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बेल देने में जजों को अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर, न्यायिक स्वतंत्रता पर असर: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से ट्रायल कोर्ट के जज जमानत देने से कतराते हैं, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता कमजोर हो रही है.

बेल देने में जजों को अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर, न्यायिक स्वतंत्रता पर असर: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के जजों के कामकाज को लेकर एक गंभीर चिंता जाहिर की है. अदालत ने कहा है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर के कारण जिला स्तर के न्यायाधीश जमानत देने में अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने से कतराने लगे हैं, जिसका सीधा असर न्यायिक स्वतंत्रता पर पड़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने चेताया है कि अगर यह स्थिति बनी रही, तो न केवल न्याय प्रणाली कमजोर होगी, बल्कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर जमानत याचिकाओं का अनावश्यक बोझ भी लगातार बढ़ता जाएगा.

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर बढ़ रहा बोझ

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर या विवेकाधिकार के कथित “गलत प्रयोग” को लेकर न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी जाती है. यही कारण है कि ट्रायल कोर्ट के जज जमानत देने में हिचकिचाने लगे हैं. पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी प्रशासनिक कार्रवाई के भय से, कानून के सिद्धांतों के भीतर आने वाले योग्य मामलों में भी जमानत न दी जाए.'

अदालत ने कहा कि इसी डर के चलते जिला अदालतों में जमानत नहीं मिलती और वही मामले बाद में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, जिससे उच्च अदालतें जमानत अर्जियों से भरी पड़ी हैं.

मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी से जुड़े मामले में कीं. अदालत ने उस अधिकारी की सेवा से बर्खास्तगी को रद्द कर दिया. उक्त अधिकारी को मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम के तहत जमानत याचिकाओं में कथित भ्रष्टाचार और 'दोहरा मापदंड' अपनाने के आरोपों के आधार पर बर्खास्त किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महज संदेह और विवेकाधिकार के कथित गलत इस्तेमाल के आधार पर इतनी कठोर कार्रवाई उचित नहीं है.

न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर

अपने सहमति मत में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि लगातार प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर ट्रायल जजों को ऐसे मामलों में भी जमानत देने से रोक रहा है, जो पूरी तरह स्थापित कानूनी सिद्धांतों के दायरे में आते हैं. उन्होंने कहा कि जिला न्यायपालिका न्याय वितरण प्रणाली की रीढ़ है. बोले- 'जब न्यायिक अधिकारियों की स्वायत्तता कमजोर होती है और डर उनके कर्तव्य पर हावी हो जाता है, तो लोकतंत्र और कानून का शासन प्रभावित होता है.' 

हाई कोर्टों को स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्टों को, जो जिला न्यायपालिका पर पर्यवेक्षणीय नियंत्रण रखती हैं, स्पष्ट निर्देश दिया कि सिर्फ किसी आदेश को गलत मान लेने या विवेकाधिकार के त्रुटिपूर्ण प्रयोग को अपने आप में विभागीय कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए, जब तक कि कोई गंभीर अतिरिक्त तथ्य मौजूद न हो. अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को बिना डर और दबाव के न्याय करने का माहौल देना लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए अनिवार्य है.

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