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पंजाब में चुनाव से पहले क‍िसानों का आंदोलन, बीजेपी को एक बार फ‍िर शंभू बॉर्डर पर खींच लाए क‍िसान

चुनाव नज़दीक हैं, ऐसे में इस विरोध-प्रदर्शन में किसानों के मुद्दों को एक बार फिर पंजाब की राजनीतिक चर्चा का मुख्य विषय बनाने की क्षमता है.

पंजाब में चुनाव से पहले क‍िसानों का आंदोलन, बीजेपी को एक बार फ‍िर शंभू बॉर्डर पर खींच लाए क‍िसान

चंडीगढ़: पंजाब में व‍िधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के ल‍िए एक नई चुनौती सामने आती द‍िख रही है. 2020-21 के कृषि कानूनों के विरोध-प्रदर्शनों के असर से उबरने के लिए संघर्ष कर रही पार्टी को एक बार फ‍िर वैसी ही तस्वीरें देखने को मिल रही हैं. दरअसल, भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों ने आंदोलन शुरू कर द‍िया और शंभू बॉर्डर की ओर कूच कर द‍िया. बीजेपी के लिए यह राजनीतिक रूप से 'देजा वू' (यानी पहले भी ऐसा हो चुका है, ऐसा महसूस होना) जैसी असहज स्थिति है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल‍िया पंजाब दौरे से ऐसा लगा कि बीजेपी के लिए राज्य में राजनीति की नई शुरुआत हो सकती है. पंजाब में पार्टी 2020-21 के कृषि कानूनों के विरोध-प्रदर्शनों के असर से उबरने के लिए संघर्ष कर रही थी. पीएम मोदी के इस दौरे का मुख्य फोकस विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश पर था. पीएम का हरे रंग की पगड़ी पहनना- जो पंजाब के किसान समुदाय से गहराई से जुड़ा रंग है, ग्रामीण वोटरों तक पहुंचने की एक प्रतीकात्मक कोशिश के तौर पर भी देखा गया. इस मैसेज से लग रहा है क‍ि छह महीने बाद होने वाले व‍िधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी पंजाब की राजनीति को भावनात्मक मुद्दों से हटाकर विकास की ओर ले जाना चाहती है, लेक‍िन भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों के आंदोलन ने इस नैरेटिव को बाधित कर दिया है.

बीजेपी के ल‍िए 'देजा वू' जैसी स्‍थि‍ति‍

शंभू बॉर्डर पर हजारों किसानों के जमा होने और हरियाणा पुलिस द्वारा उन्हें दिल्ली की ओर बढ़ने से एक बार फिर रोके जाने के कारण पंजाब में वैसी ही तस्वीरें देखने को मिल रही हैं जैसी 2020-21 के कृषि कानूनों के विरोध और 2024 के किसान आंदोलन के दौरान दिखी थीं. बीजेपी के लिए यह राजनीतिक रूप से 'देजा वू' (यानी पहले भी ऐसा हो चुका है, ऐसा महसूस होना) जैसी असहज स्थिति है. इन दोनों स्थितियों में समानताएं सिर्फ बैरिकेड्स और विरोध-प्रदर्शन जैसे दृश्यों तक ही सीमित नहीं हैं. 

जब केंद्र सरकार ने 2020 में अध्यादेशों के जरिए तीन कृषि कानून पेश किए, तो बीजेपी ने बार-बार यह तर्क दिया कि किसानों ने इन सुधारों को गलत समझा है और विरोध करने से पहले उन्हें कानून को समझना चाहिए. वरिष्ठ नेताओं ने किसानों को भरोसा दिलाया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था जारी रहेगी और मंडियां खत्म नहीं की जाएंगी. इन आश्वासनों से पंजाब के किसान संतुष्ट नहीं हुए, जिसके परिणामस्वरूप आजाद भारत के सबसे बड़े विरोध-प्रदर्शनों में से एक हुआ और आखिरकार इन कानूनों को वापस लेना पड़ा. 

एक बार फ‍ि‍र छिड़ी बहस

भारत-अमेरिका के प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर भी अब इसी तरह की बहस छिड़ गई है. पंजाब बीजेपी के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने किसानों से अपील की है कि वे जल्दबाजी में कोई नतीजा न निकालें. उन्होंने कहा कि अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है और "किसानों और पशुपालकों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा." उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया है कि पंजाब के किसानों के हितों की रक्षा की जाएगी. 

क‍िसान संगठन सहमत नहीं

हालांक‍ि, किसान संगठन अभी भी सहमत नहीं हैं. उन्हें डर है कि कम इंपोर्ट ड्यूटी की वजह से भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाज़ार में आ सकते हैं, जिससे कीमतें गिर सकती हैं और किसानों की आमदनी पर बुरा असर पड़ सकता है. उनका तर्क है कि अगर समझौते के अंतिम रूप लेने तक इंतजार किया गया, तो किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए बहुत कम गुंजाइश बचेगी. यह मुद्दा तेजी से एक राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है. 

कांग्रेस ने शुरू क‍िया अभि‍यान


कांग्रेस ने प्रस्तावित व्यापार समझौते के खिलाफ एक अभियान शुरू किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इससे पंजाब के कृषि और डेयरी सेक्टर को नुकसान होगा. आम आदमी पार्टी ने इस प्रस्तावित समझौते को "किसानों के साथ सबसे बड़ा धोखा" बताया है और केंद्र से समझौते के ड्राफ्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है. शिरोमणि अकाली दल ने भी किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है और केंद्र पर कृषि समुदाय की चिंताओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है. 

चुनाव से पहले बीजेपी के ल‍िए मुश्‍क‍िल

बीजेपी के लिए यह समय इससे ज्‍यादा चुनौतीपूर्ण नहीं हो सकता था. पंजाब में विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी अपने पारंपरिक शहरी सपोटर्स आधार से आगे बढ़कर पंजाब के ग्रामीण इलाकों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है. पीएम मोदी के हालिया दौरे को इसी राजनीतिक पहुंच-बढ़ाने की कोशिश की शुरुआत के तौर पर देखा गया. हालांकि, पंजाब में किसानों का एक और आंदोलन शुरू होने से कृषि कानूनों के खिलाफ हुए उस आंदोलन की यादें फिर से ताजा हो सकती हैं, जिसने राज्य के किसान समुदाय के बीच बीजेपी की छवि को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया था. 

क‍िसानों का यह आंदोलन एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते को लेकर है. अगर यह आंदोलन जोर पकड़ता है तो यह विदेशी व्यापार समझौते के खिलाफ भारत का पहला बड़े पैमाने का किसान आंदोलन बन सकता है. इससे राजनीतिक दलों को वैश्विक व्यापार की महत्वाकांक्षाओं और घरेलू कृषि के हितों के बीच संतुलन बनाने पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. 

चुनाव नज़दीक हैं, ऐसे में इस विरोध-प्रदर्शन में किसानों के मुद्दों को एक बार फिर पंजाब की राजनीतिक चर्चा का मुख्य विषय बनाने की क्षमता है. बीजेपी, जो विकास और सुशासन के मुद्दों पर चुनाव लड़ना चाहती थी, उसके लिए शंभू बॉर्डर पर किसानों की वापसी एक ऐसे चैप्‍टर को फिर से खोल सकती है, जिसे बंद करने की कोशिश में उसने कई साल बिता दिए थे. 


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