बिहार के बाद चुनाव आयोग कई राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कर रहा है. इसका मकसद वोटर लिस्ट से फर्जी, डुप्लीकेट और मर चुके लोगों के नाम हटाना है. इस प्रक्रिया में कई लोगों के नाम हट रहे हैं, जिसके बाद सरकारी योजनाओं के लाभ भी बंद होने का दावा किया जा रहा है. ऐसे ही एक मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई, जिस पर बुधवार को सुनवाई हुई. इस दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि SIR में अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया जाता है, तब भी वह राशन जैसी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ पाने का हकदार रहेगा.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच पश्चिम बंगाल के मोहिबुल्ला मंडल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याचिकाकर्ता ने राज्य के खाद्य और आपूर्ति विभाग के जून में जारी आदेश के आधार पर अपना राशन कार्ड रद्द या निलंबित किए जाने पर रोक लगाने और अपील लंबित रहने तक सब्सिडी वाला राशन जारी रखने की मांग की थी.
सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में प्रभावी राहत कलकत्ता हाईकोर्ट ही दे सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की अनुमति दी.
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर आपका नाम वोटर लिस्ट से हटा भी दिया जाता है, तब भी आप कुछ लाभ पाने के हकदार हैं.
उन्होंने कहा कि ये लाभ हाईकोर्ट आसानी से दिला सकता है. यदि आपकी अपील स्वीकार हो जाती है, तो पूरा विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा.
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट शादान फरासत ने दलील दी कि बिहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि वोटर लिस्ट से नाम हटने का असर केवल मतदान के अधिकार तक सीमित है. उन्होंने अदालत से इस सिद्धांत को लागू करने की मांग की.
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जरूरत पड़ी तो हम 100 मामलों में भी यह साफ करेंगे, लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि हाईकोर्ट इस सिद्धांत को समझेंगे और उचित राहत देंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलीय अथॉरिटी से भी कहा कि वह याचिकाकर्ता की अपील का निपटारा दो महीने के भीतर करने का प्रयास करे. यदि इसके बाद भी शिकायतों का समाधान नहीं होता है, तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट का रुख कर सकता है.
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पहले भी साफ कर चुका है सुप्रीम कोर्ट
इससे पहले बिहार में SIR प्रक्रिया को बरकरार रखने वाले अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है.
अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्णय लेने वाला प्राधिकरण नहीं है. वोटर लिस्ट से नाम हटने का प्रभाव केवल इतना है कि संबंधित व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता, लेकिन इससे उसकी नागरिकता या उससे जुड़े अन्य अधिकार स्वतः समाप्त नहीं होते.
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