के करीबी के घर से मिले थे 32.2 करोड़ रुपए कैश

मालूम हो कि आलमगीर आलम को झारखंड के बहुचर्चित टेंडर घोटाला मामले में गिरफ्तार किया गया था. 6 मई 2024 को ईडी ने रांची में बड़े पैमाने पर छापेमारी की थी. इस दौरान संजीव लाल के सहायक जहांगीर आलम के आवास से करीब 32.2 करोड़ रुपये नकद बरामद किए गए थे. 

वहीं, संजीव लाल के आवास से 10.5 लाख रुपये और उनके सचिवालय स्थित कार्यालय से 2.3 लाख रुपये बरामद हुए थे. एक डायरी भी जब्त की गई, जिसमें कथित तौर पर कमीशन के लेन-देन का ब्योरा दर्ज था.

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15 मई 2024 को मंत्री को किया गया था गिरफ्तार

जांच के बाद, 15 मई 2024 को आलमगीर आलम को गिरफ्तार कर लिया गया था. ईडी ने आरोप लगाया है कि सरकारी टेंडर आवंटित करने के बदले कमीशन वसूलने के लिए एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था.

टेंडर पर कमीशन देना होता था

जांच एजेंसी के मुताबिक, ठेकेदारों को कथित तौर पर कुल ठेके की कीमत का लगभग तीन प्रतिशत कमीशन के तौर पर देना पड़ता था. इसमें से, लगभग 1.35 प्रतिशत राशि कथित तौर पर तत्कालीन मंत्री तक उनके निजी सचिव के माध्यम से पहुंचाई जाती थी, जबकि 0.65 से 1 प्रतिशत राशि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों में बांटी जाती थी और शेष राशि इंजीनियरों सहित अन्य कर्मचारियों के बीच साझा की जाती थी.

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