शिव से निर्दलीय विधायक और बाड़मेर के युवा नेता रविंद्र सिंह भाटी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर यात्रा निकालने जा रहे हैं. ऊंची जातियों के लिए EWS कोटे के माध्यम से राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग ऐसे समय उठाई जा रही है, जब राजस्थान पंचायत चुनावों की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में राजनीतिक आरक्षण का यह मुद्दा राज्य की पहले से ही जातीय आधार पर बंटी राजनीति के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है.
बाड़मेर से जोधपुर तक होगा सफर
इस मुद्दे पर जनमत तैयार करने के लिए भाटी 25 सितंबर को बाड़मेर स्थित अपने गढ़ आलोक आश्रम से पांच दिवसीय यात्रा की शुरुआत करेंगे. हिंदू कैलेंडर में यह दिन विजय और शुभता के प्रतीक 'अनंत चतुर्दशी' के रूप में जाना जाता है. 29 वर्षीय भाटी ने 25 वर्ष की उम्र में अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा था और तब से उन्होंने स्वतंत्र राजनीतिक राह अपनाई है. ऐसे में यह मुद्दा उन्हें शिव विधानसभा क्षेत्र और पश्चिमी राजस्थान से निकालकर राज्य की राजनीति के बड़े मंच तक पहुंचा सकता है.
सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़
भाटी सोशल मीडिया पर बड़ी लोकप्रियता रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं. इंस्टाग्राम पर उनके 31 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं. फेसबुक पर उन्हें 16 लाख से ज्यादा लोग फॉलो करते हैं, जबकि एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उनके करीब 3.49 लाख फॉलोअर्स हैं.
हालांकि भाटी इस धारणा को खारिज करते हैं कि उनकी पहचान केवल सोशल मीडिया तक सीमित है. उन्होंने बाड़मेर की शिव विधानसभा सीट पर 10 उम्मीदवारों के बीच बेहद करीबी मुकाबले में जीत हासिल की थी. उन्हें 79,495 वोट मिले थे और उन्होंने 3,950 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. भाटी को कुल 31.44 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. इस चुनाव की खास बात यह रही कि दूसरे स्थान पर भी निर्दलीय उम्मीदवार फतेह खान रहे थे. कांग्रेस उम्मीदवार भाटी से 24,231 वोट पीछे रहे, जबकि भाजपा उम्मीदवार को उनसे 56,675 वोट कम मिले थे.
लोकसभा चुनाव में भी दिखाया दम
2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाटी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे थे. उन्हें 5.86 लाख से अधिक वोट मिले. वह कांग्रेस उम्मीदवार से करीब एक लाख वोटों से पीछे रहे, लेकिन भाजपा उम्मीदवार और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी से लगभग 2.99 लाख वोट आगे रहे.
भाटी कहते हैं, "ये आंकड़े खुद बहुत कुछ कहते हैं. ॐ इग्नोराय नमः, मैं इस तरह की बातों को नजरअंदाज करता हूं. मैंने 2019 से 2022 तक जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में राजनीति की शुरुआत की. मैंने विधानसभा चुनाव सबसे कम उम्र के उम्मीदवार के रूप में लड़ा और उसके बाद लोकसभा चुनाव में भी 5 लाख से ज्यादा वोट हासिल किए."
कोविड के दौरान बने मजबूत रिश्ते
वह कहते हैं, "जोधपुर विश्वविद्यालय मारवाड़ के विभिन्न हिस्सों से आने वाले छात्रों के लिए सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है. वहां मैंने पूरे क्षेत्र के युवाओं के साथ मजबूत संबंध बनाए. खासकर कोविड काल के दौरान लोगों की मदद करने का अवसर मिला. उस समय बने रिश्ते आज भी मेरे साथ हैं और उन्होंने मुझे राजनीतिक रूप से काफी मदद की है."
भाटी का कहना है, "आज की राजनीति में केवल धन और प्रभाव रखने वाले लोग ही प्रवेश कर सकते हैं. अब समय आ गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया जाए, जिन्हें पंचायत राज व्यवस्था में EWS कोटे के जरिए पहले ही परिभाषित किया जा चुका है."
चुनावी खर्च पर उठाए सवाल
वह सवाल उठाते हैं, "आज पंचायत चुनाव लड़ने में उम्मीदवारों को काफी पैसा खर्च करना पड़ता है. ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जगह कहां मिल रही है? यह ऊंची जातियों के लिए राजनीतिक व्यवस्था में पिछले दरवाजे से प्रवेश नहीं है."
भाटी स्पष्ट करते हैं, "जहां सीटें सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित होती हैं, वहां भी क्या आप आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को चुनाव लड़ते देखते हैं? वे चुनाव नहीं लड़ सकते, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं होते."
राजस्थान की राजनीति में नया समीकरण?
राजस्थान की कुल मतदाता आबादी में करीब 24 प्रतिशत हिस्सेदारी सवर्ण समुदायों की मानी जाती है. लंबे समय से यह धारणा रही है कि OBC और SC वोटों पर आधारित बड़े राजनीतिक समीकरणों के बीच सवर्ण वर्ग खुद को अपेक्षाकृत हाशिये पर महसूस करता रहा है. साल 1999 में शुरू हुए सोशल जस्टिस फ्रंट ने भी सवर्ण समुदायों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग उठाई थी. यह पहल OBC आरक्षण के विस्तार और जाट समुदाय को आरक्षण दिए जाने की पृष्ठभूमि में सामने आई थी.
ऐतिहासिक रूप से राजस्थान में राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य जैसे सवर्ण समुदाय भाजपा के मजबूत समर्थक माने जाते रहे हैं. 2019 में केंद्र सरकार द्वारा EWS आरक्षण लागू किए जाने और बाद में नियमों में बदलाव के जरिए इस वर्ग को साधने की कोशिश की गई थी. भाजपा ने भी 103वें संविधान संशोधन को चुनावी मुद्दा बनाया था.
यात्रा का केंद्र सिर्फ आरक्षण नहीं
भाटी ने स्पष्ट किया कि उनकी यात्रा का उद्देश्य केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है. उनकी 'सरलीकरण यात्रा' बाड़मेर के आलोक आश्रम से शुरू होगी और जोधपुर में समाप्त होगी. यह यात्रा पश्चिमी राजस्थान के उन इलाकों से होकर गुजरेगी, जहां उनका मजबूत जनाधार माना जाता है. भाटी कहते हैं, "राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस यात्रा का सिर्फ एक पहलू है. हम यह भी चाहते हैं कि EWS के लिए राज्य और केंद्र में समान नियम हों. केंद्र में EWS के लिए जो मापदंड हैं, उनमें राज्यों की अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा जाता."
वह कहते हैं, "केंद्र के नियमों में पांच एकड़ जमीन की शर्त है. अगर किसी परिवार के पास पांच एकड़ जमीन है, तो वह EWS के दायरे से बाहर हो जाता है. लेकिन जैसलमेर और बाड़मेर के रेगिस्तानी इलाकों की पांच एकड़ जमीन की तुलना दिल्ली-एनसीआर या हरियाणा की पांच एकड़ जमीन से नहीं की जा सकती."
भाटी का कहना है कि EWS की पात्रता तय करते समय कृषि उत्पादकता, सिंचाई सुविधाएं, स्थानीय जमीन की कीमत और उसकी वास्तविक आर्थिक उपयोगिता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. उनका तर्क है कि राज्य और केंद्र के लिए अलग-अलग EWS प्रमाणपत्र की व्यवस्था खत्म होनी चाहिए, ताकि वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को इसका लाभ मिल सके.
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