- TISS की रिपोर्ट के अनुसार मुंबई में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए कई पॉकेट्स में चुनावी परिणाम प्रभावित कर रहे हैं
- 73 फीसदी अवैध बांग्लादेशियों के पास वोटर आईडी कार्ड हैं और वो मुंबई के कई विधानसभा में निर्णायक भूमिका में हैं
- फर्जी दस्तावेज बनाने का एक व्यापक नेटवर्क सक्रिय है जो आधार, राशन कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी बनाता है
एनडीटीवी ने मुंबई से देश की सबसे बड़ी चिंता पर सबसे बड़ी पड़ताल की है. लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने देश को जिस सबसे बड़ी चुनौती और चिंता के बारे में बताया था. देश को बहू-बेटियों के लिए खतरे पर अलर्ट किया था. बिहार चुनाव के दौरान हिंदुस्तानी के हक पर लूट की साजिश का बार-बार जिक्र किया था. असम, पश्चिम बंगाल के आने वाले चुनाव में जो सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है. जो देश के लगभग हर शहर में मौजूद है. किसी देश और वहां होने वाले मतदान के खिलाफ दुनिया की सबसे बड़ी साजिश पर हैरान करने वाला खुलासा- 'ऑपरेशन मैंग्रोव'.
बांग्लादेश से चला एक आदमी, कैसे भारत में आकर सिस्टम की नाकामी का फायदा उठाकर, नकली पहचान हासिल करता है. नागरिक बन जाता है. फिर वो वोटर बनकर नगर पालिका, महानगर पालिका, विधानसभा और लोकसभा में देश की राजनीति में भी दखल देने लगता है. वही घुसपैठिया हमारा भविष्य भी तय करता है. ये तादाद धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है. 'ऑपरेशन मैंग्रोव' में कई बड़े खुलासे हुए हैं.
मालवनी मुंबई के मलाड का एक इलाका है. अवैध बांग्लादेशियों का जमीनी सच जानने जब NDTV की टीम इस इलाके में पहुंची तो उसे अजीब शक की नजर से देखा गया. मुंबई के इन इलाकों में अवैध घुसपैठियों का मुद्दा इतना संवेदनशील है कि सच जानने की कोशिश को भी गुस्से और विरोध का सामना करना पड़ता है. जो खुद बांग्लादेशी घुसपैठिए नहीं हैं, वो भी गुस्से में मिलते हैं.
अवैध बांग्लादेशियों पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस की रिसर्च में बिना गुंबद और मीनार की मस्जिद का भी जिक्र है. रिसर्चर का दावा है कि जहां भी घुसपैठियों की तादाद ज्यादा होती है, वहां पर ऐसी मस्जिदें एक प्रमुख चिन्ह मानी जा सकती हैं. बिना गुंबद और मीनार की मस्जिद अवैध घुसपैठिओं की मजबूरी मानी जाती है, ताकि धर्म साथ रहे और पहचान भी छिपी रहे.

पूरे इलाके में एक पर्देदारी है. बांग्लादेशी के मुद्दे पर लोग उग्र हो जाते हैं या उलझन में दिखते हैं. जैसे दबाव में हों. अवैध बांग्लादेशियों पर TISS की रिपोर्ट का सच वो जानते हैं, लेकिन कहना नहीं चाहते, या यूं कहें कि इन्हें घुसपैठियों में देश के लिए समस्या नहीं दिखती है. वो सोचते हैं कि रोजी रोटी कमाने ही तो आया है, विदेशी है तो क्या हुआ? जिन्हें अवैध बांग्लादेशी गलत लगते हैं वो सोचते हैं कि ये केवल सरकार के लिए समस्या है वही निपटे. वैसे एक स्थानीय चुनौती ये भी है कि बांग्ला बोलने वाले लोगों में कौन बांग्लादेशी है और कौन पश्चिम बंगाल या भारत के किसी दूसरे हिस्से के बंगाली, ये तय कर पाना भी बहुत मुश्किल होता है?
मुंबई में घुसपैठ पर MSEP रिपोर्ट
- 7000 हज़ार प्रवासियों में 3,014 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए
- 73% अवैध बांग्लादेशियों के पास वोटर आईडी कार्ड
- 40% अवैध प्रवासी कमाई का बड़ा हिस्सा विदेश भेज रहे हैं
- मुंबई के गोवंडी, मानखुर्द, कुर्ला और बाहरी स्लम इलाकों में अवैध आबादी बढ़ रही है
- 1961 में 88% हिंदू आबादी, 2011 में 66% हिन्दू आबादी
- 1961 में 8% मुस्लिम आबादी, 2011 में 21% मुस्लिम आबादी
- 2051 तक हिंदू आबादी घटकर 50% से भी कम (अनुमान)
- बढ़ी हुई मुस्लिम आबादी में घुसपैठिए ज्यादा
- सरकारी अस्पताल, नगर निगम सेवा पर भारी दबाव
- सस्ते बांग्लादेशी मजदूर, घरेलु श्रमिकों की इनकम घटी
- इकोलॉजिकल बफ़र्स और मैंग्रोव्स पर अवैध कब्जा
- मैंग्रोव एरिया की अवैध बस्ती से मुंबई में बाढ़ का खतरा
- जनसंख्या बदलाव से सांप्रदायिक माहौल बिगड़ रहा है
- अवैध बस्तियों में महिलाओं का यौन शोषण और बच्चे असुरक्षित
- एक पीढ़ी के भीतर मुंबई का जनसंख्या ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा
- जुलाई 2024 से जुलाई 2025 के बीच 7,000 से ज्यादा प्रवासियों पर सर्वे
NDTV की टीम को मुंबई के मलाड में मलवानी के भीतर कुछ और पैटर्न देखने को मिले. इस इलाके में ज्यादातर छोटा मोटा काम करने वाले लोग हैं. कुछ छोटे-मोटे ठेकेदार हैं. जो लोग आर्थिक रूप से मजबूर हैं या फिर जो अपनी पहचान छिपाकर रहना चाहते हैं. उनकी संख्या ज्यादा है. यहां धार्मिक तनाव भी रहता है. हिंसक भिड़ंत भी होती है. लोगों का दावा है कि हिंसा के पीछे नशे की बहुत बड़ी भूमिका है. NDTV की टीम को बताया गया कि यहां पर नशे की सप्लाई बहुत ज्यादा है. नशे के शिकार भी ज्यादा हैं, जिसमें हर उम्र वर्ग के लोग हैं.
लेकिन ये सिर्फ कागजों का खेल नहीं है. सूत्र बताते हैं कि ड्रग पेडलिंग, जाली नोटों का कारोबार और मोबाइल स्नैचिंग जैसे अपराधों में इन अवैध बांग्लादेशियों के तार जुड़े होते हैं. इन सबके बीच सबसे चौंकाने वाली बात है 'वोट बैंक'. कुछ नेता अपने फायदे के लिए इन घुसपैठियों के दस्तावेज बनवाने में मदद करते हैं, ताकि सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा जा सके.
बांग्लादेशी घुसपैठियों को आर्थिक राजधानी में बसाने का एक तय रेट-कार्ड है. मुंबई में अवैध रूप से दस्तावेज तैयार करने वाले सिंडिकेट का चौंकाने वाला ये 'रेटकार्ड' भी एनडीटीवी के हाथ लगा. जो बताता है कि 25,000 में भारतीय पहचान बेची जा रही है.
आधार, राशन, वोटर आईडी और पैन कार्ड का काम्बो सेट 25,000 रुपये में तैयार हो जाता है. अगर अलग-अलग दस्तावेज तैयार करवाए जाते हैं तो 5 से 7 हजार रुपये में जन्म प्रमाणपत्र, 10 हजार रुपए में राशन कार्ड, 5 हजार रुपए में डोमिसाइल या निवास प्रमाणपत्र, 5 हजार रुपए में आधार कार्ड, 3000 रुपए में पैन कार्ड. सारे कागजात तैयार हो तों वोटर आईकार्ड बनाने में केवल 1 हजार से 12 सौ रुपए का खर्च आता है.
अवैध घुसपैठ का रेट कार्ड
- ₹25000 आधार,राशन कार्ड, पैन कार्ड,वोटर आईडी
- ₹5000-7000 जन्म प्रमाणपत्र
- ₹10,000 राशन कार्ड
- ₹5000 निवास प्रमाणपत्र
- ₹5000 आधार कार्ड
- ₹3000 पैन कार्ड
- ₹1000-1200 वोटर आईडी कार्ड
NDTV ने एक ऐसा एजेंट भी खोज लिया जो कि बांग्लादेशियों के लिए कागजात तैयार करता है और उस पूरे नेटवर्क की भी जानकारी दे रहा है. बांग्लादेशियों के लिए फर्जी पहचान पत्र बनाने का काम एक नेटवर्क का हिस्सा है. जिसमें दर्जनों एजेंट शामिल होते हैं. नकली दस्तावेज तैयार करने का काम तीन तरह से होता है.
- किसी अन्य व्यक्ति के दस्तावेज में नाम और फोटो बदल कर
- ऐसे दस्तावेज के आधार पर जो आधार से नहीं जुड़ा है
- ऐसे दस्तावेज जिनकी सच्चाई जानने के लिए क्रॉसचेक नहीं होता है
दावा तो ये तक किया जा रहा है कि बांग्लादेशियों के लिए फर्जी दस्तावेज बनाने वाले एजेंट्स की पहुंच बड़े राजनीतिक लोगों तक है. स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बारे में दावा किया गया है कि वो बिना जांच के एजेंट्स के कहने पर दस्तावेज बनाने की चिट्ठी लिख देते हैं. सिफारिश कर देते हैं. दस्तावेज बनाने वालों की लापरवाही भी अवैध बांग्लादेशिय़ों के पक्ष में जाती है. बदले में एजेंट नेता की चुनाव में मदद करते हैं. एजेंट ने ये भी दावा किया कि वो बहुत आसानी से फर्जी डोमिसाइल सर्टिफिकेट भी बना देते हैं. इसके लिए उन्हें बस एक 15 साल पुरानी बैंक पासबुक की जरूरत होती है. उसमें नाम पता बदलकर सबूत की तरह पेश किया जाता है. एक बार डोमिसाइल सर्टिफिकेट बना तो सरकारी योजना का लाभ भी लेते हैं. ये काम केवल पांच हजार रुपए में पूरा हो जाता है.
मतलब ये कि देश में फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाला सिस्टम बांग्लादेशियों की मदद कर रहा है. फर्जी दस्तावेज देने वाले एजेंट्स का पूरा नेटवर्क है. एक इलाके में बीस से पच्चीस एजेंट होते हैं. जो किसी न किसी नेटवर्क का हिस्सा हैं. चूंकि इसमें मोटी कमाई है, इसलिए ये सब कुछ जोखिम के बावजूद जारी है. बांग्लादेश से भारत पहुंचने की गवाही देने वाला एक बांग्लादेसी नागरिक भी NDTV की टीम ने खोज निकाला है. जो फर्जी भारतीय पहचान के साथ मुंबई में रह रहा है.
मुंबई में घुसपैठ पर TISS रिपोर्ट
- 61 पॉकेट में बांग्लादेशियों की संख्या ज्यादा
- 73% अवैध बांग्लादेशियों के पास वोटर कार्ड
- 58 इलेक्शन वॉर्ड में अवैध बांग्लादेशी वोटर निर्णायक स्थिति में
- 06 विधानसभा में अवैध बांग्लादेशी वोटर बाहुल्य है
- 01 लोकसभा में अवैध बांग्लादेशी बाहुल्य है
मुंबई में पूरा एक सिस्टम है। समुद्र और शहर के बीच में लगे मैंग्रोव के जंगल को धीरे-धीरे कूड़े से ढका जा रहा है. फिर उस हिस्से को कब्जा कर लिया जाता है. उस गंदे इलाके पर कब्जा करने के लिए भी अवैध बांग्लादेशियों का इस्तेमाल किया जाता है. नौसेना की दीवार के करीब झुग्गी झोपड़ी का बसना सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है. यहां पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने जमीन खरीद कर गौशाला बनायी है. कुछ लोग ऐसे भी मिले जो बिहार से आकर यहां रह रहे हैं, लेकिन जैसे ही इन झोपड़ों में नंबर पड़ जाते हैं, इनमें रहने वाले पक्के घर का सपना देखने लगते हैं.
TISS की रिपोर्ट में कमाई को लेकर काने वाला दावा
इन झोपड़ियों में ऐसे लोग भी रहते हैं जो काफी पैसा खर्चा करके अपने लिए घर तैयार करते हैं. जिसमें हर तरह की सुविधा बनायी जा रही है. सवाल है कि यहां रहने वालों की इतनी कमाई कैसे होती है. TISS की रिपोर्ट में ऐसे इलाकों में रहने वालों की भीषण कमाई और सोर्स के बारे में भी एक चौंकाने वाला दावा है. एक डिलीवरी ब्यॉय जो क्विक ईकॉमर्स का डिलीवरी ब्यॉय है. उसके अकाउंट में तीन महीने में 20 करोड़ रुपए आए हैं? कहां से आए? कितने एकाउंट से आए?
एक साल पहले प्रतिष्ठित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ TISS ने मुंबई का भूगोल बदल रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों के चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे थे, अब मुंबई स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पब्लिक पॉलिसी (MSEPP), मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई सर्वे रिपोर्ट "The Mumbai - Silent Invasion" की नई रिपोर्ट भी हैरानी बढ़ाती है.
- वर्ष 2051 - 54% हिन्दू - 30% मुस्लिम ( अनुमान)
- 40% घुसपैठियों के रिश्तेदार पहले से भारत में
- 50% महिलाएं तस्करी से आयीं, सेक्स वर्कर हैं
- 40% घुसपैठिए ₹10 हजार से ₹1लाख रुपए महीना बांग्लादेश भेजते हैं
- गोवंडी, कुर्ला, मानखुर्द स्लम में बिजली और पानी संकट
रिपोर्ट का दावा है कि 1961 में हिंदू आबादी 88% थी, जो 2011 में गिरकर 66% रह गई है, जबकि इसी दौरान, मुस्लिम आबादी का हिस्सा 8% से बढ़कर 21% हो गया है. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2051 तक मुंबई में हिंदू आबादी घटकर 50% से भी कम यानी अल्पसंख्यक हो सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम आबादी की बढ़त नेचुरल नहीं है, बल्कि उसमें बड़ा हिस्सा अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों की घुसपैठ का है, इनकी बढ़ती संख्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन रही है.
एक पीढ़ी के भीतर मुंबई का जनसंख्या ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा
इतना ही नहीं अवैध घुसपैठ का असर सरकारी अस्पताल और नगर निगम की सर्विसेज पर भी पड़ रहा है. सिस्टम लगभग कोलैप्स होने के कगार पर है. अवैध घुसपैठिए कम पैसे में काम को राजी होते हैं जिसकी वजह से स्थानीय मजदूरों की कमाई और जिंदगी पर बुरा असर पड़ रहा है. अवैध घुसपैठिए मुंबई को सुरक्षित रखने वाले मैंग्रोव्स पर कब्जा कर रहे हैं. जिसकी वजह से मुंबई पर प्राकृतिक आपदा और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है. बस्तियों में आबादी का संतुलन बदलने से सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है. मामूली बात पर हिंसक विरोध आम बात हो गयी है. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा घटी है, खतरा बढ़ा है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर इसे रोका नहीं गया, तो एक पीढ़ी के भीतर मुंबई का जनसंख्या ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा.
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