बच्चों और नाबालिगों को यौन हिंसा से बचाने के मकसद से 2012 में एक कानून लाया गया था. इस कानून का नाम था- प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुल ऑफेंस यानी POCSO एक्ट. 2019 में इस कानून में संशोधन किया गया और अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया गया. ये कानून इतना सख्त है कि अगर किसी अपराधी को उम्रकैद की सजा मिल जाए तो वह जिंदा रहते तो जेल से बाहर तक नहीं आ सकता.
अब इसी POCSO के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सवाल उठाए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी लड़के या लड़की के बीच आपसी सहमति के संबंध हों और वे चले जाएं तो हर मामले को POCSO का केस नहीं माना जा सकता.
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जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि 15 से 18 साल की उम्र प्रयोग और भावनात्मक विकास का समय होती है. ऐसे में हर मामला POCSO का मामला नहीं माना जा सकता. सरकार लड़के-लड़की को भागने से कैसे रोक सकती है?
कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में माता-पिता अपना तथाकथित 'सम्मान' बचाने के लिए ऐसे मामलों को आपराधिक मुकदमे का रूप दे देते हैं और आखिरकार हमें आरोपी को बरी करना पड़ता है.
लेकिन ये पहली बार नहीं...
ये पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने POCSO के कथित दुरुपयोग पर सवाल उठाए हों. पिछले साल ही अगस्त में जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस महादेवन की बेंच ने ऐसे ही एक मामले पर सुनवाई के दौरान कहा था- 'प्यार कोई अपराध नहीं है और न ही यह कभी अपराध बन सकता है.'
अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि अगर बालिग होने वाले लड़के-लड़कियों के बीच सच्चे रोमांटिक रिश्ते हैं तो उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए.
वहीं, इसी साल जनवरी में एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि POCSO का इस्तेमाल कई बार निजी विवाद या परिवार की नाराजगी निकालने के लिए हो रहा है.
सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, बल्कि कई हाई कोर्ट्स भी सवाल खड़े कर चुकी हैं. जनवरी में ही दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए कहा था, 'POCSO का मकसद 18 साल से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण से बचाना था. इसका मकसद कभी भी युवा लोगों के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी में लाना नहीं था.'
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क्या वाकई POCSO का दुरुपयोग होता है?
इसे समझने से पहले कुछ आंकड़े देख लेते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में POCSO के तहत 69,191 केस दर्ज किए गए थे. इनमें 70,132 विक्टिम थे. इसका मतलब हुआ कि हर दिन औसतन 195 बच्चे यौन हिंसा का शिकार हो रहे हैं.
NCRB के मुताबिक, लगभग 64 फीसदी यानी 44,126 मामले POCSO एक्ट की धारा 4 और 6 के तहत दर्ज किए गए थे. ये धारा तब लगाई जाती है जब किसी के साथ पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट हुआ हो. हैरान करने वाली बात यह थी कि 97% मामलों में आरोपी पीड़ित की जान-पहचान वाला ही था.
रही बात अगर इस कानून के दुरुपयोग की तो सबसे बड़ी वजह यह है कि POCSO के मामलों में गिरफ्तार ज्यादातर आरोपी बरी हो जाते हैं. NCRB के मुताबिक, POCSO के मामलों में कन्विक्शन रेट लगभग 32% ही है. इसका मतलब हुआ कि 100 में से 32 मामलों में ही आरोपी को सजा हो रही है और बाकी मामलों में आरोपी बरी हो जा रहे हैं.
NCRB का डेटा बताता है कि 2024 में POCSO के 39,249 मामलों में ट्रायल पूरा हुआ, जिनमें से 12,672 मामलों में आरोप साबित हुए, जबकि 25,476 मामलों में आरोपी को बरी कर दिया गया. जबकि 1,101 मामले ऐसे थे जिनमें ट्रायल शुरू होने से पहले ही मामला रफा-दफा हो गया.
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इसकी वजह क्या है?
संसद में सरकार ने इस बात को माना है कि किसी भी मामले में कन्विक्शन जांच और सबूतों पर निर्भर करता है. POCSO के मामलों में कन्विक्शन के कम होने का बड़ा कारण किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध, गवाहों का मुकरना और कमजोर सबूत हैं.
जून 2022 में Enfold Proactive Health Trust ने एक स्टडी की थी, जिसमें असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के POCSO के 7,560 मामलों में आए फैसलों का एनालिसिस किया गया था. इस स्टडी में पाया गया कि बड़ी संख्या में मामले 'रोमांटिक रिलेशनशिप' के थे, जहां लड़के-लड़की रिश्ते में थे और परिवार की शिकायत की बात POCSO लगा. ऐसे मामलों में लड़की अक्सर कोर्ट में आरोपी के खिलाफ बयान नहीं देती, जिससे बरी होने की संभावना बढ़ जाती है.
इस स्टडी में ये भी सामने आया था कि 80% मामलों में FIR माता-पिता या रिश्तेदार दर्ज करवा रहे थे. सिर्फ 18.3% मामलों में ही खुद लड़की ने शिकायत की थी.
अब इसमें भी चौंकाने वाली बात ये थी कि जिन 314 मामलों में लड़की ने खुद केस दर्ज करवाया, उनमें 155 केस इसलिए हुए क्यों लड़के ने शादी से मना कर दिया और 154 केस इसलिए हुए जिनमें जबरदस्ती संबंध या किडनैप हुआ था. बाकी कुछ मामलों में घर की ओर से केस दर्ज करवाने का दबाव बनाया गया था.
इसी तरह, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (CCL-NLSIU) ने भी 5 राज्यों के 2,788 मामलों पर एक स्टडी की थी और पाया था कि हर 5 में से 1 केस में 'रोमांटिक रिलेशनशिप' का मामला था.
इन स्टडीज में पता चला कि हर चार में से एक मामला 'रोमांटिक रिलेशन' का होता है. 65% मामलों में लड़कियां खुद घर से भागी थीं. जब रिलेशन टूटता है या शादी नहीं होती तो केस बनता है. आखिरकार कोर्ट में गवाही नहीं मिलती और आरोपी बरी हो जाता है.
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