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NCLT को लेकर सुप्रीम कोर्ट इतना नाराज क्यों ? भर्ती विवाद से शुरू हुआ मामला 'हाईजैक' कर लेने तक कैसे पहुंचा

NCLT और NCLAT में कर्मचारियों की भर्ती एक प्राइवेट ठेकेदार को सौंपे जाने पर सुप्रीम कोर्ट भड़क गया है. CJI सूर्यकांत ने कहा कि कॉरपोरेट मंत्रालय ने ट्रिब्यूनल पर कब्जा कर लिया है. जानिए क्या है वो पूरा विवाद जिसके चलते संविदा कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं.

NCLT को लेकर सुप्रीम कोर्ट इतना नाराज क्यों ? भर्ती विवाद से शुरू हुआ मामला 'हाईजैक' कर लेने तक कैसे पहुंचा
AI की सहायता से ली गई सांकेतिक तस्वीर

देश के कॉरपोरेट जगत में हजारों करोड़ रुपये के दिवालिया मामलों और कंपनियों के विवाद सुलझाने वाले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और इसकी अपीलीय संस्था NCLAT को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. मामला इतना गंभीर हो गया कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत को यहां तक कहना पड़ा कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) ने इस न्यायिक संस्था को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया है और इसे हाईजैक कर लिया है. यह पूरा बवाल तब शुरू हुआ जब मंत्रालय ने ट्रिब्यूनल में जजों और अदालती कामकाज की मदद करने वाले कर्मचारियों की भर्ती का जिम्मा एक स्वतंत्र प्राइवेट एजेंसी को ठेके पर दे दिया. इस फैसले के खिलाफ पिछले छह से आठ सालों से ट्रिब्यूनल में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर काम कर रहे कर्मचारी नौकरी जाने के डर से सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए न सिर्फ मंत्रालय की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए, बल्कि प्राइवेट ठेकेदारों के जरिए न्यायिक संस्थाओं में भर्ती करने के पूरे खेल की पोल खोल कर रख दी.

क्यों अदालत पहुंचे संविदा कर्मचारी, क्या है वो असली डर

इस पूरे विवाद की जड़ में वो संविदा कर्मचारी हैं जो पिछले कई सालों से NCLT और NCLAT में कोर्ट मास्टर, स्टेनोग्राफर, असिस्टेंट रजिस्ट्रार और अन्य तकनीकी पदों पर काम कर रहे हैं. कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट में दलील दी कि इन कर्मचारियों को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने ही कॉन्ट्रैक्ट पर रखा था.

लंबे समय से काम करने के बावजूद इन्हें मकान किराया भत्ता (HRA) या दैनिक भत्ता जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं दी गईं, क्योंकि सरकार इन्हें पक्का कर्मचारी नहीं बनाना चाहती थी. अब मंत्रालय ने भर्ती का ठेका एक नई प्राइवेट कंपनी को सौंप दिया है.

कर्मचारियों को आशंका है कि एक या दो नवंबर को उन्हें रातों-रात बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा और प्राइवेट एजेंसी अपने नए लोगों को वहां तैनात कर देगी. वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के भर्ती नियमों और शुरुआती विज्ञापनों में इन संविदा कर्मियों को पक्का करने का साफ प्रावधान था. ऐसे में इतने सालों की सेवा के बाद उन्हें अचानक निकालना पूरी तरह से मनमाना फैसला है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिलने वाले बराबरी के हक पर सीधा हमला है.

न्यायिक संस्था में प्राइवेट कर्मचारियों की तैनाती से स्वतंत्रता पर खतरा

याचिकाकर्ताओं की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि अगर जजों के साथ सीधे काम करने वाला और संवेदनशील अदालती रिकॉर्ड संभालने वाला स्टाफ किसी प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी बन जाएगा, तो पूरी व्यवस्था चरमरा जाएगी. ट्रिब्यूनल कोई साधारण सरकारी दफ्तर नहीं है, बल्कि यहां देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों और बैंकों के अरबों रुपये के दिवालिया मामलों पर फैसले होते हैं. ऐसे में अगर अदालती कार्यवाही और फैसलों के ड्राफ्ट किसी आउटसोर्सिंग एजेंसी के कर्मचारियों के हाथ में रहेंगे, तो वे कोर्ट या जजों के प्रति नहीं, बल्कि उस ठेकेदार कंपनी के प्रति जवाबदेह होंगे. इससे न्यायिक स्वतंत्रता और फैसलों की गोपनीयता पूरी तरह खतरे में पड़ जाएगी. इसी आधार पर कर्मचारियों ने मांग की कि जब तक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष खुद कोई फैसला न लें, तब तक किसी भी कर्मचारी को नौकरी से न निकाला जाए.

ठेकेदारों के हथकंडों से वाकिफ हूं, मंत्रालय का दखल दुर्भाग्यपूर्ण: CJI

मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत बेहद सख्त नजर आए. उन्होंने खुली अदालत में अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वे अच्छी तरह जानते हैं कि ठेकेदार किस तरह के हथकंडे अपनाते हैं. ठेकेदारों और उनके जरिए आने वाले लोगों को न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की कोई परवाह नहीं होती.

सीजेआई ने कड़े शब्दों में कहा कि अधिकरण पर पूरी तरह से कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का कब्जा हो गया है. यह किसी भी न्यायिक संस्था की स्वायत्तता में सीधा दखल है और यही सबसे बड़ी समस्या है. मंत्रालय ट्रिब्यूनल पर अपना पूरा नियंत्रण चाहता है और यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.

चीफ जस्टिस ने अपने पुराने न्यायिक अनुभव को साझा करते हुए एक चौंकाने वाली बात बताई. उन्होंने कहा कि मुंबई में ऐसा मामला सामने आया था जहां संविदा पर रखे गए कर्मचारी ट्रिब्यूनल की मूल अदालती रिपोर्ट ही लेकर फरार हो गए थे और हालात ऐसे बने कि पुलिस में एफआईआर दर्ज करानी पड़ी थी.

न ठेका चलेगा न पुराना सिस्टम, सुप्रीम कोर्ट ने बताया स्थायी रास्ता

सुप्रीम कोर्ट ने जहां एक तरफ मंत्रालय की दखलअंदाजी पर कड़ा प्रहार किया, वहीं दूसरी तरफ पीठ ने यह भी साफ कर दिया कि अदालत संविदा-आधारित यानी कॉन्ट्रैक्ट वाली नियुक्तियों का भी समर्थन नहीं करती. चीफ जस्टिस ने स्पष्ट कहा कि वे किसी व्यक्तिगत हित वाली याचिका पर ट्रिब्यूनल के काम को नहीं रोकेंगे, लेकिन अगर NCLT के अध्यक्ष खुद इस व्यवस्था पर चिंता जताते हैं, तो कोर्ट संस्था के व्यापक हित में कड़े कदम उठाएगा. सीजेआई ने दो टूक कहा कि इस प्राइवेट कंपनी के ठेके को भी खत्म किया जाए और पूरी व्यवस्था को सुधारा जाए. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी इसमें जोड़ा कि भले ही भर्ती की प्रक्रिया किसी एजेंसी से करा ली जाए, लेकिन काम करने वाले कर्मचारी और ट्रिब्यूनल के बीच सीधा एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई का रिश्ता होना चाहिए, ताकि जवाबदेही बनी रहे. सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया कि ट्रिब्यूनल में तुरंत कामकाज संभालने के लिए सरकारी विभागों से अनुभवी अधिकारियों को डेपुटेशन पर लाया जाए और लंबे समय के लिए UPSC या SSC के जरिए पक्की व पारदर्शी भर्तियां शुरू की जाएं, ताकि ट्रिब्यूनल पूरी स्वतंत्रता के साथ काम कर सके. 
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