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Explainer: क्यों पंजाब की राजनीति में कमजोर हैं प्रवासी, 33 लाख की आबादी के बाद भी नहीं डालते असर

एक बड़ी परेशानी प्रवासियों की यह भी है कि पंजाब में राजनीति पंजाबियत और सिख पहचान पर होती है. ये प्रवासी न तो पंजाबी कहलाते हैं और न ही सिख हैं.

Explainer: क्यों पंजाब की राजनीति में कमजोर हैं प्रवासी, 33 लाख की आबादी के बाद भी नहीं डालते असर
चंडीगढ़:

पंजाब की एक बड़ी आबादी भले ही कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में बसी है या जाने का सपना देखती है, लेकिन भारत के ही कई राज्यों के लोग वहां बसे हुए हैं. ऐसे करीब 33 लाख लोग यूपी, बिहार समेत कई राज्यों से हैं, जिनका पंजाब दूसरा घर जैसा है. ये लोग पंजाब में रोजी-रोटी कमाते हैं. कुछ लोग कमाकर लौटते हैं तो कुछ लोगों ने पंजाब में ही घर-मकान बना रखे हैं. दशकों से ये लोग पंजाब में हैं, फिर भी सूबे की राजनीति में उनका दखल न के समान है. पंजाब के चुनाव में प्रवासी कामगार या फिर अन्य लोग यहां मुद्दा नहीं बनते. 33 लाख लोग आखिर पंजाब की राजनीति में क्यों इतने कमजोर हैं, यह सोचने वाली बात है. 

फसलों की बुआई और कटाई के समय में बड़ी संख्या में पूर्वी यूपी और बिहार के लोग पंजाब पहुंचते हैं. फसली सीजन के बाद ये लोग लौटते हैं, लेकिन लाखों लोग ऐसे हैं, जो जालंधर, लुधियाना समेत कई शहरों के उद्योगों में काम करते हैं. पंजाब में 1971 में 4,000 प्रवासी ही थे, जो अब 33 लाख हो चुके हैं. इनमें से 70 फीसदी लोग उद्योगों में काम करते हैं, जबकि 30 पर्सेंट लोग ऐसे हैं, जो खेती के कामों में हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पंजाब की कुल आबादी में प्रवासियों की हिस्सेदारी 15 फीसदी तक है. इसके अलावा इनमें से 80 से 90 फीसदी यूपी और बिहार के हैं. 

पंजाब में जिन विधानसभा क्षेत्रों में प्रवासियों की अच्छी-खासी आबादी है. उनमें लुधियाना साउथ, लुधियाना ईस्ट, लुधियाना सेंट्रल, आतम नगर, साहनेवाल, जालंधर सेंट्रल, जालंधर नॉर्थ, जालंधर वेस्ट, फगवाड़ा, आदि शामिल हैं. इसके अलावा फतेहगढ़ जिले में भी इनकी अच्छी आबादी है. पर अहम सवाल यह है कि इतनी आबादी और कई विधानसभा क्षेत्रों के नतीजे बदलने का दम रखने के बाद भी पंजाब की राजनीति में इन प्रवासी वोटरों की चर्चा क्यों नहीं होती. जैसी चर्चा दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में होती है. दिलचस्प तथ्य यह है कि पंजाब में प्रवासी आबादी का कोई प्रतिनिधित्व विधानसभा में नहीं है. बिहार के इकलौते व्यक्ति कुंवर विजय प्रताप सिंह थे, जो पंजाब काडर के आईपीएस थे. वह अमृतसर नॉर्थ सीट से 'आप' से विधायक चुने गए थे. 

एकमात्र बिहारी, जो बने थे पंजाब में विधायक

वह मूल रूप से बिहार के गोपालगंज जिले के रहने वाले हैं. पंजाब में वह पुलिस में कई अहम पदों पर रहे थे. इससे पहले बसपा ने एक सीट नवांशहर की 2022 में जीती थी. इसके अलावा सपा भी कैंडिडेट उतारती रही है, लेकिन कभी सफलता नहीं मिली. इसके अलावा हिंदी पट्टी के जेडीयू, आरजेडी जैसे दल भी उतरे हैं, लेकिन सफलता नहीं पा सके. प्रवासियों को राजनीति में तवज्जो न मिलने की कई वजहें हैं. पहली वजह यह है कि प्रवासियों की आबादी कुछ निश्चित इलाकों तक ही सीमित है. इसके अलावा राजनीतिक दल भी उन्हें प्रवासी मजदूर से ज्यादा नहीं समझते. वे उनको यहां की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा ही नहीं मानते. उनकी पहचान अस्थायी प्रवासी के तौर पर है और वे वोटबैंक नहीं बन सके हैं. 

प्रवासियों की पहचान हिंदू और मुसलमान, पर पंजाबी से जुड़ाव नहीं

एक बड़ी परेशानी प्रवासियों की यह भी है कि पंजाब में राजनीति पंजाबियत और सिख पहचान पर होती है. ये प्रवासी न तो पंजाबी कहलाते हैं और न ही सिख हैं. ऐसे में पहचान की राजनीति में वे पिछड़ जाते हैं. इनकी पहचान हिंदू, मुस्लिम के तौर पर होती है, लेकिन सिख के रूप में नहीं. इसके अलावा अलग-अलग पेशों में लगे होने के चलते इनकी कोई एक संस्था भी नहीं है, जिसके जरिए वे ताकत दिखा सकें. इसके अलावा यदि ये प्रवासी अपने स्तर पर पहचान की राजनीति में शामिल होते हैं तो स्थानीय लोगों से बहिष्कृत होने का भी खतरा रहता है. यही कारण है कि इन लोगों को राजनीतिक दल उतना महत्व नहीं देते, जितनी इनकी आबादी है.   

भाषा की समझ और किसी संस्था का समर्थन न होना भी एक संकट

अब एक बात यह भी है कि पंजाब में भाषा का भी संकट है. प्रवासियों को सालों तक रहने के बाद भी पंजाबी भाषा उतनी समझ नहीं आती या बोल नहीं पाते, जितनी मूल पंजाबियों की है. ऐसे में उनके लिए पंजाब में अपनी पहुंच स्थापित करना आसान नहीं रहता. बरसों तक पंजाब में रहने के बाद भी वे पंजाब के नहीं हो पाते. स्थानीय प्रशासन के बारे में समझ का अभाव और किसी मातृ संस्था की कमी भी एक बड़ी वजह है. लेबर यूनियन कई बनी भी हैं तो मजदूरी के हालात में सुधार जैसी मांगें करती हैं, लेकिन उनकी हैसियत इतनी नहीं कि चुनावी राजनीति में कुछ दखल दे सकें. फिर रही-सही कसर बीते कुछ सालों में प्रवासी विरोधी लहर ने पूरी कर दी है. ग्रामीण इलाकों समेत कई क्षेत्रों में प्रवासियों के खिलाफ माहौल बना है. ऐसे में उनके लिए राजनीतिक दखल रखना और कठिन हो गया है.  

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