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बरसात में हिमालयी नदियां क्यों बन जाती हैं विनाशनकारी? मॉनसून में तबाही का पूरा सच

सवाल यह है कि बरसात के दिनों में ही हिमालयी नदियां इतनी क्यों बौखला उठती हैं? पढ़ें इसकी क्या-क्या वजहें हैं...

बरसात में हिमालयी नदियां क्यों बन जाती हैं विनाशनकारी? मॉनसून में तबाही का पूरा सच
  • हिमालयी नदियां मॉनसून और ग्लेशियरों के पिघलने से बरसात में उफान पर आ जाती हैं और तबाही मचाती हैं
  • मॉनसून की नमी पहाड़ी इलाकों में बादलों के फटने का कारण बनती है, जिससे सीमित क्षेत्रों में तीव्र बारिश होती है
  • संकरी घाटियों और तीखे ढालों पर बहती नदियां भूस्खलन मलबे के साथ मिलकर पानी की ताकत को कई गुना बढ़ा देती हैं
नई दिल्ली:

नेपाल में तिब्बत के रास्ते आई तबाही ने हिमालयी नदियों के प्रकोप की एक और विनाशकारी झलक दिखा दी है. हर साल मॉनसून और उसके आसपास इस पहाड़ी इलाके में नदियों के रास्तों पर ऐसी ही आपदाएं लौट आती हैं. साल के बाकी समय शांत बहने वाली हिमालयी नदियां बरसात में उफ़ान पर आ जाती हैं. हिमालय के ग्लेशियरों से निकली इन नदियों में भारी बारिश के बाद जब पहाड़ी जंगलों से उतरे हज़ारों झरने मिलते हैं तो ये मचल उठती हैं. इनकी ताक़त कई गुना बढ़ जाती है. फिर ये पहाड़ी इलाकों में तो विध्वंस मचाती ही हैं, मैदानी इलाकों को भी नहीं बख्शतीं. जब अपने पर आती है तो तटबंध तोड़कर बहती हैं और अपने रास्ते में आई हर कुदरती, इंसानी चीज़ को बहा ले जाती हैं. 

सवाल यह है कि बरसात के दिनों में ही हिमालयी नदियां इतनी क्यों बौखला उठती हैं? इसकी दरअसल कई वजहें हैं. जियोलॉजिस्ट डॉक्टर नवीन जुयाल कहते हैं कि हिमालय की नदियां दो तरह के पानी से रिचार्ज होती हैं. पहला है दक्षिण पश्चिमी मॉनसून. 80 फीसदी पानी इसी का होता है और दूसरा है ग्लेशियरों का पिघलना. गर्मियों के मौसम के साथ हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज़ हो जाती है. इसलिए उनसे निकलने वाली नदियों में पानी बढ़ जाता है और इसके ठीक बाद बरसात का मौसम नदी में पानी की मात्रा कहीं ज़्यादा बढ़ा देता है. ऊंचे हिमालयी इलाकों में इस दौरान बादल फटने जैसी कई ख़बरें आती हैं. 

दरअसल होता ये है कि भारी नमी लिए मॉनसूनी हवाएं जब उच्च हिमालयी इलाकों तक पहुंचती हैं तो ऊपर की ओर उठती हैं. लेकिन एक ऊंचाई तक जाने के बाद कम तापमान के कारण बादल इस नमी को संभाल नहीं पाते. ये नमी मोटी बूंदों में बदल जाती हैं. इसका नतीजा होता है मूसलाधार बारिश, जिसमें कई बार बादल फटने की घटनाएं भी शामिल होती हैं. बादल फटने का अर्थ है कि किसी जगह पर एक ही घंटे के अंदर 100 मिलीमीटर से ज़्यादा बारिश का हो जाना. हालांकि इन दिनों चलन ये हो चला है कि ख़बरों में पहाड़ी इलाकों में हर भारी बारिश को बादल फटना कह दिया जाता है, जो तकनीकी तौर पर सही नहीं है. 

बीते कुछ सालों में ये पैटर्न भी देखा गया है कि पहाड़ी इलाकों में भयानक बारिश की कई घटनाएं अकसर एक छोटे इलाके तक ही सीमित होती हैं और फिर उस इलाके में भारी तबाही मचाती हैं. ऐसी बढ़ती घटनाओं को क्लाइमेट चेंज से जोड़कर देखा जा रहा है. उच्च हिमालयी इलाकों में होने वाली भारी बारिश से नदियों के बौखलाने की एक और वजह है. वो ये कि अकसर जिन घाटियों से ये नदियां गुज़रती हैं, वो बहुत संकरी होती हैं और उनका ढाल बहुत तीखा होता है. इन ढालों पर तेजी से बहती इन नदियों की मारक क्षमता तब और बढ़ जाती है, जब नदियों के दोनों ओर बिखरा भूस्खलन का नया, पुराना मलबा पानी के बहाव के साथ मिलकर नीचे आता है और पानी की ताक़त को कई गुना बढ़ा देता है. 

हिमालय में ये ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि किसी छोटी सी नदी की भी ताक़त को कम आंकने की ग़लती न की जाए. डॉ. नवीन जुयाल बताते हैं कि कई बार कोई एक बहुत छोटी नदी भी किसी एक्सट्रीम इवेंट में अपने साथ इतना मलबा, इतनी चट्टानें ले आती है कि रास्ते में पड़ने वाली दूसरी नदियों का रास्ता तक रोक सकती है. हिमालय में एक छोटी नदी किस क़दर तबाही मचा सकती है और बड़ी नदी का रास्ता रोक सकती है. इसका एक ताज़ा उदाहरण फरवरी 2021 की ऋषिगंगा त्रासदी भी है. तब क़रीब 5600 मीटर ऊंचे रौंठी पीक से एक बड़ी चट्टान टूटकर सीधे दो किलोमीटर नीचे पहाड़ी नदी रौंठी गाड़ (जलधारा) के ग्लेशियर पर आ गिरी. उसने ग्लेशियर को फाड़ा और रौंठी में ज़बरदस्त हलचल मचा दी. उस इवेंट से छोटी नदी में इतनी ताक़त भर गई कि उसने आसपास ग्लेशियर के छोड़े हुए मलबे को साथ लिया और भयानक तेजी से नीचे बह निकली. 

पानी और मलबे की मिली जुली ताकत इतनी ज़्यादा थी कि उसने दूसरी ओर से आ रही बड़ी नदी ऋषिगंगा का रास्ता ही रोक दिया. कुछ ही मिनटों के अंदर उसके रास्ते में 300 फीट ऊंची एक दीवार खड़ी कर दी. उस त्रासदी ने नीचे के दो हाइडल पावर प्रोजेक्ट रैणी और तपोवन-विष्णु गाड़ प्रोजेक्ट को तबाह कर दिया. 80 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और क़रीब 200 लोग लापता हो गए. जियोलॉजिस्ट डॉ वाईपी सुंदरियाल कहते हैं कि ऋषिगंगा त्रासदी ये सबक देती है कि क्लाइमेट चेंज के साथ ऐसी आपदाएं बढ़ेंगी और उन आपदाओं के साथ ऊंचे हिमालय में बिखरा ग्लेशियरों द्वारा पीछे छोड़ा गया मलबा किसी बड़े इवेंट में नदियों के पानी के साथ नीचे आकर तबाही बरपा सकता है. इसलिए हिमालयी नदियों के रास्तों पर विकास परियोजनाओं को बनाने में हमें इस पहलू का भी ध्यान रखना होगा.

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