- निर्मोही अखाड़े ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट के पुनर्गठन और मूल विग्रहों की पुनर्स्थापना की मांग SC में की है
- याचिका में ट्रस्ट के वित्तीय और संपत्ति लेनदेन की फोरेंसिक ऑडिट कराने और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की
- निर्मोही अखाड़े ने नए ट्रस्ट प्रतिनिधि चयन प्रक्रिया और मूर्ति स्थापना को परंपरागत नियमों के विपरीत बताया है
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. निर्मोही अखाड़े ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी है. इस याचिका में निर्मोही अखाड़े ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की है. साथ ही 1950 और 1982 से स्थापित मूल विग्रहों को पुनः स्थापित करने की मांग भी की गई है. निर्मोही अखाड़ा ने अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. खास बात ये है कि राम मंदिर मामले में SIT से जांच की मांग वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई होनी है.
अखाड़े ने ट्रस्ट को सार्वजनिक (पब्लिक) ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने, उसके सभी वित्तीय और संपत्ति संबंधी लेनदेन की फोरेंसिक ऑडिट कराने व गर्भगृह में नव-प्रतिष्ठित मूर्ति के स्थान पर साल 1950 और 1982 से स्थापित मूल विग्रहों को पुनः स्थापित करने की मांग की है.इसी मामले में नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर फैसला सुनाते हुए भगवान श्रीराम लला विराजमान के पक्ष में निर्णय दिया था और केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट गठित करने का निर्देश दिया था.
अखाड़े ने किए बड़े दावे
निर्मोही अखाड़े ने यह भी दावा किया है कि ट्रस्ट में उसके लिए निर्धारित एकमात्र प्रतिनिधि का चयन अखाड़े की परंपरा के अनुसार नहीं किया गया.आवेदन में कहा गया है कि महंत दिनेंद्र दास का नामांकन अखाड़े की स्वीकृत प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था. मूर्ति स्थापना के मुद्दे पर अखाड़े का कहना है कि मूल विग्रह के स्थान पर नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा से मुकदमे के मूल विषय में परिवर्तन हुआ है और यह ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र से परे है.
सुप्रीम कोर्ट से की गई कई बड़ी मांगें
इसलिए वर्ष 1950 और 1982 से संबंधित मूल विग्रहों को पुनः गर्भगृह में स्थापित करने का निर्देश दिया जाए. हालांकि, अखाड़े ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देना या उस पर पुनर्विचार कराना नहीं है. उसने केवल फैसले के क्रियान्वयन, ट्रस्ट की जवाबदेही और मंदिर प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर न्यायालय के निर्देश मांगे हैं.याचिका में यह भी मांग की गई है कि मंदिर में सभी पूजा, सेवा, भोग और धार्मिक अनुष्ठान रामानंदी संप्रदाय की परंपरा के अनुसार कराए जाएं.साथ ही ट्रस्टियों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं, निर्मोही अखाड़े को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए और यह जांचने के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए कि 2019 के फैसले का सही तरीके से पालन हुआ है या नहीं .यह आवेदन निर्मोही अखाड़े के सरपंच, लगभग 102 वर्षीय महंत राजारामचंद्राचार्य की ओर से वकील प्रतिभा जैन के माध्यम से दायर किया गया है.
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