एक देश एक चुनाव वाली संसद की जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति की बैठक सोमवार को हुई. इस समिति ने देश के पूर्व गृह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम को बुलाया था. चिदंबरम ने इस बिल को लोकतंत्र के खिलाफ बताया और समिति को चेताया कि यह बिल कानून के कसौटी पर खरा नहीं उतरता. चिदंबरम की दलील थी कि यदि 2029 में सभी राज्यों और लोकसभा के चुनाव साथ कराए जाएं और उसी चुनाव में केंद्र में किसी को बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा?
कांग्रेस कर रही इस बिल का विरोध
चिदंबरम ने यह भी कहा कि सरकार एक साथ चुनाव करा कर खर्च कम करने की बात करती है. लेकिन चुनाव में सरकार की तरफ से कुछ ज्यादा खर्च नहीं किया जाता, जो भी खर्च होता है वो उम्मीदवार करते हैं और उसमें भी सरकार की ओर से दिए गए लिमिट से बहुत अधिक खर्च होता है. सरकार को इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है. अभी नियम के अनुसार एक लोकसभा सीट पर एक उम्मीदवार 95 लाख और एक विधानसभा पर 40 लाख खर्च कर सकता है. कुछ सदस्यों ने यह भी कहा कि इस तरह से चुनाव आयोग को असीमित अधिकार देना लोकतंत्र के लिए सही नहीं होगा. वैसे भी कांग्रेस इस बिल का विरोध कर रही है. जबकि कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी, मनीष तिवारी, रणदीप सुरजेवाला और मुकुल वासनिक सदस्य हैं.
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आज की बैठक में कमिटी के सामने दिल्ली के कुछ पद्म पुरस्कारों से सम्मानित लोग भी शामिल हुए, जिसमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार भी थे. इन सभी का कहना था कि एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव कराना देश हित में है और सरकार को इसे लागू करना चाहिए.
क्या सरकार 2029 से लागू कर सकती है एक देश एक चुनाव?
अब इस बात की चर्चा जोरों पर है कि एक देश एक चुनाव को सरकार 2029 से ही लागू करना चाहती है. हालांकि इस संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी का कहना है कि उनका काम रिपोर्ट तैयार करना है और यह कब से लागू होगा यह सरकार तय करेगी. यह समिति कई राज्यों का दौरा कर चुकी है और तमाम तरह से लोगों, जिसमें कानून के जानकारों के अलावा अन्य विधाओं के लोगों से भी मुलाकात की है. यह सिलसिला अभी भी जारी है. इस संयुक्त संसदीय समिति ने महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, कनार्टक, गुजरात, दिल्ली और गोवा जैसे राज्यों का दौरा कर लिया है. जाहिर है इसमें से विपक्ष शासित राज्यों ने इसका विरोध किया है, जिसमें पंजाब, हिमाचल और कनार्टक हैं. यही नहीं 2024 में जब एक देश एक चुनाव का बिल संसद में लाया गया था तब डीएमके जो उस वक्त तमिलनाडु में सरकार में थी ने भी इसका विरोध किया था.
लेकिन अब बीजेपी की रणनीति है कि 22 एनडीए शासित राज्यों में एक देश एक चुनाव को लागू किया जाए. इनमें से उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड, असम, ओडिशा, गोवा, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, अरूणाचल प्रदेश और मणिपुर में बीजेपी की अपनी सरकार है. वहीं महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश,मेघालय, नागालैंड, सिक्कम और पुडुचेरी में एनडीए की सरकार है. बीजेपी को मालूम है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले 11 राज्यों में विधानसभा चुनाव होनें है. 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल में चुनाव हैं, जबकि 2028 में कनार्टक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में चुनाव है.
जबकि लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम के भी विधानसभा चुनाव होते हैं. हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू कश्मीर में लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव होता है. इसका मतलब ये है कि 8 राज्यों के चुनाव करवाने में केंद्र सरकार को कुछ खास मशक्कत नहीं करनी पड़नी चाहिए जबकि 2028 में जिन 9 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां या तो विधानसभा की मियाद बढ़ाई जाए या राष्ट्रपति शासन लगाया जाए. जिन 7 राज्यों में 2027 में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां चुनाव करा लिए जाएं और 2029 में उन विधानसभाओं को भंग करके लोकसभा चुनाव के साथ ही चुनाव कराए जाएं.
कांग्रेस पार्टी एक देश एक चुनाव के बिल का विरोध कर रही है. यह 129 संविधान संशोधन विधेयक है, ऐसे में इसको पास कराने के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत चाहिए. इसके लिए उसे डीएमके जैसी पार्टियों की आवश्यकता होगी. यही नहीं परिसीमन बिल को लेकर भी यही स्थिति है. सरकार ने अभी तक संसद के मॉनसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया गया मतलब सरकार कभी भी कम दिनों के नोटिस पर सत्र बुला सकती है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही है कि क्या सरकार के पास दो तिहाई का जादुई आंकड़ा है या नहीं.
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