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विदेशी टूरिस्ट ने संतरे का दाम पूछा, इस एक सवाल ने अनपढ़ फलवाले को दिला दिया 'पद्मश्री'

Harekala Hajabba Success Story: हजब्बा ने उस दिन फैसला कर लिया था कि जो उनके साथ हुआ है वो अब किसी और के साथ नहीं होने देंगे. इसी का नतीजा है कि आज उनके द्वारा बनाए स्कूल में सैकड़ों बच्चे शिक्षा ले रहे हैं.

विदेशी टूरिस्ट ने संतरे का दाम पूछा, इस एक सवाल ने अनपढ़ फलवाले को दिला दिया 'पद्मश्री'

संतरे का भाव पूछने वाले एक छोटे से सवाल में कितनी ताकत हो सकती है? इतनी, कि वो एक गरीब फल बेचने वाले को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' तक पहुंचा दे. कहानी फिल् लगती है, लेकिन ये 100% सच है. ये दास्तान है कर्नाटक के हरेकला हजब्बा जी की.

साल 1956. कर्नाटक का एक छोटा सा गांव, हरेकला, जहां हजब्बा का जन्म हुआ. गरीबी इतनी कि दो वक्त की रोटी के लाले पड़े रहते थे, ऐसे में स्कूल का मुंह देखना तो बहुत दूर की कौड़ी थी. वक्त बीता और परिवार का पेट पालने के लिए 1977 से उन्होंने मंगलुरु के बस स्टैंड पर संतरे बेचना शुरू कर दिया. दिन भर धूप-छांट में गला फाड़ने के बाद भी जेब में बमुश्किल 150 रुपये आते थे. जिंदगी बस किसी तरह कट रही थी कि तभी 1990 में एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने हज्जब्बा के सीने में एक आग सुलगा दी.

विदेशी टूरिस्ट के उस सवाल ने अंदर तक तोड़ दिया

हुआ यूं कि उनकी रेहड़ी के पास एक विदेशी टूरिस्ट आया. उसने फर्राटेदार अंग्रेजी में संतरे का दाम पूछा. हजब्बा सन्न रह गए. न तो उन्हें वो विदेशी भाषा समझ आई और न ही वो कुछ जवाब दे पाए. उस एक पल की बेबसी और अनपढ़ होने की टीस ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया.

खुद से किया वादा- जो मेरे साथ हुआ, किसी के साथ नहीं होगा

उसी दिन बस स्टैंड की उस भीड़ में खड़े होकर इस फल वाले ने खुद से एक वादा किया- 'मेरे गांव का कोई भी बच्चा मेरी तरह अनपढ़ नहीं रहेगा, मेरी तरह उसे कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा.' लेकिन कहते हैं ना, कोई भी बड़ा काम बिना कड़े इम्तिहान के पूरा नहीं होता. जब उन्होंने स्कूल बनाने की बात कही, तो लोग हंसने लगे. ताने कसे गए कि 'जो खुद कभी स्कूल की सीढ़ियां नहीं चढ़ा, वो स्कूल बनवाएगा.' घर में भी भारी बगावत हुई, क्योंकि जहां रोज का पेट पालना मुश्किल हो, वहां स्कूल का सपना देखना किसी पागलपन से कम नहीं था. 

Orange Seller to Padma Shri: The Inspiring Story of Harekala Hajabba

कमाई की पाई-पाई स्कूल के नाम

बेंगलुरु से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर उनके गांव न्यू पहाड़पुर में उस वक्त एक भी स्कूल नहीं था. हजब्बा ने अपनी फल की दुकान से बचाई गई पाई-पाई जोड़नी शुरू की. बिना किसी सरकारी मदद के, उन्होंने एक स्थानीय मदरसे में सिर्फ 28 बच्चों के साथ स्कूल की शुरुआत कर दी. धीरे-धीरे बच्चे बढ़े, तो जगह कम पड़ने लगी. हजब्बा ने अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी, यहां तक कि कर्ज भी लिया, ताकि बच्चों के लिए एक पक्की इमारत बन सके. 

एक अखबार ने जब इस 'अनपढ़ मास्टरजी' की लगन की खबर छापी, तो जैसे कारवां जुड़ता चला गया. सरकार ने एक लाख रुपये की मदद की, आम लोगों ने भी हाथ बढ़ाया. और आज, उसी फल वाले की बदौलत गांव में प्राइमरी से लेकर माध्यमिक तक का स्कूल शान से खड़ा है. उनकी सालों की वो मेहनत आज एक विशाल हायर सेकेंडरी स्कूल में बदल चुकी है, जहां हर साल सैकड़ों बच्चे अपना भविष्य संवार रहे हैं. 

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नंगे पांव पहुंचे राष्ट्रपति भवन

आज लोग उन्हें बड़े ही आदर से 'अक्षर संत' कहते हैं. उनकी इसी निस्वार्थ तपस्या के आगे साल 2020 में पूरा देश नतमस्तक हुआ. तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी ने जब उन्हें पद्मश्री से नवाजा, तो वो नजारा हर हिंदुस्तानी की आंखों में नमी ले आया. एक सफेद धोती पहने और बिल्कुल नंगे पांव जब हजब्बा राष्ट्रपति भवन के उस मंच पर पहुंचे, तो पूरा देश उनके सम्मान में अपनी जगह पर खड़ा हो गया. तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी.  

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ये कहानी हमें सिखाती है कि जिस इंसान के नसीब में कभी स्कूल की दहलीज लांघना नहीं लिखा था, उसी इंसान ने हजारों बच्चों के लिए ज्ञान के दरवाजे खोल दिए. कुछ लोग अपनी किस्मत बदलते हैं, लेकिन हरेकला हजब्बा ने तो पूरी की पूरी एक पीढ़ी का मुकद्दर ही बदल डाला."

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