- भाखड़ा और ब्यास नदी का विवाद हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच साठ वर्षों से चला आ रहा था.
- सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की बेंच के साथ पंजाब और हरियाणा को हिमाचल प्रदेश को बिजली देने का आदेश दिया.
- 2011 में SC ने हिमाचल प्रदेश को अविभाजित पंजाब की बिजली में सात दशमलव उन्नीस प्रतिशत हिस्सा दिया था.
भाखड़ा और ब्यास नदी का विवाद पिछले 60 सालों से हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच चल रहा था. यह देश के सबसे पुराने और पेचीदा अंतरराज्यीय विवादों में से एक माना जाता है. लेकिन 1944 से चल रहा यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट ने सुलझा दिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने शुक्रवार को इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. जहां पंजाब और हरियाण मिलकर हिमाचल प्रदेश को अगले 20 साल में कुल 11 हजार 973 मिलियन यूनिट बिजली देंगे. यह बिजली कैश में नहीं बल्कि एनर्जी के रूप में दी जाएगी. सीजेआई सूर्यकांत के साथ बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल थे, जहां कोर्ट ने केंद्र सरकार के कैशलेस सेटलमेंट वाले प्रस्ताव को मंजूर किया, जिसे अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि की अगुवाई में तीनों राज्यों की बातचीत के बाद तैयार किया गया था.
1944 से चल रहा था यह विवाद
तीनों राज्यों के बीच यह विवाद आजादी के पहले यानि 1944 से चल रहा था. दरअसल, 1944 में सतलुज नदी पर भाखड़ा-नांगल हाइड्रो-इलेक्ट्रिक स्कीम का प्रस्ताव आया था, बाद में यहां ब्यास नदी पर देहर और पोंग डैम प्रोजेक्ट बने. इन डैमों के लिए हजारों एकड़ जमीन हिमाचल प्रदेश के इलाके से गई, लेकिन जब बिजली बंटी तो हिमाचल को उसका हक नहीं मिला. 1 नवंबर 1966 को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ, तब अविभाजित पंजाब से पंजाब और हरियाणा बने, चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बना और बड़ा इलाका हिमाचल में मिला. इसी अधिनियम की धारा 78 के तहत भाखड़ा-नांगल और ब्यास प्रोजेक्ट के अधिकारों और देनदारियों का बंटवारा होना था. हिमाचल प्रदेश उसी समय से इस पर अपना दावा कर रहा था, क्योंकि प्रोजेक्ट के लिए जमीन और संसाधन उसके इलाके लिए गए थे. ऐसे में वह लंबे से बिजली की मांग कर रहा था. लेकिन पंजाब और हरियाणा की तरफ से यह मांग मानी नहीं जा रही थी.
2011 में पहली बार आया बड़ा फैसला
इस विवाद में 2011 में पहली बार बड़ा फैसला आया था. क्योंकि हिमाचल प्रदेश की तरफ से 1996 में सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 131 के तहत ओरिजिनल सूट दाखिल किया था. 27 सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल के पक्ष में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि हिमाचल को अविभाजित पंजाब की बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा. जो भाखड़ा प्रोजेक्ट में 1 नवंबर 1966 से और देहर प्रोजेक्ट में नवंबर 1977 से और पोंग डैम में जनवरी 1978 से लागू होगा. इसी फैसले में पंजाब का हिस्सा 51.80 प्रतिशत हरियाणा का 37.51 प्रतिशत और चंडीगढ़ का हिस्सा 3.50 प्रतिशत सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय किया गया था. राजस्थान का हिस्सा इसलिए नहीं बदला गया, क्योंकि वह कभी अविभाजित पंजाब का हिस्सा नहीं था, राजस्थान एक अलग राज्य था.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भी 2011 का यह फैसला कागजों पर ही सीमित रह गया. क्योंकि लेकिन 2011 का फैसला कागज पर ही रह गया। 2011 के बाद से तो हिमाचल को उसका 7.19 प्रतिशत हिस्सा मिलने लगा, लेकिन 1966 से अक्टूबर 2011 तक का बकाया नहीं मिला. जिस पर हिमाचल प्रदेश हमेशा अपना हक जताता रहा, यही वजह है कि पिछले 15 सालों से यह खींचतान लगातार चल रही थी. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के हिसाब के मुताबिक हिमाचल का कुल बकाया 13,066 मिलियन यूनिट बनता है. जिसमें पंजाब और हरियाणा के बीच इस बकाये का 420.77 करोड़ रुपये बना था. यह पैसा डैम बनाने के समय पंजाब और हरियाणा ने कैपिटल कॉस्ट और लोन सर्विसिंग के रूप में खर्च किया था. इसमें पंजाब का हिस्सा 249.23 करोड़ और हरियाणा का 171.55 करोड़ रुपये माना गया. इस एडजस्टमेंट के बाद हिमाचल को मिलने वाली बिजली 11,973 मिलियन यूनिट रह गई.
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20 साल के लिए समझौता
अब सुप्रीम कोर्ट ने यह समझौता किया है. जिसमें 20 सालों में पंजाब और हरियाणा की तरफ से हिमाचल प्रदेश को उसका हिस्सा दिया जाएगा. कोर्ट ने कहा कि यह बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच के 20 लीन सीजन में दी जाएगी, जहां अब हर साल 598 मिलियन यूनिट बिजली हिमाचल प्रदेश को मिलेगी. भाखड़ा-नांगल प्रोजेक्ट के लिए पंजाब और हरियाणा के बीच अनुपात 58:42 और ब्यास प्रोजेक्ट के लिए 60:40 रहेगा. हिमाचल को हर साल मिलने वाली बिजली के लिए भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड को तय ऑपरेशनल चार्ज भी देना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की वित्तीय स्थिति को देखते हुए 20 साल का बीच का रास्ता चुना, जिसमें अदालत ने साफ कहा कि 2011 की डिक्री 15 साल बाद भी लागू नहीं हुई, यह ठीक नहीं है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि डिक्री की उम्मीद को जजमेंट डेटर की अनिच्छा की वजह से बेकार नहीं किया जा सकता.
ऐसे में पिछले 60 सालों से चल रहा यह विवाद अब खत्म हो गया है. जहां हिमाचल प्रदेश को उसकी बिजली का हिस्सा मिल जाएगा. वहीं हरियाणा और पंजाब पर भी एक दम से बोझ नहीं आएगा. हिमाचल प्रदेश को 20 सालों तक सर्दियों में अतिरिक्त बिजली मिल जाएगी, हिमाचल इस बिजली का इस्तेमाल अपने लोगों के लिए कर सकेगा या उसे बेचकर राजस्व भी कमा सकेगा. वहीं पंजाब और हरियाणा को भी कैश नहीं देना पड़ेगा, बिजली के रूप में धीरे-धीरे बकाया दिया जा सकेगा.
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