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सास इंदिरा गांधी से रिश्ते, संजय गांधी का सरकार में दखल, सोनिया गांधी ने बुक में किस-किस पर लिखा

सोनिया गांधी ने अपनी किताब में इमरजेंसी के कारणों के बारे में विस्तार के साथ बताया है. इसके साथ ही इंदिरा गांधी के मौत वाले दिन की घटना का भी मिनट टू मिनट जिक्र किया है.

सास इंदिरा गांधी से रिश्ते, संजय गांधी का सरकार में दखल, सोनिया गांधी ने बुक में किस-किस पर लिखा
सोनिया गांधी ने अपनी किताब में सीधे तौर पर संजय गांधी को इमरजेंसी के लिए जिम्मेदार ठहराया है. (फोटो-एनडीटीवी)
  • सोनिया गांधी ने अपनी आत्मकथा में आपातकाल को एक बड़ी गलती बताया और कहा कि इंदिरा गांधी को भी बाद में एहसास हुआ
  • उन्होंने लिखा कि अगर संजय गांधी को नियंत्रण में रखा जाता तो आपातकाल के बाद हुए नुकसान को रोका जा सकता था
  • सोनिया गांधी ने राजीव गांधी से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की बात पर गहरा दर्द और विरोध व्यक्त किया था

सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' 10 नवंबर को रिलीज होने जा रही है. मगर उससे पहले उन्होंने खुद इस किताब से जुड़े कई किस्से द गार्जियन को दिए इंटरव्यू में बताए. इसमें अपनी सास इंदिरा गांधी से रिश्तों से लेकर संजय गांधी तक पर बात की है. साथ ही इमरजेंसी और उसके बाद उनकी हत्या पर विस्तार से एक-एक बात बताई है.

  1. आपातकाल (इमरजेंसी) पर अपनी राय रखते हुए, कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इसे लागू करने के फैसले को एक गलती बताया है. उन्होंने कहा कि उनका मानना ​​है कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी बाद में ऐसा ही महसूस होने लगा था. 'द गार्जियन' के अनुसार, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष ने अपनी आने वाली किताब "बिलोंगिंग: अ जर्नी ऑफ लव" में लिखा है कि अगर संजय गांधी को "नियंत्रण में" रखा गया होता, तो आपातकाल लागू होने के बाद हुए काफी नुकसान को रोका जा सकता था. अपनी किताब के लॉन्च से पहले ब्रिटिश अखबार को दिए एक इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने कहा, "मुझे हमेशा लगता है कि इंदिरा गांधी दिल से एक लोकतांत्रिक इंसान थीं. मुझे पता है कि कई लोग इस बात पर हंसेंगे, लेकिन मेरा मानना ​​है कि आपातकाल के दौरान वह कभी सहज नहीं थीं. मुझे लगता है कि यह उन पर एक भारी बोझ की तरह था."
  2. सोनिया गांधी के अनुसार, आपातकाल के फैसले को लेकर परिवार बंटा हुआ था. 'द गार्जियन' की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया गांधी के पति राजीव इस कदम के खिलाफ थे. उन्होंने अपनी मां से अगले चुनाव तक इंतजार करने को कहा था, लेकिन उनके छोटे बेटे संजय ने इस फैसले पर जोर दिया. परिवार के साथ एक डिनर के दौरान संजय ने तर्क दिया कि विपक्ष उनकी मां को बर्बाद कर देगा और उनसे कहा, "उन्हें रोकना ही होगा." सोनिया गांधी के अनुसार, इससे परिवार के भीतर भी तनाव बढ़ गया था, क्योंकि राजीव ने अपनी मां को समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उनकी बात सुनने से इनकार कर दिया. सोनिया गांधी ने अपनी किताब में लिखा है, "अगर संजय को नियंत्रण में रखा गया होता, तो आपातकाल के बाद हुए काफी नुकसान को रोका जा सकता था."
  3. ब्रिटिश अखबार 'द गार्जियन' में छपे इस किताब के एक अंश के अनुसार, सोनिया गांधी 31 अक्टूबर 1984 के उस मनहूस दिन की घटनाओं का जिक्र करती हैं, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने 1, सफदरजंग रोड स्थित उनके आवास पर हत्या कर दी थी. कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष बताती हैं, "मेरी सास हमारे घर के बगल वाली इमारत में अपने दफ्तर के लिए निकलती हैं और मैं अपने कमरे में वापस आ जाती हूं. मैं नहाने ही वाली होती हूं कि मुझे धमाकों की आवाज सुनाई देती है—जैसे पटाखे फूट रहे हों, लेकिन कुछ अलग तरह से. मैं वहीं सुन्न रह जाती हूं. तभी कोई मेरे बाथरूम का दरवाजा जोर-जोर से खटखटाता है. यह बच्चों की नैनी, ओंगमू है, जो बुरी तरह रो रही है. मेरा दिल जोर से धड़क रहा है, मैं झटके से दरवाजा खोलती हूं. वह बिना कुछ बोले, घबराहट में बगीचे की ओर इशारा करती है."
  4. किताब के एक संपादित अंश के अनुसार, सोनिया गांधी बताती हैं, "मैं उस रास्ते पर दौड़ती हूं जो अकबर रोड की तरफ जाता है. मैं देखती हूँ कि एक सफेद एंबेसडर कार उसी रास्ते की ओर धीरे-धीरे बढ़ रही है. मैं हिचकिचाती हूं. मैं रुक जाती हूं, मेरी धड़कनें थम सी जाती हैं. घबराहट, दहशत, डर. मुझे घुटन महसूस होती है. मैं सांस नहीं ले पा रही हूं. ऐसा लगता है कि मैं अभी गिर पड़ूंगी. नहीं, नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती. मुझे कार तक जाना ही होगा. मैं देखती हूं कि उन्हें कार के अंदर ले जाया जा रहा है. मैं सब समझ जाती हूँ; मैं चीख पड़ती हूं."
  5. सोनिया गांधी हत्या के उस भयानक पल को याद करते हुए बताती हैं, "अब मैं कार के अंदर हूं, फर्श पर बैठी हूं और उनका चेहरा मेरी तरफ है. खून... उनकी साड़ी पर खून है, उनके सीने पर खून है. उनकी बड़ी-बड़ी आंखें पूरी तरह खुली हैं; उनके चेहरे पर हैरानी के भाव हैं. वह हिलती-डुलती नहीं हैं. मैं उनसे बात करने की कोशिश करती हूँ, उन्हें पुकारती हूं—'मम्मी, मम्मी'—लेकिन उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकलता. मैं फिर कोशिश करती हूं, पर वह कोई जवाब नहीं देतीं. वह बताती हैं कि इंदिरा गांधी के सहयोगी कार के आगे वाले हिस्से में थे और चिल्ला रहे थे. भारी और धीमी ट्रैफिक के कारण कार मुश्किल से ही आगे बढ़ पा रही थी. वह याद करती हैं कि कार में कोई सायरन नहीं था और रास्ते में एक के बाद एक, दो लाल बत्तियां (रेड लाइट) आईं. फिर अस्पताल पहुंचे. गेट नहीं खुल रहा था. चारों तरफ अफरा-तफरी थी. हमें रोक दिया गया; किसी ने खिड़की से झांककर सवालिया नजरों से देखा. फिर हमें अंदर जाने दिया गया."
  6. इसके बाद वो बताती हैं, "हम इमरजेंसी विभाग में पहुंचे, जो लोगों से खचाखच भरा था. हमें फिर से रोक दिया गया और अंदर नहीं जाने दिया गया; हमें अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा. किसी ने ड्राइवर को आवाज़ दी और आगे बढ़ने का इशारा किया. उन्होंने हमें पहचान लिया; उन्हें (इंदिरा गांधी को) एक ट्रॉली पर लिटा दिया गया. हमें कहीं ले जाया गया - शायद ऑपरेशन थिएटर? उन्होंने मुझसे साथ चलने को कहा. मुझे पास के ही एक कमरे में ले जाया गया. मैंने जिद की कि नहीं, मुझे उनके पास ही रहना है. मुझे जानना था, मुझे देखना था. उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया; वे अपनी इमरजेंसी प्रक्रियाओं में पूरी तरह व्यस्त थे" 
  7. फिर आगे सोनिया बताती हैं, "मैं बहुत उलझन में थी, जैसे खो गई होऊं; वहां मुझे कोई भी जाना-पहचाना नहीं दिखा. अपने ड्रेसिंग गाउन में मैं कांप रही थी. मुझे डर लग रहा था, मेरे दिमाग में विचारों की आंधी चल रही थी. राजीव कहां हैं? मैंने याद करने की कोशिश की. पर मैं याद नहीं कर पाई. बच्चे... हां, वे स्कूल में हैं; उन्हें घर लाना होगा. हे भगवान, नहीं, नहीं! वे सुरक्षित रहें, राजीव सुरक्षित रहें. मैं किससे कहूं, किससे बात करूं?"  सोनिया बताती हैं कि कई घंटे बीत गए, और लोग आते गए और वहां भीड़ जमा होती गई. उन्होंने डॉक्टर से कुछ पूछने का इशारा किया; डॉक्टर ने सिर हिलाकर मना कर दिया. सोनिया ने कहा, "मैं समझ गई, हां, मैं समझ गई. मैं फूट-फूट कर रोने लगी, खुद को रोक नहीं पाई. किसी ने मुझे शांत करने की कोशिश की. मैं सुन्न हो गई थी, मुझे बहुत ठंड लग रही थी. 31 अक्टूबर 1984 को दोपहर 2 बजे, इंदिरा गांधी को मृत घोषित कर दिया गया. मुझे घर भेजा गया ताकि मैं उनके पार्थिव शरीर के लिए कपड़े ला सकूं. रास्ते में, कुछ लोगों ने हमारी कार को रोकने की कोशिश की और खिड़कियों पर जोर-जोर से पीटने लगे. वे बहुत गुस्से में थे और कुछ चिल्ला रहे थे, जो मुझे समझ नहीं आया." 
  8. सोनिया याद करती हैं कि राजीव पश्चिम बंगाल में एक राजनीतिक रैली में थे, तभी पुलिस गश्ती दल ने उनके काफिले को रोक लिया. उन्हें बताया गया कि दिल्ली से एक संदेश आया है कि उन्हें तुरंत वापस लौटना चाहिए; कोई गंभीर हादसा हो गया है. किताब के अनुसार, राजीव को हेलीपैड ले जाया गया, जहाँ से वे कलकत्ता और फिर दिल्ली के लिए रवाना हुए. रास्ते में उन्होंने बीबीसी के बुलेटिन में सुना कि इंदिरा गांधी घायल हैं और उनकी हालत बहुत गंभीर है.  सोनिया गांधी किताब में लिखती हैं, "किसी ने उन्हें सीधे तौर पर यह नहीं बताया कि उनकी मां अब नहीं रहीं, लेकिन वे समझ गए थे."
  9. राजीव गांधी के आने के बारे में सोनिया बताती हैं, " वो दोपहर 3:30 बजे पहुंचे और उन्हें सीधे अस्पताल ले जाया गया, जहां वे अन्य लोगों के साथ अंदर गए. मुझे याद है कि मेरी दिली इच्छा थी कि काश मुझे उनके साथ कुछ पल अकेले बिताने को मिलें. हम एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, और जब उन्होंने मुझसे बात की, तो मुझे एहसास हुआ कि वे कुछ ऐसा कह रहे हैं जिसे मैं सुनना नहीं चाहती थी. उन्होंने कहा कि मुझसे कहा गया है; वे चाहते हैं कि मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूं. मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे दिल में सीधे खंजर घोंप दिया हो. मेरे सीने में धड़कनें तेज़ हो गईं, और मेरे अंदर एक गहरा गुस्सा उबलने लगा. मैं मानो फटने ही वाली थी. मैंने खुद को संभालने की कोशिश की. तुमसे कहा गया है? उनकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की? उनकी हिम्मत कैसे हुई? वे कौन हैं? तुम ही क्यों, आखिर तुम ही क्यों? तुमने उन्हें ऐसा कहने की इजाज़त कैसे दी? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता; इस बार ऐसा नहीं होगा!' गहरे दर्द और पीड़ा से घिरी, पसीने से तर-बतर, मुझे उल्टी जैसा महसूस होने लगा. मैं चिल्लाना चाहती थी, मदद मांगना चाहती थी. कोई मेरी मदद करे, इस सब को रोके." 
  10. आगे सोनिया गांधी ने बताया कि वे फूट-फूट कर रो पड़ीं और हाथ जोड़कर राजीव गांधी से विनती करने लगीं. "नहीं, नहीं, तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? तुम्हें उन्हें रोकना होगा, तुम्हें मना करना होगा, तुम्हें 'नहीं' कहना होगा—बच्चों की खातिर, खुद अपनी खातिर. तुम हमारे साथ ऐसा नहीं कर सकते. वे तुम्हें मार डालेंगे; वे तुम्हें भी मार डालेंगे!" मैं चिल्लाई. उसने जवाब दिया, 'वे वैसे भी मुझे मार ही डालेंगे.' इस किताब में राजीव गांधी से सोनिया गांधी की पहली मुलाकात से लेकर उन पर लगाए गए विदेशी मूल के मुद्दे और वर्तमान मोदी सरकार पर भी काफी कुछ लिखा है.

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