भारत का राष्ट्रीय ध्वज यानि तिरंगा केवल भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता का प्रतीक नहीं है. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था, गौरवपूर्ण इतिहास, राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक संबंध, नागरिक अधिकार और राजनीतिक विश्वास का भी प्रतिनिधित्व करता रहा है. हर भारतीय के लिए ये उसकी व्यक्तिगत मान्यताओं और आकांक्षाओं से भी ऊपर है, क्योंकि ये हमें उस बोध से जोड़ता है, जिसे हम भारत कहते हैं! वैसे तो पूरे देश में तिरंगा फहराना या उसे छतों पर लगाना एक सामान्य बात है, परंतु भारत का मुकुट माने जाने वाले केंद्र शासित राज्य जम्मू कश्मीर में इस तिरंगे को लेकर एक बहुत जटिल इतिहास रहा है. वर्ष 1947 में जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में विलय के बाद तिरंगा भारतीय संप्रभुता का राष्ट्रीय ध्वज रहा, लेकिन विशेष संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान और अलग राज्य ध्वज भी था. इसको लेकर देश में काफी विरोध भी हुआ. कई नेताओं ने आपत्ति भी जताई. यही संवैधानिक स्थिति स्वतंत्र भारत की शुरुआती राजनीतिक बहसों का बड़ा विषय बनी. इस विरोध के सबसे बड़े पुरोधा रहे भारतीय जन संघ के संस्थापक और नेहरू सरकार में मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी.
दो विधान, दो प्रधान, दो निशान का विरोध
भारत की स्वतंत्रता के समय जम्मू-कश्मीर सरकार के प्रमुख को प्रधानमंत्री और संवैधानिक प्रमुख को सदर-ए-रियासत कहा जाता था. राज्य में प्रवेश के लिए परमिट व्यवस्था भी थी. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण एकीकरण का प्रश्न प्रमुखता से उठाया. भारतीय जनसंघ और जम्मू की प्रजा परिषद के आंदोलन से जुड़ा संदेश था,'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे.'
मुखर्जी ने इस व्यवस्था को चुनौती दी. 11 मई 1953 को वह बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में दाखिल हुए, गिरफ्तार किए गए और 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में उनका निधन हो गया. उनके इसी बलिदान के चलते बाद के सालों में 'प्रधानमंत्री' और 'सदर-ए-रियासत' जैसे पदनाम बदल गए, हालांकि राज्य में शेष भारत से अलग संविधान और अलग राज्य ध्वज की व्यवस्था 2019 तक बनी रही. राज्य के अलगाववादियों और पाकिस्तान प्रेमियों के लिए ये उनकी आस्था का विषय बना रहा, इसे बाद में मोदी सरकार ने समाप्त किया. 90 के दशक में जब राज्य में आतंकवाद बढ़ा तो उनके निशाने पर सबसे ज्यादा भारत का तिरंगा रहा. तिरंगे को वो भारत को कश्मीर से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखते थे. यह स्थिति लंबे समय तक जारी रही.

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सुरक्षा घेरे में लहराता तिरंगा
आतंकवाद और अलगाववादी राजनीति के कठिन दशकों में कश्मीर में सार्वजनिक रूप से तिरंगा फहराना कई बार साहस और राष्ट्रीय दृढ़ता का कार्य बन गया. 2014 का स्वतंत्रता दिवस इसका उदाहरण था. उस साल श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तीन स्तरीय सुरक्षा घेरे के बीच तिरंगा फहराया था. इस कार्यक्रम की सीसीटीवी से निगरानी हो रही थी. आसपास की इमारतों पर पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के निशानेबाज तैनात थे. समारोह से पहले पंपोर और पुलवामा क्षेत्र में आतंकी घटनाएं हुई थीं. स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, लेकिन बैरिकेड, तलाशी और सुरक्षा की चिंता उसके चारों ओर दिखाई देती थी. आतंकवादियों का साफ संदेश था कि वो ध्वजारोहण को स्वीकार नहीं करेंगे. उस दौरान साधारण कश्मीरी के लिए तिरंगे के साथ दिख जाना अपनी जान को खतरे में डालने जैसा था. परंतु पांच साल के अंदर परिस्थितियों ने करवट ले ली!
पांच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक इतिहास में एक निर्णायक तिथि के रूप में याद किया जाएगा. इस दिन मोदी सरकार ने मुखर्जी के 'एक विधान,एक निशान और एक प्रधान' के सपने को साकार करते हुए अनुच्छेद 370 से जुड़ी व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए भारतीय संविधान के संपूर्ण प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू कर दिए और अलग संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त कर दिया. इसके साथ जम्मू-कश्मीर के अलग संविधान और अलग राज्य ध्वज का आधार भी खत्म हो गया. इसके बाद 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम प्रभावी हुआ और पूर्ववर्ती राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नामक दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया. इस प्रकार जो अलग संवैधानिक व्यवस्था सात दशकों तक विभिन्न रूपों में चली थी, उसका अंत हुआ. जिस 'दो विधान' और 'दो निशान' के प्रश्न को मुखर्जी ने 1950 के दशक में उठाया था, 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान और भारतीय तिरंगा ही संवैधानिक व्यवस्था के केंद्र में रह गए.
जम्मू कश्मीर में सुरक्षा, आतंकवाद और बदलता सामाजिक वातावरण
परिवर्तन केवल संविधान तक सीमित नहीं रहा. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार संगठित पथराव की घटनाएं 2018 की 1,328 से घटकर 2023 में शून्य हो गईं. अलगाववादियों की अपील पर होने वाली हड़तालें भी 52 से घटकर शून्य हुईं. आतंकवादियों द्वारा शुरू की गई घटनाएं इसी अवधि में 228 से घटकर 44 रह गईं. इन आंकड़ों का अर्थ आतंकवाद का पूर्ण अंत नहीं है. अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले में 26 नागरिकों की हत्या ने इसकी गंभीरता फिर दिखाई. लेकिन हमले के विरोध में कश्मीर घाटी में हुआ व्यापक बंद भी बदलाव का संकेत था. इस दौरान कश्मीर के लोग तिरंगा लेकर आतंकवाद का विरोध करने अपने घरों से निकले. जिस 'बंद' का इस्तेमाल कभी अलगाववादी राजनीति करती थी, इस बार वही निर्दोष नागरिकों की हत्या और आतंकवाद के विरोध का माध्यम बना.

अभी कुछ साल पहले तक श्रीनगर के मशहूर लाल चौक पर तिरंगा फहराना आसान काम नहीं माना जाता था. लेकिन लोग अब वहां भी तिरंगा फहराते हैं.
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तिरंगे की स्वीकार्यता के परिप्रेक्ष्य में अगस्त 2026 की तस्वीर 2014 से बिल्कुल अलग दिखाई देती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर 2022 में शुरू हुए 'हर घर तिरंगा' अभियान ने राष्ट्रीय ध्वज को सरकारी इमारतों से निकालकर सामान्य नागरिकों के घरों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस साल श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र से बॉटनिकल गार्डन तक निकाली गई तिरंगा यात्रा में 20 हजार से अधिक लोगों ने भाग लिया. इनमें सरकारी कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी, स्कूली बच्चे, एनसीसी कैडेट और स्थानीय नागरिक शामिल थे. डल झील पर शिकारा रैली हुई और सभी 20 जिलों में कार्यक्रम आयोजित किए गए. जिला प्रशासनों ने 14 लाख से अधिक राष्ट्रीय ध्वज मंगवाए. जहां एक ओर 2014 में प्रशासन एक अत्यधिक सुरक्षित स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस समारोह की रक्षा कर रहा था. वहीं 2026 में तिरंगा स्कूलों, बाजारों, गांवों, मोहल्लों, शिकारों और नागरिकों के घरों तक पहुंच चुका है.
श्रीनगर के लाल चौक पर कभी चुनौती और आतंकी धमकियों के बीच फहराया गया तिरंगा आज जनभागीदारी का प्रतीक बन चुका है. यह बदलाव केवल राष्ट्रीय ध्वज की बढ़ती दृश्यता की कहानी नहीं है, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारत की संवैधानिक और लोकतांत्रिक मुख्यधारा से मजबूत होते जुड़ाव की भी कहानी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की जम्मू-कश्मीर को संवैधानिक रूप से पूरी तरह एकीकृत करने की नीति का सबसे शक्तिशाली प्रतीक शायद यही है. तिरंगा अब केवल सरकारी इमारत पर फहराया जाने वाला राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि बदलते जम्मू-कश्मीर में भारत के साथ विश्वास, भागीदारी और साझा भविष्य की अभिव्यक्ति बन रहा है.
(डिस्क्लेमर: लेखक थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से समाजशास्त्र में स्नातक (ऑनर्स) किया है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )