नेटफिलिक्स पर एक सीरीज आई है 'ऑपरेशन सफेद सागर'. इस सीरीज में कारगिल युद्ध की कहानी है. सीरीज में दिखाया गया है कि पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल मुशर्रफ ने कारगिल में घुसपैठ की योजना बनाई. ये साजिश तब की गई जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के प्रयास कर रहे थे. सबसे अहम बात यह थी की मुशर्रफ ने अपनी नापाक चाल के बारे में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को तक नहीं बताया. उन्हें कई दिनों तक अंधेरे में रखा गया. लेकिन सीरीज में दिखाई गई इस कहानी की असली कहानी क्या थी? आइए बताते हैं.
साल था 1999. भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में नई शुरुआत की उम्मीद जगी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दोस्ती का संदेश लेकर बस से लाहौर पहुंचे थे. दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ाने की कोशिशें चल रही थीं, लेकिन इसी दौरान पाकिस्तान की सेना कारगिल में एक बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रही थी.
एक तरफ लाहौर यात्रा, दूसरी तरफ कारगिल की साजिश
फरवरी 1999 में वाजपेयी की ऐतिहासिक लाहौर यात्रा के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती और विश्वास का माहौल बनाने की कोशिश हो रही थी. लेकिन इसी समय पाकिस्तानी सेना कारगिल सेक्टर में घुसपैठ की योजना को अंतिम रूप दे रही थी. इस नापाक हरकत का मास्टरमाइंड तत्कालीन पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ था. मुशर्रफ ने सेना के कुछ और अधिकारियों के अपने प्लान में शामिल किया. लेकिन इस भनक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सरकार को नहीं थी.
साल 2000 में भारत सरकार की 'कारगिल रिव्यू कमेटी रिपोर्ट' और खुद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की आत्मकथा में दर्ज दस्तावेज गवाही देते हैं कि पाकिस्तानी सेना ने इस ऑपरेशन को बेहद गोपनीय रखा था. वहीं 28 मई 2024 को खुद नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में एक भाषण के दौरान कबूला कि लाहौर समझौते को तोड़ना पाकिस्तान की ही सबसे बड़ी भूल थी.
मुशर्रफ की 'गुप्त टीम' और नवाज शरीफ
परवेज मुशर्रफ और कुछ अन्य पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों ने कारगिल ऑपरेशन को बेहद गोपनीय तरीके से आगे बढ़ाया. उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इसकी पूरी जानकारी नहीं थी. उन्हें केवल यह बताया गया था कि LoC के आसपास सैन्य गतिविधियां बढ़ाई जा रही हैं. उन्हें भारतीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर घुसपैठ और कब्जे की पूरी योजना की जानकारी नहीं दी गई थी.
वाजपेयी का फोन और नवाज शरीफ की हैरानी
मई 1999 में जब भारतीय सेना को कारगिल की ऊंची चोटियों पर पाकिस्तानी घुसपैठ का पता चला, तो हालात तेजी से बदले. इसी दौरान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से फोन पर बात की. वाजपेयी ने सवाल उठाया कि एक तरफ दोनों देश शांति और दोस्ती की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी सैनिक भारतीय क्षेत्र में क्या कर रहे हैं.
पत्रकार और लेखिका नसीम जहरा की किताब 'From Kargil to the Coup' के अनुसार, जून 1999 की शुरुआत में वाजपेयी ने नवाज शरीफ को फोन किया था. बातचीत के दौरान वाजपेयी जी ने अचानक फोन की लाइन पर मौजूद प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार को सौंप दिया था. दिलीप कुमार ने शरीफ से कहा था, 'मियां साहब, हमें आपसे इसकी उम्मीद नहीं थी, आप तो हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच अमन के पैरोकार रहे हैं.' इस घटना को नवाज शरीफ ने खुद बाद में कई बार ऑन-रिकॉर्ड स्वीकार किया है.
इस बातचीत के दौरान नवाज शरीफ को स्थिति की गंभीरता का पूरी तरह एहसास हुआ. यही वजह है कि बाद के सालों में कारगिल को लेकर पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच मतभेद खुलकर सामने आए.
कारगिल युद्ध और ऑपरेशन सफेद सागर
कारगिल में पाकिस्तानी सैनिक और घुसपैठिए ऊंची पहाड़ियों पर बैठे थे, जिससे भारतीय सेना के लिए चुनौती और बढ़ गई थी. इसके बाद भारतीय वायुसेना ने 'ऑपरेशन सफेद सागर' शुरू किया. मिग-21, मिग-27, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करते हुए भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले किए. यह दुनिया के सबसे कठिन हाई-एल्टीट्यूड एयर ऑपरेशनों में से एक माना जाता है. पहाड़ों पर बैठे घुसपैठियों के खिलाफ वायु शक्ति के इस्तेमाल ने युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
नवाज शरीफ का बाद का कबूलनामा
बाद में नवाज शरीफ ने कारगिल को पाकिस्तान की एक बड़ी रणनीतिक गलती बताया. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस संघर्ष ने लाहौर घोषणा की भावना को नुकसान पहुंचाया और दोनों देशों के बीच बने भरोसे को तोड़ दिया.
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