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ओडिशा के तीन सपूतों को पद्मश्री सम्मान; साहित्य, शिक्षा और कला में उत्कृष्ट योगदान का राष्ट्रीय गौरव

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा की तीन हस्तियों को साहित्य, शिक्षा और कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा. चरण हेम्ब्रम, सिमांचल पात्रो और शरत कुमार पात्रो को उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए सम्मानित किया गया.

ओडिशा के तीन सपूतों को पद्मश्री सम्मान; साहित्य, शिक्षा और कला में उत्कृष्ट योगदान का राष्ट्रीय गौरव

राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ओडिशा की तीन महान हस्तियों को उनके साहित्य, शिक्षा और कला के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया. यह सम्मान पूरे ओडिशा के लिए गर्व और गौरव का क्षण बन गया.

मयूरभंज के प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद् चरण हेम्ब्रम को संताली भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण तथा संवर्धन में उनके अमूल्य योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया. तीन दशकों से अधिक समय से वे संताली भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में समर्पित हैं. उन्होंने भाषा और साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए कई संस्थानों की स्थापना की तथा आदिवासी महिलाओं की पारंपरिक नृत्य संस्कृति को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उनके प्रयासों ने संताली साहित्य को नई पहचान दिलाई है.

वरिष्ठ लोकनाट्य गुरु सिमांचल पात्रो सम्मानित

गंजाम के वरिष्ठ लोकनाट्य गुरु सिमांचल पात्रो को ओडिशा की प्राचीन लोकनाट्य परंपरा ‘प्रह्लाद नाटक' को जीवित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए पद्मश्री सम्मान प्रदान किया. बचपन से ही लोककला के प्रति समर्पित पात्रो ने इस सदियों पुरानी कला को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. 35 रागों और लगभग 300 संगीत रचनाओं से समृद्ध इस लोकनाट्य परंपरा के संरक्षण के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए. कला के प्रति उनकी निष्ठा इतनी गहरी रही कि इसके संरक्षण हेतु उन्होंने अपनी निजी संपत्ति का बड़ा हिस्सा भी त्याग दिया.

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बंधा कलाकार शरत कुमार पात्रो का सम्मान

कटक जिले के तिगिरिया क्षेत्र के प्रसिद्ध बंधा कलाकार शरत कुमार पात्रो को उनकी अद्वितीय बुनाई कला के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया. उन्होंने भगवान जगन्नाथ को समर्पित ‘गीता गोविंद' के श्लोकों को बंधा साड़ियों पर बुनकर देशभर में विशेष पहचान बनाई. उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि 52 मीटर लंबी बंधा साड़ी पर संपूर्ण गीता गोविंद को उकेरना है, जो अत्यंत जटिल और श्रमसाध्य कार्य था. इस ऐतिहासिक कृति को पूरा करने में उन्हें लगभग सात वर्ष का समय लगा.

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इन तीनों विभूतियों की उपलब्धियों ने राष्ट्रीय स्तर पर ओडिशा का मान बढ़ाया है. उनका सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत साधना और समर्पण का सम्मान है, बल्कि ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक, साहित्यिक और कलात्मक विरासत का भी गौरवपूर्ण उत्सव है. यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए प्रेरित करेगा.

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