विज्ञापन

साइकिल से 140 साल पहले शुरू हुई डाबर कंपनी, गांव-गांव दवा बेचने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर की कामयाबी की कहानी

Dabur Success Story: डाबर कंपनी का इतिहास 140 साल पुराना है. कभी साइकिल से आयुर्वेदिक दवाएं बेचने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो आज हजारों करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनी में बदल चुका है.

साइकिल से 140 साल पहले शुरू हुई डाबर कंपनी, गांव-गांव दवा बेचने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर की कामयाबी की कहानी
Dabur Success Story
  • डाबर कैसे 140 साल में घर-घर दवा बेचने वाली कंपनी से आज हजारों करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनी बनी
  • कभी आयुर्वेदिक डॉक्टर बर्मन घर-घर जाकर साइकिल से दवाएं बेचते थे और उन्होंने ग्रामीणों का भरोसा जीता
  • डाबर की कंपनी कैसे बंगाल से दिल्ली पहुंची, जानिए पूरी दिलचस्प कहानी
नई दिल्ली:

खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी करने वाली स्वास्थ्य एजेंसी FSSAI डाबर को अपने कुछ उत्पादों जैसे डाबर हनी पर 100% शुद्ध या 100 फीसदी नेचुरल जैसे दावों से बचने की सलाह दी है. कंपनी को ऐसे बढ़-चढ़कर दावों से परहेज करने की सलाह दी गई है. इस खबर ने 140 साल पुरानी कंपनी डाबर को फिर सुर्खियों में ला दिया है. वो डाबर कंपनी जो 140 साल पहले एक साइकिल से दवाओं की बिक्री से शुरू हुई और आज के पॉपुलर ब्रांड में से एक है.

घर-घर जाकर साइकिल से बेची दवा

ये कहानी अंग्रेजी हुकूमत के दौरान 1884 के आसपास की है, जब देश में हैजा, मलेरिया, प्लेन, कालरा जैसी महामारियों से हजारों मौतें हो रही थीं. अस्पताल काफी कम थे और दवाइयों की किल्लत थी.तब कोलकाता में आयुर्वेदिक डॉक्टर एसके बर्मन जड़ी-बूटियों में शोध किया. वो साइकिल से घर-घर जाकर गांवों में मरीजों को कम कीमत पर आयुर्वेदिक दवाई बेचने लगा. ग्रामीणों का उन पर भरोसा कायम हुआ तो फिर उन्होंने आयुर्वेदिक दवा कंपनी खोलने की ठानी. बंगाल में लोग डॉ. बर्मन को प्यार से डाकतार (डॉक्टर) कहते थे. ऐसे में डाकतार (Daktar) और बर्मन (Burman) का जोड़कर डाबर (Dabur) शब्द चुना गया. गांव-गांव से ये नाम शहरों तक फेमस हो गया.

डाबर की कामयाबी की कहानी

डाबर की कामयाबी की असली कहानी 1919 से 1940 के बीच हुई. दवाओं की मांग बढ़ने के साथ हाथों से बनीं मांग पूरी नहीं कर सकीं. वर्ष 1919 में डॉ. बर्मन के बेटे सीएल बर्मन ने फैक्ट्री और लैब की स्थापना की.सीएल बर्मन ने तय किया कि आयुर्वेदिक फार्मूलों की शुद्धता के लिए उत्पादन में स्वचालित मशीनों का इस्तेमाल किया जाए. 1940 के दशक में डाबर आंवला हेयर ऑयल लॉन्च किया गया. फिर बीमारियों से लड़ने वाली दवाओं के नेटवर्क से आगे जाकर सौंदर्य उत्पादों में दायरा बढ़ाया गया.

कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट हुआ सेंटर 

बंगाल में राजनीतिक उथलपुथल, मजदूरों की हड़ताल और नक्सलवादी आंदोलन के बीच डाबर ने भी दिल्ली का रुख किया. कारखानों में हड़तालों के बीच, डाबर, बिड़ला जैसे तमाम कारोबारी घरानों ने अपना कारोबार बंगाल से बाहर लाने का फैसला किया. बर्मन परिवार ने 1972 में हेड ऑफिस कोलकाता से नई दिल्ली लाने का फैसला लिया। दिल्ली आने से डाबर को यूपी, पंजाब, हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत के बाजार में धमाकेदार एंट्री मिली.

ये भी पढ़ें - डेनमार्क की महिला ने पहली बार किया भारतीय स्लीपर ट्रेन में सफर, बोलीं- 'ये एक्सपीरियंस जिंदगी भर याद रहेगा'

डाबर एफएमसीजी कंपनी

डाबर आयुर्वेदिक दवा कंपनी से बदलकर 1980 के दशक में एफएमसीजी ब्रांड बन गई. डाबर च्यवनप्राश, टूथपेस्ट, पुदीन हरा, डाबर लाल तेल और डाबर हनी जैसे उत्पाद पॉपुलर हुए. काला नमक, जीरा और जड़ी-बूटियों से बने हाजमोला भी खूब चला. डाबर ने खाड़ी देशों, अफ्रीका, दक्षिण एशिया, यूरोप और अमेरिका में कदम रखा.

ये भी पढ़ें - हर रात इंसान के बिस्तर पर सोती थी बाघिन, परिवार ने बेटी माना, दूध का कर्ज चुकाने के लिए दे दी जान

ये भी पढ़ें - प्रफुल्ल चंद्र राय: जिसे 'पागल वैज्ञानिक' कहा, उसने 700 रुपये में देश की पहली दवा कंपनी खोली, घर-घर दवाएं बेचीं, सारी दौलत दान की

 

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
DABUR, Dabur 100% Products Ban, Dabur Success Story, FSSAI, Dabur Family
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com