सोमवार से शुरू होने वाला मॉनसून सत्र कई मामलों में ऐतिहासिक साबित हो सकता है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि सरकार की कोशिश है कि दोनों सदनों में संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का इंतजाम कर लिया जाए. सरकारी सूत्रों के अनुसार इस उद्देश्य में कामयाबी भी मिलती दिख रही है. ऐसे में कुछ महत्वाकांक्षी विधेयकों को सरकार पारित कराने का प्रयास कर सकती है. इनमें एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक एक देश एक चुनाव का भी है. इसे पिछले साल शीतकालीन सत्र में लोक सभा में रखा गया था. लेकिन विपक्ष के तीखे विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया था.
इस समिति का कार्यकाल अब मॉनसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन यानी दस अगस्त तक के लिए बढ़ा दिया गया है. अब यह देखना होगा कि क्या जेपीसी तब तक अपनी रिपोर्ट दे पाती है? अगर ऐसा होता है तो क्या सरकार बचे केवल चार दिनों में जेपीसी की सिफारिशों के आधार पर आवश्यक संशोधन कर संशोधित बिल संसद के दोनों सदनों से पारित करा पाएगी. जाहिर है इन तमाम प्रक्रियाओं के लिए बहुत कम समय बचेगा.
लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने की तैयारी
वैसे जेपीसी के अध्यक्ष पी पी चौधरी स्वयं ही यह कह चुके हैं कि एक देश एक चुनाव 2029 के लोक सभा चुनाव से लागू किया जा सकता है. हाल में गोवा में संसदीय समिति के दौरे के समय उन्होंने कहा कि 2029 में लोक सभा चुनावों के साथ ही पूरे देश में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं. हालांकि खुद बिल में प्रावधान है कि 2029 में अगली लोक सभा के गठन के बाद पहली बैठक में राष्ट्रपति एक नियत तिथि की अधिसूचना जारी करेंगे. उसके बाद जिस भी राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे उनका कार्यकाल 2034 में होने वाले लोक सभा चुनावों के साथ ही समाप्त हो जाएगा. जैसे किसी राज्य में अगर 2031 में विधानसभा चुनाव होता है तो वहां विधानसभा का कार्यकाल 2034 तक ही यानी केवल तीन साल ही रहेगा. यानी 2034 ही वह साल होगा जब पूरे देश में लोक सभा चुनाव के साथ ही सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकेंगे.
मौजूदा सदन में NDA के पास बहुमत तो है, लेकिन दो-तिहाई का जादुई आंकड़ा यानी लगभग 360 (वर्तमान में लोक सभा की संख्या 540 है) सीटें नहीं है. जब दिसंबर 2024 में यह बिल जेपीसी को भेजा गया था, तब पक्ष में 269 और विरोध में 198 वोट पड़े थे. इसी तरह महिला आरक्षण और परिसीमन के लिए लाए गए संविधान संशोधन पर मतदान में सरकार के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे.
हालांकि, अब सरकार की स्थिति में सुधार हुआ है. टीएमसी के बीस सांसद और शिवसेना यूबीटी के 6 सांसद उसके साथ गए. इनके अलावा उसे एनसीपी एसपी के आठ सांसदों के समर्थन का भी भरोसा है. लेकिन उसे डीएमके के 22 सांसदों को भी साथ लाना होगा और कुछ अन्य विपक्षी दलों के सांसदों को मतदान के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए मनाना होगा. अगर इस सबके बाद बिल पारित होता है तो फिर राज्य सभा में भी यही प्रक्रिया दोहराई जाएगी.
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्षी इंडिया ब्लॉक का रुख इस बिल को लेकर पूरी तरह नकारात्मक और आक्रामक है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां इसके सख्त खिलाफ हैं. विपक्ष का मानना है कि यह कदम संघवाद के खिलाफ है और इससे क्षेत्रीय मुद्दों व क्षेत्रीय दलों का वजूद खतरे में पड़ जाएगा. उनका तर्क है कि यदि बीच में कोई राज्य सरकार गिर जाती है, तो वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया का क्या होगा. जाहिर है कि चाहे सरकार इस बड़े चुनावी सुधार को 2029 तक जमीन पर उतारने के लिए पूरी राजनीतिक ताकत लगा रही हो, लेकिन मौजूदा संसद में बिना विपक्ष के कुछ धड़ों के समर्थन या वॉकआउट के इसे दोनों सदनों से पास करा पाना एक बड़ी चुनौती रहेगी.
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