पिछले कुछ महीनों में देश ने आंदोलनों का एक नया दौर देखा है. कहीं चुनाव आयोग और SIR को लेकर सवाल उठे, तो कहीं शिक्षा व्यवस्था और जनसरोकारों के मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हुए. लोकतंत्र में आंदोलन जनता की आवाज हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि कोई आंदोलन अनुशासित रहते हुए अपने उद्देश्य पर कैसे अडिग रह सकता है? इसका जवाब है गांधी. महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को सत्य और अहिंसा की राह दिखाई. उन्हीं विचारों को अपने जीवन में उतारने वाली एक महिला स्वतंत्रता सेनानी भी थीं, जिन्हें उनके साहस और संघर्ष के कारण " बूढ़ी गांधी" के नाम से जाना गया.
आज जब वंदे मातरम्, तिरंगे और आंदोलनों को लेकर बहस तेज है, तब इतिहास की एक ऐसी महिला को याद करना जरूरी है, जिसने इन प्रतीकों को अपने बलिदान से अमर कर दिया. मातंगिनी हाजरा ने 29 सितंबर 1942 को ब्रिटिश गोलियों का सामना करते हुए आखिरी सांस तक तिरंगा थामे रखा और ‘वंदे मातरम्' का उद्घोष करती हुई शहीद हो गईं. उनकी जयंती पर उनकी कहानी याद दिलाती है कि अपने उद्देश्य के प्रति अडिग रहने का अर्थ क्या होता है.

मातंगिनी हाजरा को महिला गांधी के नाम से जाना जाता था
संघर्षों में बीता शुरुआती जीवन
19 अक्टूबर 1870 को बंगाल के तमलुक के पास होगला गांव में जन्मीं मातंगिनी हाजरा का जीवन शुरुआत से ही संघर्षों से भरा था. कम उम्र में उनका विवाह हुआ और महज 18 साल की उम्र में वह विधवा हो गई. उनके जीवन में हमेशा आर्थिक कठिनाइयां रही, लेकिन इन परिस्थितियों ने उनके भीतर देशसेवा की भावना को कमजोर नहीं किया. आगे चलकर वह महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुई और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गई. लोग उन्हें स्नेह बुजुर्ग गांधीवादी महिला कहते थे.

अंग्रेजों के खिलाफ मातंगिनी हाजरा ने खोला था मोर्चा
नमक कानून तोड़ने से भारत छोड़ो आंदोलन तक
1930 में मातंगिनी हाजरा ने सिविल डिसऑबेडिएंस मूवमेंट में हिस्सा लिया और नमक कानून तोड़ने के कारण गिरफ्तार हुई. 1933 में सेरामपुर में कांग्रेस की एक सभा के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज में वह घायल भी हुई. उम्र बढ़ने के बावजूद स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका उत्साह कम नहीं हुआ.
तिरंगा हाथ में, जुबां पर वंदे मातरम्
29 सितंबर 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तमलुक में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक विशाल जुलूस निकाला गया. इसका उद्देश्य तमलुक पुलिस थाने पर कब्जा कर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देना था. जुलूस का नेतृत्व करने वाले स्वयंसेवकों के बीच 73 साल की मातंगिनी हाजरा भी थी. हाथ में तिरंगा थामे वह आगे बढ़ रही थीं, तभी ब्रिटिश पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी.
गोली उनके बाएं हाथ में लगी, लेकिन तिरंगा नहीं गिरा. दूसरी गोली उनके दाएं हाथ में लगी, फिर भी वह झंडा थामे रहीं और ‘वंदे मातरम्' का उद्घोष करती रहीं. आखिरकार उनके माथे पर गोली मारी गई. लेकिन अंतिम सांस तक हाजरा ने तिरंगे को जमीन पर नहीं गिरने दिया. भले ही ब्रिटिश गोलियों ने मातंगिनी हाजरा की जिंदगी छीन ली, लेकिन उनका साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति आज भी प्रेरणा देती है. आज जब आंदोलनों की परिभाषा पर बहस होती है, तब मातंगिनी हाजरा की शहादत याद दिलाती है कि सच्चे संघर्ष की पहचान उसके उद्देश्य, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण से होती है, न कि शोर और हिंसा से.
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