- सुप्रीम कोर्ट ने डेटा चोरी और साइबर अपराध से निपटने के लिए कानूनों को और सख्त बनाने की आवश्यकता जताई है.
- विट्राया टेक्नोलॉजीज ने1.5 लाख से अधिक भारतीयों के मेडिकल और निजी डेटा चोरी का आरोप लगाया है.
- याचिकाकर्ता ने छह महीनों तक एफआईआर न दर्ज करने और जांच में लापरवाही का आरोप लगाया है.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि डेटा चोरी और साइबर अपराध से निपटने के लिए देश के कानूनी ढांचे को और अधिक सख्त बनाने की जरूरत है. अदालत ने 1.5 लाख से अधिक लोगों के निजी और मेडिकल डेटा की कथित चोरी के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, “हम इस मामले की गंभीरता को समझते हैं. इसी वजह से एक अन्य मामले में हमने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कानून को और अधिक सख्त बनाने पर विचार करने को कहा है.
संवेदनशील व्यक्तिगत सूचनाएं चोरी कर ली गईं
विट्राया टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. कंपनी का आरोप है कि फरवरी 2025 में उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर साइबर हमला हुआ, जिसमें 1.5 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों के मेडिकल रिकॉर्ड, स्वास्थ्य बीमा दावों का डेटा, आधार से जुड़ी जानकारी और अन्य संवेदनशील व्यक्तिगत सूचनाएं चोरी कर ली गईं. कंपनी का कहना है कि यह मामला नागरिकों के निजता के मौलिक अधिकार से जुड़ा है और इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है.
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर और वकील नूपुर शर्मा ने अदालत को बताया कि साइबर हमला छह राज्यों तक फैला हुआ है. लेकिन जांच एजेंसियों ने शिकायत के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की. परमेश्वर ने कहा कि उन्होंने मार्च 2025 में शिकायत दर्ज कराई थी. लेकिन पुलिस ने अगस्त 2025 तक एफआईआर दर्ज नहीं की. उनका आरोप है कि पुलिस ने केवल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 और 66बी जैसी अपेक्षाकृत कम गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया.
उन्होंने अदालत को बताया कि जांच एजेंसियों को सिंगापुर स्थित उस सर्वर की जानकारी भी दी गई थी, जहां कथित तौर पर 1.5 लाख भारतीयों का मेडिकल डेटा पहुंचा, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई. याचिका में दावा किया गया है कि आंतरिक फोरेंसिक जांच के दौरान संदिग्ध आईपी एड्रेस, सर्वर गतिविधियां और डिजिटल सबूत मिले, जिनका संबंध रेमेडीनेट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और आईएचएक्स प्राइवेट लिमिटेड से बताया गया है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन कंपनियों तथा अन्य संबद्ध संस्थाओं ने कथित तौर पर साइबर हमले में भूमिका निभाई. हालांकि, इन आरोपों की अभी किसी अदालत या जांच एजेंसी द्वारा पुष्टि नहीं हुई है.
6 महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई
कंपनी का आरोप है कि उसने पंजाब साइबर क्राइम पुलिस को तकनीकी लॉग, आईपी एड्रेस, सर्वर डेटा और अन्य दस्तावेज सौंपे थे, लेकिन इसके बावजूद लगभग छह महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई. याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि अब तक न तो डिजिटल साक्ष्यों का पर्याप्त फोरेंसिक परीक्षण हुआ है, न सर्वर जब्त किए गए हैं और न ही किसी संदिग्ध से प्रभावी पूछताछ की गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है. कंपनी ने मामले की जांच CBI को सौंपने या फिर CBI, CERT-In और अन्य साइबर सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त, अदालत की निगरानी वाली विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि यह केवल व्यावसायिक विवाद नहीं, बल्कि नागरिकों की निजता, डिजिटल सुरक्षा और संवेदनशील मेडिकल जानकारी की सुरक्षा से जुड़ा राष्ट्रीय महत्व का मामला है.
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