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सड़क न होने से 4 KM तक खाट पर ले जाना पड़ा महिला का शव, मौत के बाद अंत‍िम संस्‍कार अग्निपरीक्षा जैसा

ओडिशा के कंधमाल में सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को बुजुर्ग महिला का शव खाट पर रखकर 4 KM दूर श्मशान ले जाना पड़ा. विकास के दावों की पोल खोलती इस घटना ने बुनियादी सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पूरी खबर पढ़ें.

सड़क न होने से 4 KM तक खाट पर ले जाना पड़ा महिला का शव, मौत के बाद अंत‍िम संस्‍कार अग्निपरीक्षा जैसा

विकास के तमाम दावों के बीच ओडिशा के कंधमाल जिले से एक ऐसी झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है. जिले की पार्थमाहा पंचायत के अंतर्गत आने वाले कंदेरी गांव में सड़क न होने के कारण, एक बुजुर्ग महिला के शव को ग्रामीणों को करीब चार किलोमीटर तक खाट पर उठाकर ले जाना पड़ा.

 न तो एंबुलेंस पहुंच सकती है और न ही शव वाहन

गांव तक कोई पक्की  सड़क नहीं होने के कारण यहा न तो एंबुलेंस पहुंच सकती है और न ही शव वाहन. ऐसे में महिला के निधन के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने शव को एक खाट पर रखा और घने जंगलों, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों और संकरे रास्तों से होते हुए श्मशान घाट तक पहुंचाया.

ग्रामीणों ने बारी-बारी से खाट को अपने कंधों पर उठाया ताकि महिला का अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक किया जा सके. यह दृश्य न केवल भावुक कर देने वाला था, बल्कि इस पिछड़े क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के अभाव की एक दर्दनाक तस्वीर भी पेश कर रहा था.

गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने की मांग

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि वे वर्षों से गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने की मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ मौत के समय ही नहीं, बल्कि किसी मेडिकल इमरजेंसी के दौरान भी मरीजों को खाट या अस्थायी स्ट्रेचर के सहारे कई किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है.

इस घटना ने एक बार फिर दूरदराज के आदिवासी इलाकों में विकास और ग्रामीण कनेक्टिविटी परियोजनाओं के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. घटना के सामने आने के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन से कंदेरी गांव में तत्काल सड़क निर्माण कराने की मांग की है.

कंदेरी गांव के लोगों के लिए यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि उन कठिन परिस्थितियों की एक और कड़वी याद थी, जिसका सामना वे हर दिन करते हैं. यहां बुनियादी सुविधाओं की कमी केवल जीवन को ही नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद की अंतिम विदाई को भी कष्टदायी बना रही है. चार किलोमीटर लंबी यह अंतिम यात्रा भले ही श्मशान घाट पर जाकर समाप्त हो गई हो, लेकिन यह व्यवस्था, कनेक्टिविटी और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों पर कई अनुत्तरित सवाल छोड़ गई है. 

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लेखक के बारे में
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देव कुमार घोष
संवाददाता
टीवी और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में एक जाना-पहचाना और भरोसेमंद नाम हैं। जमीनी हकीकत को सामने लाने की उनकी प्रतिबद्धता और जनहित से जुड़े मुद्दों पर... और पढ़ें
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