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"सोशल मीडिया बना समानांतर मंच, जजों पर रोज सुनाए जा रहे फैसले": जस्टिस जॉयमाल्या बागची

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने न्यायपालिका पर सोशल मीडिया और मीडिया ट्रायल के बढ़ते असर को गंभीर चुनौती बताया है. 

"सोशल मीडिया बना समानांतर मंच, जजों पर रोज सुनाए जा रहे फैसले": जस्टिस जॉयमाल्या बागची
सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली में सोशल मीडिया को लेकर चर्चा हुई है.

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा है कि डिजिटल युग में न्यायपालिका के सामने नई और जटिल चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. उनके अनुसार सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत सूचनाएं, एल्गोरिदम से प्रभावित जनमत और मीडिया ट्रायल न्यायिक स्वतंत्रता पर असर डाल रहे हैं. उन्होंने कहा कि जजों को आज अदालत के भीतर से ज्यादा अदालत के बाहर बनने वाले माहौल से सावधान रहने की जरूरत है.

1 अगस्त को आयोजित पांचवें जस्टिस एचआर खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोजियम में बोलते हुए जस्टिस बागची ने कहा, "सोशल मीडिया ने न्यायिक कार्यवाही को कई बार एक तमाशे में बदल दिया है, जहां फैसले कानून और तथ्यों के आधार पर नहीं बल्कि लोकप्रिय प्रतिक्रिया और ‘लाइक्स' के आधार पर परखे जाने लगते हैं." उन्होंने आगे कहा, "निष्पक्ष न्याय सोशल मीडिया पर लाइक्स के बाजार में नीलाम हो रहा है और स्वतंत्र राय रखने वाले जजों को ऑनलाइन भीड़ की नाराजगी का सामना करना पड़ता है."

 "लाइव-स्ट्रीमिंग से पारदर्शिता बढ़ी"

जस्टिस बागची ने माना कि अदालतों की लाइव-स्ट्रीमिंग से पारदर्शिता बढ़ी है और आम लोगों की न्याय तक पहुंच मजबूत हुई है. हालांकि उन्होंने इसके कुछ अनपेक्षित परिणामों की ओर भी ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा, "अदालत की सुनवाई के छोटे-छोटे वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर बिना संदर्भ के प्रसारित किए जाते हैं और जजों की मौखिक टिप्पणियों को अंतिम फैसला समझ लिया जाता है."

उन्होंने कहा, "आज चुनौती अदालत के कैमरे से ज्यादा बाहर मौजूद सोशल मीडिया की है. एक प्लेटफॉर्म पर डाला गया वीडियो कई जगह फैल जाता है और गलत सूचना सुधार से कहीं तेज गति से फैलती है."

"सोशल मीडिया पर जजों कि हो रही आलोचना"

जस्टिस बागची के अनुसार सोशल मीडिया अब एक समानांतर मंच बन गया है जहां जजों की सार्वजनिक जांच और आलोचना होने लगी है. उन्होंने याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 121 संसद में न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को सीमित करता है, लेकिन डिजिटल दुनिया में जजों पर रोज फैसले सुनाए जा रहे हैं.

उन्होंने जजों के सोशल मीडिया पर जाकर अपने फैसलों या टिप्पणियों की सफाई देने के विचार को भी खारिज किया. उनके मुताबिक न्यायाधीशों को संयम, निष्पक्षता और संस्थागत गरिमा बनाए रखनी चाहिए.

मीडिया ट्रायल पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन किसी व्यक्ति को अदालत के अंतिम फैसले से पहले दोषी घोषित नहीं किया जा सकता. उन्होंने बिग टेक कंपनियों के एल्गोरिदम को भी उभरती चुनौती बताते हुए कहा कि सनसनीखेज सामग्री को बढ़ावा देने वाले एल्गोरिदम न्यायिक मामलों को लेकर पक्षपातपूर्ण जनमत तैयार कर सकते हैं.

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