- नागपुर हाईकोर्ट पीठ ने एक फैसले में जिसमें चलती ट्रेन से गिरना लापरवाही नहीं, बल्कि अप्रत्याशित दुर्घटना माना.
- इस फैसले के मुताबिक रेलवे पल्ला नहीं छाड़ सकता और उसे यात्री को मुआवजा देना होगा.
- कामठी के राजू पंचेश्वर से जुड़े मामले में उसे रेलवे की तरफ से 6.40 लाख का मुआवजा दिया जाएगा.
भारतीय रेलवे में यात्रा के दौरान होने वाले हादसों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने एक बड़ा फैसला सुनाया है. जिसमें चलती ट्रेन से चढ़ने और उतरने की कोशिश करना कोई लापरवाही नहीं है, बल्कि इस दौरान होने वाला हादसा 'अप्रत्याशित दुर्घटना' माना जाएगा. ऐसे में हाईकोर्ट ने एक केस में पीड़ित पक्ष को 6.40 लाख रुपए का मुआवजा देने के निर्देश रेलवे को दिए हैं. हाईकोर्ट का यह फैसला अहम माना जा रहा है. क्योंकि जब भी ट्रेन में चढ़ने या उतरने के दौरान हादसे हो जाते हैं, तो उसमें सीधे अब यात्री को दोषी नहीं माना जाएगा.
कामठी के राजू पंचेश्वर से जुड़ा था मामला
दरअसल, कामठी के रहने वाले यात्री राजू पंचेश्वर का दाहिना पैर ट्रेन के नीचे आने से कट गया था. लेकिन रेलवे ट्रिब्यूनल ने इसे यात्री की लापरवाही बताकर मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया था. जिसके चलते राजू ने नागपुर हाईकोर्ट ने याचिका दायर की थी. उन्होंने बताया कि पंचेश्वर गलती से विदर्भ एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में चढ़ गए थे. टीटीई को देखकर उन्होंने परिवार के साथ जनरल डिब्बे में जाने की जल्दबाजी कर दी. स्टेशन पर ट्रेन का ठहराव केवल दो मिनट का था. इस कारण पंचेश्वर और उनका बेटा तो डिब्बे में चढ़ गए, लेकिन पत्नी और बेटी प्लेटफॉर्म पर ही छूट गईं. ट्रेन चलने के बाद पीछे छूटे परिवार को लेने के लिए चलती ट्रेन से नीचे उतरते समय पंचेश्वर का पैर फिसल गया और वे ट्रेन के नीचे आ गए थे. जिससे उनका पैर कट गया था.
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हाईकोर्ट ने खारिज की रेलवे की दलील
हाईकोर्ट ने रेलवे प्रशासन की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि यात्री ने अपनी खुद की लापरवाही से इस हादसे को न्योता दिया. नागपुर बेंच ने रेलवे ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए राजू पंचेश्वर को 6 लाख 40 हजार रुपये का मुआवजा और उस पर 7 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट न्यायमूर्ति प्रवीण पाटिल ने माना कि एक पिता या पति की तरफ से अपने पीछे छूटे परिवार को साथ लेने के लिए घबराहट में चलती ट्रेन से उतरने का प्रयास करना एक 'अप्रत्याशित दुर्घटना' है न कि जानबूझकर की गई लापरवाही है.
न्यायमूर्ति प्रवीण पाटिल ने इस महत्वपूर्ण फैसले में रेलवे प्रशासन को आदेश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर मुआवजे की यह रकम पीड़ित को सौंपे. ऐसे में यह फैसला दूसरे मामलों में भी अहम माना जा रहा है.
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