केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उस याचिका का विरोध किया है, जिसमें आरक्षण के भीतर आय-आधारित सब-कोटा लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई थी. सरकार का तर्क है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित है, न कि केवल आर्थिक स्थिति पर.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा जारी कर कहा है कि याचिका में आरक्षण पर नीति बनाने के लिए निर्देश देने की मांग की है. केंद्र ने कहा कि आरक्षण नीति में बदलाव करने का फैसला केवल संसद के पास है, न कि अदालत के पास.
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने हलफनामे में यह भी कहा कि SC/ST पर 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता है और केवल संसद ही इस लिस्ट में बदलाव कर सकती है.
याचिका क्या है?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मांग की गई थी कि अदालत केंद्र सरकार को एक ज्यादा निष्पक्ष आरक्षण नीति बनाने के लिए निर्देश दे. यह याचिका सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने दाखिल की है.
याचिका में मांग की गई थी कि SC, ST, OBC और EWS के अंदर आय-आधारित सब-कोटा लागू किया जाएगा, ताकि हर आरक्षित कैटेगरी में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा मिल सके.
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केंद्र सरकार ने क्या-क्या कहा?
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका का विरोध किया है. सरकार का कहना है कि आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है. याचिका के विरोध में केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा हैं कि:-
- संविधान के खिलाफ: सरकार ने कहा कि SC, ST और OBC को मिलने वाला आरक्षण सिर्फ आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है. इसलिए केवल आय के आधार पर सब-कोटा बनाने संविधान की मूल व्यवस्था के खिलाफ होगा.
- नीति बनाने का हक सरकार को: केंद्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार को किसी नीति बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. केंद्र सरकार ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341, 342 और 342A के तहत SC, ST और OBC की पहचान पिछड़ेपन के आधार पर होती है और इन लिस्ट में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है.
SC/ST और OBC की पहचान कैसे हुई?
- SC: अनुसूचित जातियों की पहचान ऐतिहासिक रूप से अस्पृश्यता (छुआछूत) और सामाजित भेदभाव के आधार पर हुई है.
- ST: अनुसूचित जनजातियों की पहचान उनकी खास संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर की जाती है.
- OBC/SEBC: पिछड़ा वर्गों की पहचान सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व के आधार पर होती है.
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SC/ST में 'क्रीमी लेयर' क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि OBC की तरह ही SC/ST में 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता. इसके लिए सरकार ने कई फैसलों का हवाला दिया.
हलफनामे में कहा गया है कि इंदिरा साहनी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि आर्थिक प्रगति के आधार पर किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं माना जा सकता. ईवी चिन्नैया मामले में भी साफ किया गया है कि SC लिस्ट से किसी समुदाय को बाहर करने का अधिकार सिर्फ संसद को है.
केंद्र ने कहा कि एम नागराज फैसले में यह नहीं कहा गया था कि SC/ST पर क्रीमी लेयर लागू होगी. अशोक कुमार ठाकुर मामले में भी अदालत ने साफ किया कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत सिर्फ OBC तक सीमित है.
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और क्या कहा सरकार ने?
केंद्र ने यह भी बताया कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण को छोड़कर SC/ST और OBC के लिए चल रही कई कल्याणकारी योजनाओं में पहले से ही आय सीमा लागू है, ताकि जरूरतमंद लोगों तक लाभ पहुंच सके.
सरकार ने कहा कि यदि आरक्षण के भीतर आय-आधारित सब-कोटा लागू करने पर विचार करना हो, तो इसके लिए सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों की स्टडी करनी होगी.
केंद्र सरकार ने याचिका को 'भ्रामक और आधारहीन' बताते हुए कहा कि इसमें अनुच्छेद 32 के तहत कोई ऐसा संवैधानिक अधिकार नहीं उठाया गया है, जिसे अदालत लागू कराए. सरकार ने इस याचिका को खारिज करने की मांग की है.
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