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भारत में सत्ता परिवर्तन संभव नहीं, फ्रांस जैसी अशांति यहां नामुमकिन- दशहरा रैली में मोहन भागवत का बड़ा मैसेज

आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने कहा, "पश्चिम से एक आंधी चली है. जो हर प्रकार की व्यवस्था, हर प्रकार की भद्रता, हर प्रकार का मांगल्य हर प्रकार की सांस्कृतिक मानवीय संस्कार से विरोध रखती है."

भारत में सत्ता परिवर्तन संभव नहीं, फ्रांस जैसी अशांति यहां नामुमकिन- दशहरा रैली में मोहन भागवत का बड़ा मैसेज
मोहन भागवत ने कहा- आंदोलन समाधान के लिए होने चाहिए.
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नागपुर:

महाराष्ट्र के नागपुर में आरएसएस के विजयादशमी समारोह के दौरान अपनी स्पीच में मोहन भागवत ने देश-दुनिया में हो रहे आंदोलनों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि फ्रांस जैसी कोशिश भारत में हो रही है. रिजीम चेंज करने से परिस्थिति नहीं बदलती. मोहन भागवत ने आगे कहा, "पश्चिम से एक आंधी चली है. फ्रांस, बांगलादेश और नेपाल में क्या हुआ. भारत में ऐसे प्रयास चल रहे हैं. समाधान के लिए आंदोलन होने चाहिए. उद्देश समाधान हो. हमारी करनी के कारण द्वेष पैदा नहीं होना चाहिए. मर्यादा का पालन होना चाहिए. वोट और सस्ती लोकप्रियता हेतु नहीं होना चाहिए." आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "एक पश्चिम से आंधी चली है, जो हर तरह की व्यवस्था, भद्रता, मांगल्य और सांस्कृतिक मानवीय संस्कार से विरोध रखती है. उसको नष्ट भ्रष्ट करना चाहती है. और प्रगति देश भी उससे त्रस्त है. अभी दो चार दिन पहले से जो समाचार आ रहे हैं, वो सुन लीजिए. अल्बानिया में क्या हो रहा है. बांग्लादेश में क्या हुआ, नेपाल में क्या हुआ, ये सब किया कराया उनका है, वो कहते हैं रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बनती है. लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है. पहले नहीं हुआ है, आज भी नहीं हुआ है." 

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उन्होंने आगे कहा कि अपने स्वार्थ का पोषण करने वाले सब जगह प्रभावी रहे हैं. इसके लिए ये कार्यवाही सारी दुनिया में चलती है. 

मोहन भागवत ने कहा, "भारत में भी ऐसे प्रयास चल रहे हैं लेकिन पिछले दशकों में जिस प्रकार दृढ़ नीति से भारत चला और उतने ही पक्के नेतृत्व ने उसको जिस प्रकार दृढ़ता से चलाया, उसके चलते समाज का पुरुषार्थ बना. ये आसुरी ताकतें जानती हैं, इसलिए भारत उनका लक्ष्य है, वो जानते हैं कि भारत को किस तरह तोड़ेंगे. उनको सहायता भी मिल जाती है, उन्हीं की प्रकृति को कुछ लोग सर्वत्र हैं, सत्ता स्वार्थ और विवेकहीनता की वजह से महत्वाकांक्षी नेता भी उनको मिल जाते हैं."

उन्होंने आगे कहा कि समाधान के लिए होने चाहिए. आंदोलन का उद्देश्य समाधान है, तो आंदोलन करने वाला कोई समूह हो या शांति सुव्यवस्था कायम करने के लिए कार्यवाही करने वाला शासन. अखंड समाज में हमारे किसी काम की वजह से किसी तरह की अनबन पैदा नहीं होनी चाहिए. भावनाएं कितनी भी तीव्र हों हमारे संविधान की मार्यादा बोल, चाल-चलन, हमारी कृतियों के लिए भी मर्यादा हो, वोट सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ का लोभ हमारी विवेक और सदभावना पर हावी न हो, समाज इस चपेट में नहीं आए इसपर हमें  ध्यान देना होगा.

उन्होंने आगे कहा कि समाज और देश को नेता प्रशासन नहीं चलाता है, समाज में हम भी हैं, समाज और देश को चलाने कि जिम्मेदारी हमारी है. अपनेपन की प्रेरणा आंदोलन के पीछे तो ठीक है लेकिन आंदोलन किसी दूसरे टारगेट के लिए चले तो राजनीति का साधन बन जाता है.

मोहन भागवत ने कहा, "विश्व की शक्ति विचित्र है. उनको भारत चाहिए भी और भारत बड़ा भी नहीं होना चाहिए. क्योंकि उनके बड़प्पन को झटका लगेगा, इसलिए वो भी अपना खेल खेलना चाहती है. अपना जो एक टारगेट है भारत को बड़ा बनाना, उसका ध्यान रखकर सावधान रहिए. परस्पर सद्भावना की रक्षा करनी है, सावधान रहकर किसी तरह से उत्तेजित न होकर, हमको सतत प्रयास करने पड़ेंगे."

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