देश आजाद होने वाला था... उन आखिरी 48 घंटों में महात्मा गांधी ने क्या लिखा, क्या कहा?

जब हिंदुस्तान स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था तो दूसरी तरफ गांधी लोगों को शांति, संयम और इंसानियत का संदेश दे रहे थे.

देश आजाद होने वाला था... उन आखिरी 48 घंटों में महात्मा गांधी ने क्या लिखा, क्या कहा?
महात्मा गांधी

15 अगस्त 1947... आजाद भारत की नींव की तारीख जिसका इंतजार हिंदुस्तान सदियों से कर रहा था. बस कुछ पल में गुलामी की जंजीरे टूटने वाली थीं, लाल किले पर तिरंगा फहराने की तैयारी पूरी हो चुकी थी और सत्ता के हस्तांतरण की आखिरी रस्में बंद कमरों में संपन्न हो रही थीं. लेकिन इस संघर्ष एक सबसे अहम स्तंभ- बाबू दिल्ली से कहीं दूर थे, जश्न से पूरी तरह नदारद. उन्हें तो देश के बंटवारे और सांप्रदायिक हिंसा की ज्यादा चिंता थी.

देखा जाए तो आजादी से ठीक पहले के ये आखिरी 48 घंटे गांधी के जीवन के सबसे कठिन दिन रहे. जिन हिंदू-मुस्लिमों एक सूत्र में पिरोने के प्रयास उन्होंने किए थे, बंटवारे के दंश ने उन्हें खून का प्यासा बना दिया था. इसी वजह से जब हिंदुस्तान स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था तो दूसरी तरफ गांधी लोगों को शांति, संयम और इंसानियत का संदेश दे रहे थे. आज आपको बताते हैं उन 48 घंटों की कहानी, आखिर गांधी कहां थे, गांधी क्या कह रहे थे, गांधी ने कौन-कौन सी चिट्ठियां लिखी थीं. इन्हीं सवालों के जवाब हमें समझा पाएंगे कि आखिर आजादी के उस क्षण को गांधी ने किस नजर से देखा था.

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कलकत्ता, 14 अगस्त 1947

प्रिय सुशीला,

मुझे तुम्हारी चिट्ठी मिली, लेकिन उसका जवाब देने के लिए बिल्कुल समय नहीं मिल पाया. मैं यह पत्र सुबह की प्रार्थना के बाद लिख रहा हूं. यहां मेरी काफी कड़ी परीक्षा चल रही है. जाना तो मुझे नोआखाली था, लेकिन अभी यहीं पर अटका हुआ हूं. कल मैं यहां एक मुस्लिम शख्स के घर में रहने के लिए आया था. लेकिन केवल इस एक तथ्य से तुम्हें यहां की स्थिति का अंदाजा नहीं मिल पाएगा. सच कहूं तो मेरे पास अधिक लिखने का समय भी नहीं है.

सुशीला तुम बेवजह बातों को दिल पर ले रही हो. मणिलाल ( सुशीला के पति) का पत्र इतना स्पष्ट और निश्छल है. उसने उस चिट्ठी में सिर्फ अपने दिल की बात कही है. पिछले पत्र से तुमने जो निष्कर्ष निकाला, तुम्हें निकालने का पूरा अधिकार था. अपनी इच्छा के बावजूद उसे तुम्हारे अकोला में रुके रहने पर कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन मैं जानता हूं उस पत्र में उसने अपने मन की पूरी बात नहीं लिखी थी. अब तुम्हें जल्द से जल्द उसके पास चले जाना चाहिए.

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सीता के लिए जो किस्मत में लिखा है, उसे वो जरूर पाएगी. मैं नहीं जानता कि मैं क्या कर पाऊंगा. इस बार मेरी ट्रेन बनारस से होकर गुजरी. लेकिन चार घंटे देर हो चुकी थी और सीता रात के उस समय स्टेशन नहीं आ सकती थी. लेकिन मुझे सच में लगता है कि इस मामले में तुम अच्छे से विचार कर खुद फैसला लो. मेरे पास आकर मुझसे मिलने का कोई फायदा नहीं होने वाला है. राम को ही पता है कि मैं कल कहां रहूंगा. लगता है कि मैं यहीं रहूंगा. लेकिन अगर मैं यहां नहीं रहा तो तुम कहां भटकती रहोगी?

अगर तुम्हें लगे कि किसी बड़े-बुजुर्ग की सलाह चाहिए तो किशोरलाल यहां हैं. उनकी सलाह मानकर तुम्हें फायदा ही होगा. अगर वैसे कई मामलों में हमाचे विचार अलग भी हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हर व्यक्ति अलग तरह से सोचता है. हो सकता है कि इस मामले में हम दोनों एक जैसा सोचते हों. लेकिन तुम इस बारे में ज्यादा मत सोचो. तुम्हें वही करना चाहिए जो तुम्हें सही लगे.

आशीर्वाद सहित
बापू

सोर्स: गुजराती प्रति से: C. W. 1426. सौजन्य: सुशीला गांधी

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14 अगस्त 1947- प्रदर्शनकारियों से गांधी की बात

बेलियाघाटा में सुहरावर्दी और मेरी ओर से मिलकर उठाया गया कदम सिर्फ शुरुआत मात्र है. अगर बेलियाघाटा के हिंदू सच में अपने मुस्लिम पड़ोसियों को वापस बुलाने का काम करते हैं तो अगला कदम ऐसे इलाके में उठाना चाहिए, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं. वहां के मुसलमान भी हिंदुओं को उनके घरों में लौटने के लिए आमंत्रित करें. ये सिलसिला रुकना नहीं चाहिए, हर समुदाय अपने उन पड़ोसियों को वापस बुलाए, जो मजबूरी में अपना घर छोड़ चला गया था.

सोर्स: किताब- महात्मा गांधी: द लास्ट फेज, पार्ट दो, पेज 367-8

14 अगस्त 1947- प्रार्थना सभा में गांधी (कलकत्ता)

कल का दिन विदेशी शासन से मुक्ति का दिन है. इसलिए सही में यह एक बहुत बड़ा दिन है और हमें इसे मनाना चाहिए. लेकिन मेरे लिए यह केवल खुशी का दिन नहीं हो सका है. कल से दोनों नए डोमिनियनों को एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठानी पड़ेगी.

मैं अपील करता हूं कि हर व्यक्ति भारत के कल्याण के लिए पूरे 24 घंटे उपवास और प्रार्थना करे. दिन के दौरान जितना संभव हो, चरखा चलाएं. चरखे ने गरीब और अमीर को एक सूत्र में बांधने का काम किया है और उन अनगिनत स्त्री-पुरुषों को रोजगार दिया है जो नौकरी की तलाश में थे.

मैंने नोआखली जाने का अपना दौरा इसलिए टाल दिया क्योंकि शहीद साहब मुझसे मिलने आ गए थे. उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं यहीं रुकूं और जलते हुए कलकत्ता में शांति स्थापित में उनकी सहायता कर सकूं. उनके आग्रह का मुझ पर असर हुआ. मैंने उनसे सिर्फ इतना कहा कि अगर वे मेरे साथ प्रभावित इलाकों में चलें और वहां मेरे साथ रहें तो मैं यहां रुक सकता हूं.

हमारा मकसद अब एक ही है- दोनों समुदायों के बीच दोस्ती और भरोसा वापस कायम किया जाए. इस काम में हमारे मन में एक-दूसरे के लिए कोई संकोच नहीं होना चाहिए और न ही कोई बात एक-दूसरे से छिपानी चाहिए.

शहीद साहब को मेरे साथ आने के लिए कई धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे उनसे प्रभावित नहीं हुए. वे मेरे शब्द को स्वीकार करने के लिए उतने ही तैयार थे, जितनी मैंने उनसे आशा रखी थी.

आप लोगों को यह सोचने की जरूरत नहीं है कि हमने कलकत्ता के उन इलाकों को नजरअंदाज कर दिया है, जहां हिंदू रहते हैं और जिन पर मुसलमानों का कब्जा है. हम पूरे कलकत्ता में शांति स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि आप हम पर विश्वास करें. मुझे पूरा विश्वास है अगर कलकत्ता में फिर से विवेक और सच्ची दोस्ती स्थापित हो गई तो नोआखली और पूर्वी भारत के बाकी हिस्से भी सुरक्षित हो जाएंगे.

शहीद साहब यहां प्रार्थना सभा में हमारे साथ मौजूद हैं, लेकिन मेरे कहने की वजह से सभा से दूर रहे. मैं नहीं चाहता था कि बैठक में उनके खिलाफ नाराजगी पैदा हो. हालांकि, मुझे इस बात की खुशी है कि यहां मौजूद लोगों ने सहनशीलता दिखाई है. इससे मुझे शहीद साहब को अपने साथ इस कठिन काम में शामिल करने का साहस मिल गया है. अब हमें साथ मिलकर, खुलेपन और पूर्ण सहयोग के साथ काम करना होगा.

सोर्स: हरिजन

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15 अगस्त 1947, लंदन में रहने वाली दोस्त अगाथा हैरिसन को पत्र

प्रिय अगाथा,

मैं यह चिट्ठी चरखा चलाते हुए लिखवा रहा हूं. तुम जानती हो कि आज जैसे किसी बड़े अवसर को मनाने का मेरा तरीका क्या रहता है- एक तो भगवान का धन्यवाद अदा करना और दूसरा प्रार्थना करना. इस प्रार्थना के साथ उपवास भी करना चाहिए, भले ही फलों का रस लेना भी उपवास ही क्यों न माना जाए. इसके बाद गरीबों के प्रति अपना समर्पण जताने के लिए चरखा कातना जरूरी है. इसलिए मैं रोज जितना चरखा कातता हूं, उससे आज संतुष्ट नहीं हो सकता. आज मुझे अपनी दूसरी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए भी जितना संभव हो, उतना ज्यादा चरखा चलाना है.

तुम्हारा पहला पत्र मुझे अमृत के हाथों करीब सुबह चार बजे मिला था. तुम्हारा दूसरा पत्र भी मुझे उसी के जरिए मिला है. इसे राजाजी लेकर आए हैं, जो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं. राजाजी खुद तो यहां नहीं आ सकते थे. गवर्नमेंट हाउस के चारों तरफ प्रशंसकों की हुजूम है. हालात ऐसे हैं, वे अपने ही घर में एक तरह से कैदी बन चुके हैं.

वैसे तुमने अपने पत्र में विंटरटन के भाषण का जिक्र किया है. तुम्हें हैरानी होगी कि मैंने वो भाषण पढ़ा ही नहीं है. स्वतंत्रता विधेयक पर हुई बहस के दौरान दिए गए भाषण भी मैं खुद नहीं पढ़ सका. मुझे अखबार पढ़ने का समय भी शायद ही मिल पाता है. कभी-कभी कोई मुझे अखबार का कुछ हिस्सा पढ़कर सुना देता है या फिर मैं अपने खाली पलों में पढ़ने की कोशिश करता हूं.

लेकिन खुद सोचो इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरे पक्ष में कौन बोल रहा है या मेरे खिलाफ कौन है? अगर मैं खुद भीतर से सही हूं तो बाकी बातों के क्या मायने रह जाएंगे. आखिर तुम्हें और मुझे अपना कर्तव्य उसी तरह निभाते रहना है, जैसा हम सबसे अच्छा समझते हैं, और मुस्कुराते रहना है. तुम अखबारों की बातें छोड़ो. मैं अपना चरखा चला रहा हूं, इसलिए अब मुझे दूसरी चीजों के बारे में सोचना है.

प्यार,
बापू

सोर्स: किताब- महात्मा गांधी: द लास्ट फेज, पार्ट दो, पेज 372

15 अगस्त 1947- रामेंद्र जी सिन्हा को गांधी का पत्र

प्रिय मित्र,

मुझे तुम्हारी कही हुई बात पर भरोसा है. जैसा तुम कह रहे हो तुम्हारे पिता अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए भी बहादुर व्यक्ति थे. ऐसा व्यक्ति कभी मरता नहीं है. उसके शरीर का नष्ट होना उसके लिए कोई मायने नहीं रखता.

इसलिए कहता हूं, तुम्हारे लिए, तुम्हारी मां के लिए या किसी और के लिए उसकी याद में रोना सही नहीं है.  जाते-जाते वे तुम्हारे लिए एक बहुत बड़ी विरासत छोड़ गए हैं. मुझे उम्मीद है कि तुम सभी उस विरासत के योग्य साबित होगे.

मैं तुम्हें यही सलाह दे सकता हूं कि आज हमें जो आजादी मिली है, उसे मजबूत बनाने के लिए तुम सभी वो सब करना जो जो तुम्हारी क्षमता में हो.  इसके लिए सबसे पहला काम यही है कि तुम अपने पिता की बहादुरी को अपने जीवन में उतारो.

जरूरी नहीं कि कोई व्यक्ति किसी हत्यारे के हाथों मारा जाए, तभी उसकी अहिंसा और बहादुरी सिद्ध होगी. तुम अपने दुख को ईमानदार काम को समर्पित कर दो, यही आजादी को बचाए रखने में तुम्हारा सच्चा योगदान होगा.

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15 अगस्त 1947- बंगाल के मंत्रियों को सुझाव

आज से तुम सभी कांटों का ताज पहन रहे हो. चाहे कुछ भी हो जाए,  लगातार सत्य और अहिंसा का पालन करने का प्रयास करना है. धैर्य हमेशा बनाए रखना.

ब्रिटिश शासन ने निस्संदेह तुम्हारी परीक्षा ली है, लेकिन अब तुम्हारी परीक्षा होने वाली है. सत्ता से सावधान रहना, याद रखो सत्ता भ्रष्ट कर सकती है. उसकी चमक-दमक और दिखावे से खुद को प्रभावित मत होने देना. तुम पद पर इसलिए हो क्योंकि तुम्हें भारत के गांवों गरीबों की सेवा करनी है.

ईश्वर तुम्हारी मदद करे.

सोर्स: किताब- महात्मा गांधी: द लास्ट फेज, पार्ट दो, पेज 370

15 अगस्त 1947- सी. राजगोपालाचारी से क्या बोले गांधी

आज प्रांत के नए राज्यपाल सी. राजगोपालाचारी मुझसे मुलाकात करने आए. उन्होंने उस ‘चमत्कार' के लिए मुझे बधाई दी, जो मैंने किया था. लेकिन मैंने साफ कहा कि मैं तब तक संतुष्ट नहीं हो सकता जब तक हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के साथ फिर से सुरक्षित महसूस न करने लगें और सभी सुरक्षित अपने घर ना लौट जाएं.

अगर लोगों के दिलों में यह बदलाव नहीं आता, तो आज कितना भी उत्साह क्यों ना दिख जाए, भविष्य में हालात फिर बिगड़ने की आशंका बनी रहेगी.

सोर्स: My Days with Gandhi, पेज नंबर- 265

15 अगस्त 1947- कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों से गांधी क्या बोले

राजनीतिक कार्यकर्ताओं को चाहे वे कम्युनिस्ट हों या समाजवादी, अपने सारे मतभेद भुला देने चाहिए. सभी को सिर्फ आजादी को मजबूत करने में अपना योगदान देना चाहिए. इस आजादी को काफी संघर्ष के बाद हासिल किया गया है. हम अपनी आजादी को दो हिस्सों में बंटने नहीं दे सकते.

दुख इस बात का होता है कि जिस ताकत के साथ देश ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, वही ताकत हिंदू-मुस्लिम एकता कायम करने में इतनी कमजोर कैसे हो रही है. जहां तक आजादी के जश्न की बात है, मैं इस खुशी में शामिल नहीं हो रहा हूं. मेरे लिए यह जश्न मनाने की बात नहीं बल्कि दुख की बात है.

सोर्स: My Days with Gandhi, पेज नंबर 265

15 अगस्त 1947- छात्रों से गांधी की बातचीत

अब हमारी लड़ाई रुक जानी चाहिए. हमारे सामने एक नया राज्य है, यहां हिंदू और मुसलमान दोनों नागरिक हैं. अगर ऐसा है तो दो राष्ट्रों के सिद्धांत का अंत होना जरूरी है.

छात्रों को अब सोच-समझकर काम करना चाहिए. उन्हें कोई ऐसा काम नहीं करना है जिससे देश को या देश के किसी नागरिक को नुकसान पहुंचे. हमें एक नए भारत के निर्माण के लिए हर संभव प्रयास करना होगा,ऐसा भारत जिस पर सभी को गर्व हो.

जहां तक आजादी की खुशी में हो रहे जश्न सवाल है, इन जश्नों के लिए मेरे पैर जमीन से ऊपर नहीं उठते. मैं इस तरह की खुशी से प्रभावित नहीं हो रहा हूं.

सोर्स: My Days with Gandhi, पेज नंबर 266

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15 अगस्त 1947- प्रार्थना सभा में गांधी

मैं कलकत्ता को दिल से बधाई देता हूं कि हिंदू और मुसलमान आज पूरी मित्रता के साथ एक-दूसरे से मिल रहे हैं. मुसलमानों ने हिंदुओं की तरह नारे लगाए हैं, हिंदुओं ने भी मुसलमानों की तरह मस्जिदों में जाकर नमाज अदा की. अगर यह दिल से हुआ है और कोई दिखावा नहीं है, यह स्थिति खून-खराबे के लंबे दौर के बाद उससे कहीं बेहतर है.

मुझे खुशी है कि कलकत्ता के मुसलमानों को अब बंगाल और पूरे भारत में कहीं भी डरकर नहीं रहना होगा. मुझे उम्मीद है कि लाहौर भी कलकत्ता की इस मिसाल से कुछ सीख लेगा.

लेकिन मैं उन लोगों से भी कहना चाहता हूं जिन्होंने आजादी मिलते ही गवर्नमेंट हाउस पर कब्जा करने का काम किया. ये लोग नए राज्यपाल राजाजी से उसे खाली करने की मांग कर रहे हैं. याद रखो आजादी का मतलब यह नहीं है कि हम सरकार की संपत्ति के साथ जो चाहें करें. हमें इस आजादी का इस्तेमाल संयम के साथ करना है.

अब हमें किसी के अधीन नहीं रहना है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं हो जाता कि हम किसी के खिलाफ मनमानी कर लेंगे. हमें खुद पर शासन करना सीखना ही होगा.