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पत्रकार से कारोबार और फिर सियासत तक... ऐसे थे BJP नेता और SIS ग्रुप के संस्थापक आरके सिन्हा

आरके सिन्हा का राजनीतिक सफर भी काफी पुराना रहा. वह जनसंघ के समय से राजनीति में सक्रिय थे और बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में गिने जाते थे. 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें जनसंघ से जोड़ा था.

पत्रकार से कारोबार और फिर सियासत तक... ऐसे थे BJP नेता और SIS ग्रुप के संस्थापक आरके सिन्हा
पटना:

बिहार के वरिष्ठ बीजेपी नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद और SIS ग्रुप के संस्थापक डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा का शुक्रवार को निधन हो गया. उन्होंने नोएडा स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली. उनके निधन से बिहार के राजनीतिक, कारोबारी और सामाजिक जगत में शोक है. डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा का जन्म 22 सितंबर 1951 को बिहार के बक्सर में हुआ था. उन्होंने पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और बाद में कारोबारी और राजनीतिज्ञ के रूप में अपनी पहचान बनाई. वह बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और 2014 से 2020 तक बिहार से राज्यसभा सांसद रहे. इसके अलावा, उन्होंने SIS ग्रुप की स्थापना की, जिसे देश की प्रमुख निजी सुरक्षा कंपनियों में गिना जाता है.

आरके सिन्हा ने अपने करियर की शुरुआत पत्रकार के रूप में की थी. 1971 में उन्होंने पटना के अखबारों 'सर्चलाइट' और 'प्रदीप' से पत्रकारिता शुरू की. उस समय उनकी तनख्वाह करीब 250 रुपये महीने थी. भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में भी काम किया. अपराध और राजनीति की खबरों पर उनकी खास पकड़ थी. पत्रकारिता के दौरान ही उनका संपर्क लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से हुआ. उन्होंने 1974-75 के छात्र आंदोलन पर 'जन आंदोलन' नाम से किताब भी लिखी. यह किताब उनके शुरुआती लेखन कार्यों में खास मानी जाती है. 

आरके सिन्हा की कारोबारी यात्रा 1974 में शुरू हुई. जयप्रकाश नारायण ने उन्हें पूर्व सैनिकों के लिए रोजगार के अवसर तैयार करने का सुझाव दिया था. इसी सोच के साथ उन्होंने पटना में Security and Intelligence Services यानी SIS की शुरुआत की. शुरुआत में उनके साथ केवल 14 पूर्व सैनिक थे, जिन्हें निजी सुरक्षा गार्ड के रूप में काम दिया गया. धीरे-धीरे यह कंपनी सुरक्षा सेवाओं के क्षेत्र में बड़ा नाम बन गई. SIS ने भारत के अलग-अलग राज्यों में अपना कारोबार बढ़ाया और बाद में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और सिंगापुर तक पहुंच बनाई. 2006 में कंपनी ने कैश लॉजिस्टिक्स और 2009 में फैसिलिटी मैनेजमेंट के कारोबार में भी कदम रखा. 2008 में ऑस्ट्रेलिया की Chubb Security के कारोबार का अधिग्रहण उसके विस्तार का बड़ा पड़ाव था.
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2017 में SIS शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई. अक्टूबर 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी का सालाना समेकित कारोबार करीब 16 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था.

आरके सिन्हा का राजनीतिक सफर भी काफी पुराना रहा. वह जनसंघ के समय से राजनीति में सक्रिय थे और बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में गिने जाते थे. उनके निजी जीवन से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें जनसंघ से जोड़ा था.

बीजेपी ने 2014 में उन्हें बिहार से राज्यसभा भेजा. वह 2014 से 2020 तक राज्यसभा सांसद रहे. इस दौरान उन्होंने गृह मामलों और विदेश मामलों सहित कई संसदीय समितियों में काम किया. वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सलाहकार भी रह चुके थे. बिहार में पार्टी के चुनाव अभियान से जुड़ी जिम्मेदारियां भी उन्होंने संभाली थीं.

अब उनके कारोबार की बागडोर उनके बेटे ऋतुराज किशोर सिंह संभाते हैं. ऋतुराज का जन्म 29 नवंबर 1980 को रांची में हुआ था. उन्होंने पटना के डॉन बॉस्को और देहरादून के द दून स्कूल से पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की. वह बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव हैं और कारोबार के क्षेत्र में SIS ग्रुप के ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

कंपनी में आने के बाद उन्होंने कारोबार के विस्तार, अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और दूसरी कंपनियों के अधिग्रहण में भूमिका निभाई. SIS के विस्तार के दौरान कंपनी की शाखाओं की संख्या 14 से बढ़कर 2012 तक करीब 100 हो गई थी. वह फिलहाल SIS ग्रुप के ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. राजनीति में भी ऋतुराज सक्रिय हैं. वह बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव हैं. इसके अलावा वह रक्षा मंत्रालय की NCC से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति, IIM बोधगया के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स और FICCI की प्राइवेट सिक्योरिटी सेक्टर कमेटी से भी जुड़े हैं.

आरके सिन्हा ने कारोबार और राजनीति के साथ सामाजिक कामों में भी भागीदारी की. SIS और उनसे जुड़े संगठनों के जरिए युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार देने, बाढ़ राहत, मुफ्त एंबुलेंस सेवा और सामुदायिक विवाह जैसे काम किए गए. SIS की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, उनके नेतृत्व में दो लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और एक लाख से अधिक लोगों को स्थायी रोजगार मिला. आरके सिन्हा की पहचान बिहार के उन लोगों में रही जिन्होंने पत्रकारिता से शुरुआत कर कारोबार और राजनीति, दोनों में लंबा सफर तय किया. उनके निधन से बिहार ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है जिसकी पहचान सिर्फ एक राजनीतिक नेता या उद्योगपति तक सीमित नहीं थी.

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