- पंजाब और हरियाणा के किसान सैटेलाइट निगरानी की सीमाओं को समझकर पराली जलाने के समय को चुन रहे हैं
- किसानों का मानना है कि सैटेलाइट हर समय क्षेत्र की निगरानी नहीं करता, बल्कि केवल निर्धारित समय में गुजरता है
- iFOREST ने फायर वॉच नामक मल्टी-सैटेलाइट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म विकसित किया है
करीब तीन दशक पहले भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान दुनिया को चौंका दिया था. उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम ने अमेरिकी जासूसी सैटेलाइटों की नजर से बचते हुए परमाणु परीक्षण की तैयारियां पूरी की थीं. अब एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पंजाब और हरियाणा के कुछ किसान भी सैटेलाइट निगरानी की सीमाओं को समझकर पराली जलाने के लिए वैसी ही रणनीति अपना रहे हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों को यह समझ आने लगा है कि सैटेलाइट हर समय किसी क्षेत्र को नहीं देखते. वे केवल निर्धारित समय पर किसी इलाके के ऊपर से गुजरते हैं. ऐसे में अगर पराली को उन निगरानी विंडो के बाहर जलाया जाए, खासकर शाम या रात के समय, तो कई घटनाएं सैटेलाइट रिकॉर्ड में नहीं आ पातीं.
यही वजह है कि पर्यावरण संस्था iFOREST ने 'फायर वॉच' नाम का नया मल्टी-सैटेलाइट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म डेवलेप किया है. संस्था के सीईओ डॉ. चंद्र भूषण के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था पराली जलाने की पूरी तस्वीर नहीं दिखाती क्योंकि यह सीमित संख्या में पोलर-ऑर्बिटिंग सैटेलाइट्स पर निर्भर है.
कलाम की रणनीति कैसे किसानों ने अपनाई?
मई 1998 में भारत ने राजस्थान के पोखरण में शक्ति श्रृंखला के पांच परमाणु परीक्षण किए थे. बाद में सामने आया कि भारतीय वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट ओवरपास के बीच मौजूद समय का उपयोग कर तैयारियां पूरी की थीं. उस समय यह समझा गया था कि अंतरिक्ष से निगरानी लगातार नहीं होती, बल्कि तय अंतराल पर होती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, खेतों में आग की निगरानी में भी कुछ ऐसी ही तकनीकी सीमाएं मौजूद हैं.
पराली निगरानी में कहां है चुनौती?
वर्तमान में खेतों में आग का पता लगाने के लिए मुख्य रूप से चार पोलर ऑर्बिटिंग सैटेलाइटों के डेटा का उपयोग किया जाता है. इनमें NASA के MODIS सेंसर और VIIRS सेंसर शामिल हैं. ये सैटेलाइट दिन के खास समय पर ही किसी क्षेत्र की तस्वीर लेते हैं
यही वजह है कि अगर आग सैटेलाइट के गुजरने के बाद लगाई जाए और जल्दी बुझ जाए, तो उसके रिकॉर्ड में आने की संभावना कम हो सकती है.
क्या सच में कम हुई हैं पराली की घटनाएं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2021 में जहां खेतों में आग लगने की करीब 80 हजार घटनाएं दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 तक यह संख्या घटकर लगभग 6 हजार रह गई.
एक्सपर्ट का मानना है कि इस कमी के पीछे सिर्फ सख्त कार्रवाई, मशीनरी सब्सिडी और जागरूकता अभियान ही नहीं, बल्कि किसानों की बदलती रणनीति भी एक कारण हो सकती है. कई किसान अब सैटेलाइट मॉनिटरिंग के समय और उसकी सीमाओं के बारे में पहले से ज्यादा जानकारी रखते हैं.
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