मॉनसून की बारिश के विलेन अल नीनो ने खतरे की आहट दे दी है. दुनिया भर की मौसम एजेंसियां आगाह कर रही हैं कि मॉनसून को सोख लेने वाला अल नीनो सौ सालों में सबसे भयानक रूप लेने वाला है. नवंबर में पूरी ताकत दिखाने वाला अलनीनो अब अगस्त-सितंबर में ही हावी हो रहा है. ये भारत में फसलों के लिए बड़ा संकट साबित हो सकता है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन की आगाह करती चेतावनी के बीच ब्रिटेन के मौसम विज्ञान विभाग ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली अल नीनो आकार ले रहा है, जो इस सदी का सबसे ज्यादा असर होगा.मौसम विज्ञानी सुरेंद्र सिंह का कहना है कि भारत में मॉनसून की सुस्ती के बीच यह फसलों की बुवाई और उत्पादकता के लिए अच्छी खबर नहीं है. फसल चक्र भी प्रभावित हो सकता है.
100 साल का रिकॉर्ड टूट सकता है
ब्रिटिश मौसम विभाग (UK Met Office) का कहना है कि अल नीनो के असर से प्रशांत महासागर 3.9 डिग्री तक गर्म हो सकता है. यूके वेदर डिपार्टमेंट के अफसर एडम स्केफन का कहना है कि प्रशांत महासागर की सतह का तापमान दो डिग्री बढ़ने को भी बहुत बड़ी घटना माना जाता है. वर्ष 2015-16 में अल नीनो की वजह से महासागर का तापमान 3 डिग्री बढ़ा था. टेंपरेचर का 4 डिग्री तक बढ़ना जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बड़ा बदलाव लाने वाली साबित हो सकती है. प्रशांत महासागर की सतह का तापमान अभी 30 साल के सामान्य औसत से 2.6 डिग्री तक बढ़ गया है.
सबसे गर्म साल बनेगा 2027
BBC की रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो के असर से 2027 अब तक का सबसे गर्म साल बन सकता है. इसका असर अगले साल दुनिया भर के बड़े शहरों में भयंकर तापमान के तौर पर दिख सकता है. ब्रिटिश मौसम विज्ञानी निक डनस्टोन का कहना है कि इस साल सुपर अल नीनो गर्मी के सारे रिकॉर्ड तोड़ सकता है. यह 2024 के 1.5 डिग्री के तय पैमाने से काफी आग निकल गया है.

भारत पर दिखने लगा असर
भारत में अल नीनो का असर मॉनसून पर दिखने लगा है. अगस्त आते आते ही मॉनसून की गतिविधियां सुस्त पड़ने लगी हैं. बादल छाये हैं, लेकिन अच्छी बारिश नहीं हो रही है. ऊफर से बरसात लाने वाले मॉनसून ट्रफ या इंडियन ओशियन डायपोल भी सक्रिय नहीं हो पा रहा है.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मॉनसून के चार महीनों में बारिश का औसत सामान्य से केवल 90 फीसदी रहने का अनुमान जताया है, जो 11 सालों में सबसे कम है. निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर ने तो यह आंकड़ा घटाकर 85 फीसदी कर दिया है.
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फसलों पर असर
कृषि मंत्रालय ने भी माना है कि कम बारिश से कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में धान समेत कई फसलों का रकबा घटा है.बारिश घटने से जलाशयों में पानी की कमी से अगले साल की शुरुआत में गेहूं, सरसों जैसी रबी की फसलों पर भी असर दिख सकता है. गन्ने की फसल भी प्रभावित हो सकती है. गन्ने की कम पैदावार से वैसे ही चीनी का रेट आसमान छूने लगा है.

अल नीनो कब पैदा होता है
सामान्यतया भूमध्य रेखा के पास पूरब से पश्चिम की ओर व्यापारिक हवाएं चलती हैं. ये हवाएं प्रशांत महासागर के गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं.लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं या उल्टी दिशा में बहने लगती हैं तो अल नीनो आता है. इससे पश्चिम की ओर धकेले जाने वाला गर्म पानी उल्टा दक्षिणी अमेरिका में पेरू और इक्वाडोर तटों की ओर लौटने लगता है. ये घटना 2 से 7 साल के बीच होती है. अल नीनो सक्रिय होने के बाद 9 से 12 महीने तक असर दिखाता है. अक्सर से जून-जुलाई के मध्य से शुरू होकर दिसंबर तक प्रचंड रूप धारण कर लेता है.
कहीं सूखा और कहीं बाढ़ आने की चेतावनी
अल नीनो के असर से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर पिछले कुछ दशकों से देखा जा रहा है. विश्व के शीर्ष मौसम विज्ञानी चेतावनी दे रहे हैं कि अब मौसमी बदलाव बेहद गंभीर हो रहे हैं. कहीं बारिश न होने से एकदम सूखा तो कहीं प्रचंड बारिश से भयंकर बाढ़ देखने को मिल रही है. भारत में भी मॉनसून बारिश के दिन कम हो गए हैं, लेकिन तीव्रता बढ़ गई है. यानी कभी 15-15 दिन बारिश मॉनसून सीजन में नहीं होती तो कभी किसी एक ही दिन प्रचंड बारिश से शहर से गांव लबालब भर जाते हैं. दिल्ली और गुरुग्राम में अगस्त में ऐसा ही देखने को मिला. अभी पूर्वोत्तर क्षेत्र में भयानक बाढ़ से गुवाहाटी तक असर दिख रहा है.
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